वैसे तो बिहार में ‘अयोध्या की तर्ज’ वाली सोच समाजवादी माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वक्त में ही जोर पकड़ चुकी थी लेकिन 20 जुलाई को जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर को अपनी राजनीति का आधार बताने वाले जनता दल यूनाइटेड के दो नेता ‘सनातन स्वाभिमान’ में सराबोर हो गए।

नीतीश कुमार बिहार को गरीब राज्य बताते थे लेकिन इस यात्रा के लिए बिहार सरकार ने अपने खजाने से ढाई करोड़ रुपए दिए हैं। जाने और लौटने के लिए दी गई ट्रेन पूरी तरह एयर कंडीशंड है। यात्रियों की संख्या के हिसाब से देखा जाए तो हर यात्री पर बिहार सरकार लगभग बाइस हजार रुपये खर्च कर रही है।

भारत सरकार और बिहार सरकार के सरकारी प्रतीक चिन्हों के साथ अनेक अखबारों में एक पूरे पेज के विज्ञापन में सोमनाथ यात्रा के ‘शुभारंभ’ का प्रचार किया गया था। इसे भारतीय संस्कृति, आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बताते हुए लिखा गया था, “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: अटूट आस्था की गौरव गाथा।”
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इसमें मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री बीजेपी के सम्राट चौधरी की उपस्थिति तो चौंकाने वाली नहीं थी लेकिन जनता दल यूनाइटेड के विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र प्रसाद यादव की “गरिमामयी उपस्थिति” यह सवाल ज़रूर पैदा कर रही थी कि समाजवादी नेताओं की यह सनातनी यात्रा उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड के भगवाकरण का अंतिम चरण तो नहीं। ध्यान रहे कि श्री चौधरी और श्री यादव दोनों इस समय सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं।

समाजवाद से सनातन की यात्रा

वैसे, समाजवादी से सनातनी रंग में डूबने वाले ये दो नेता अकेले नहीं हैं, बल्कि जनता दल यूनाइटेड का बड़ा धड़ा विचारधारा के स्तर पर पहले ही भगवाकृत हो चुका है। अंतर यह है कि नीतीश कुमार ऐसा करते हुए भी थोड़ा लोक लाज का ध्यान रखते थे लेकिन जब से यह बताया जा रहा है कि अब वह अपने होशो हवास में नहीं है, सारी पर्देदारी किनारे की जा रही है। और बात केवल इस यात्रा की नहीं बल्कि समाजवाद के नाम लेने वालों की यह सनातनी यात्रा दूसरे मामलों में भी भगवानकरण की मंजिलें तय कर रही हैं। इनकी चर्चा थोड़ा रुक कर। पहले यह जान लीजिए कि बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से जारी इस विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान भी शामिल है, “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एक हजार वर्षों की यात्रा का प्रतीक है, यह भारत के अस्तित्व और आत्मगौरव का उत्सव है।”

सरकार के इस विज्ञापन में इस यात्रा को भारतीय आत्मगौरव का शाश्वत विजय घोष बताया गया और लिखा गया, “आइए, भक्ति, परंपरा और सनातन स्वाभिमान के इस अभियान में सम्मिलित होइए।”

दरअसल, इस लंबे चौड़े विज्ञापन के पीछे की कहानी यह है कि बिहार सरकार की ओर से 1150 श्रद्धालुओं के जत्थे को एक स्पेशल ट्रेन से सोमनाथ की यात्रा पर भेजा जा रहा था। सरकार चाहती तो “श्रद्धालुओं” को सोमनाथ यात्रा पर यूं भी भेज सकती थी लेकिन उसने इसे एक बड़ा इवेंट बनाने में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी। इसका मक़सद इसके अलावा क्या हो सकता है कि अपने वोट बैंक को यह संदेश खुल कर दिया जाए कि यह सरकार कितनी सनातनी है?

श्रद्धालुओं के चयन का आधार क्या?

यह पता नहीं चल सका कि इन 1150 ‘श्रद्धालुओं’ का चयन किस आधार पर हुआ है लेकिन पहले यह बात बताई गई थी कि हर जिले के डीएम अपने स्तर से 20-25 ऐसे लोगों को चुनेंगे जो इस “अटूट आस्था की गौरव गाथा” के “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” के लिए “सनातन स्वाभिमान की महायात्रा” में शामिल होना चाहते हैं। 4 जुलाई तक यह पता नहीं चल पाया था कि आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी और इसके लिए कौन पात्र होंगे। इससे यह पता नहीं चल पाया कि जिन लोगों का चयन इस यात्रा के लिए हुआ है, उनके लिए पात्रता की क्या शर्तें थीं।
ख़बरों में बताया गया था कि यह यात्रा राज्य सरकार की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहल का हिस्सा है। इसमें सरकार उनकी यात्रा के खर्च के अलावा, ठहरने और भोजन की व्यवस्था और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध करा रही है।

 श्रावणी मेला का प्रचार

इसी 15 जुलाई को बिहार सरकार ने श्रावणी मेला के प्रचार प्रसार के लिए ‘आकर्षक पुरस्कार’ योजना की घोषणा की है। अगर सोमनाथ यात्रा कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित है तो श्रावणी मेला में पुरस्कार देने की योजना पर्यटन विभाग की ओर से आई है। इसमें कहा गया है कि “श्रावणी मेला 2026 के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन अनुभवों को अपने कमरे और रचनात्मकता के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाएं और जीतें आकर्षक पुरस्कार।” इसके तहत पहला पुरस्कार तीन लाख, दूसरा दो लाख और तीसरा एक लाख रुपये का है। इसके अलावा दो प्रतिभागियों के लिए पचास हजार रुपये का चौथा पुरस्कार और पांच के लिए सांत्वना में पच्चीस हजार रुपये प्रति प्रतिभागी पुरस्कार की घोषणा की गई है।

इसके अलावा बिहार सरकार सिंधु दर्शन तीर्थ यात्रा वित्तीय अनुदान योजना भी चला रही है। इसके तहत सरकार लद्दाख की इस यात्रा पर आने वाले खर्च का 50 प्रतिशत और अधिकतम बीस हजार रुपये का अनुदान देगी। इसमें श्रद्धालु को कैसे चुना जाएगा, यह नहीं बताया गया है लेकिन अधिकतम 100 तीर्थ यात्रियों के लिए यह योजना पहले ‘आओ, पहले पाओ’ के आधार पर है।
 
इसी तरह बिहार सरकार ने राज्य के 16 जिलों में 34 पर्यटन स्थलों का होमस्टे प्रोत्साहन योजना के लिए चयन किया है। इस योजना के बारे में अहम शिकायत यह है कि इसमें नीतीश कुमार के समय सीमित स्तर पर विकसित किए जाने वाले सूफी सर्किट का कोई ध्यान नहीं रखा गया। इस योजना के तहत एक कमरे के लिए सरकार ने ढाई लाख रुपए की सहायता देने की घोषणा की है जो अधिकतम 10 लाख रुपए तक हो सकती है।

समाजवादी से सनातनी यात्रा में एक महत्वपूर्ण भूमिका बिहार का शिक्षा विभाग भी निभा रहा है। बिहार सरकार ने पहले 551 मॉडल स्कूल खोलने की घोषणा की और बाद में उसका नाम चुपचाप सरस्वती विद्या निकेतन रख दिया जो आरएसएस के स्कूलों के नाम के अनुरूप माना जा रहा है।

जब इन स्कूलों का नाम ही आरएसएस की विचारधारा के अनुसार रखा गया तो इसका रंग भी भगवा कर दिया गया। ध्यान रहे कि बिहार में पहले भी आदर्श विद्यालय के नाम से स्कूल खोले गए हैं लेकिन उनका रंग कभी ऐसा नहीं किया गया।

शिक्षा का भगवाकरण?

शुरू में जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने यह जरूर कहा कि शिक्षा का कोई रंग नहीं होता लेकिन उनकी पार्टी की ओर से बहुत ही कमजोर सा दिखा विरोध जल्द ही दम तोड़ गया। स्कूल के नए नाम से खासकर उन परिवारों को आपत्ति है जिन्होंने इसके लिए जमीन दी थी और उनके किसी रिश्तेदार के नाम पर स्कूल चल रहा था। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता भगवा को देवी सरस्वती का रंग बता रहे हैं जबकि हिंदू धर्म के जानकार का कहना है कि उनका रंग तो धवल है। एक और बीजेपी नेता इसे भगवान सूर्य का रंग बता रहे हैं। जब उनसे यह कहा जाता है कि स्कूलों का रंग तिरंगा क्यों नहीं है तो वह इधर-उधर की बात करने लगते हैं।

ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि ये सारी योजनाएं बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के काम का संभालने के बाद शुरू हुई है लेकिन इसकी जड़ में ‘अयोध्या की तर्ज’ वाली सोच है। इस सोच को वैसे तो पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समय में बल मिला लेकिन माना यह जाता है कि भारतीय जनता पार्टी से जनता दल यूनाइटेड में आने के बाद और फिलहाल कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा ने उनके दिमाग में डाला है। इसके अलावा कांग्रेस से जदयू में जाकर मंत्री पद लेने वाले और बाद में कुणाल किशोर के समधी बने नीतीश कुमार के खासम खास माने जाने वाले अशोक चौधरी का भी योगदान माना जाता है।
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इससे पहले वह गया में फल्गु नदी में सालों भर पानी रखने की व्यवस्था के लिए एक डैम बनवा चुके थे जिस पर 300 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च हुआ और आज वहां सड़े हुए पानी के अलावा कुछ नहीं मिलता। रोचक बात यह है कि हिंदू मान्यता के अनुसार फल्गु नदी को सीता जी का यह अभिशाप मिला था कि वह हमेशा अंतः सलिला रहेगी।

याद करने की बात यह है कि नीतीश कुमार ने अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन से खुद को हमेशा दूर रखा लेकिन सीतामढ़ी के ‘पुनौरा धाम’ में मां जानकी मंदिर के विकास लिए नीतीश कुमार सरकार ने ही लगभग नौ सौ करोड़ रुपए दिए और उसके पहले से कहा जाने लगा था कि वहां ‘अयोध्या की तर्ज’ पर निर्माण होगा। पहले जहां धार्मिक पर्यटन के विकास के नाम पर सरकार पैसे देती थी, अब तो वह सीधे मंदिर निर्माण के लिए पैसे खर्च कर रही है। अयोध्या के हिंदुत्ववादी आंदोलन से दूरी बनाए रखने वाले नीतीश कुमार का ‘अयोध्या की तर्ज’ अपनाने की यात्रा भी कम सनातनी नहीं थी।