बिहार में इस बात की बहुत चर्चा रहती है कि वैसे तो जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से पूरी तरह अपने सलाहकारों के नियंत्रण में बेबस चल रहे हैं लेकिन कभी-कभी उनका राजनीतिक एंटीना ऐसा पलटी मारता है कि लोग एकदम से चौकन्ना हो जाते हैं कि अब क्या होने वाला है, हालांकि बिल्कुल अंदाजा नहीं लग पाता कि आगे क्या होने वाला है।

नीतीश कुमार के राजनीतिक एंटीना की चर्चा बिहार में एक बार फिर इसलिए जोर पकड़ रही है क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल के विधायक और वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र ने जनता दल यूनाइटेड को साफ तौर पर यह प्रस्ताव दे डाला कि वह भारतीय जनता पार्टी के चंगुल से निकलें और राजद के साथ सरकार बना लें।

वैसे, नीतीश कुमार की पार्टी का जितना भाजपाईकरण हो चुका है और जिस तरह का राजनीतिक समीकरण इस समय काम कर रहा है उसमें इस बात पर यक़ीन कर पाना मुश्किल है कि नीतीश कुमार एक बार फिर पलटी मारेंगे। लेकिन यही बात नीतीश कुमार के राजनीतिक एंटीना को खास बनाती है क्योंकि उन्होंने अक्सर उस समय ऐसे फ़ैसले लिए जब ऊपरी तौर पर लग रहा था कि ऐसा तो नहीं हो सकता।
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आरजेडी के सिर्फ 23 विधायक

सवाल यह है कि आखिर 243 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव में केवल 25 सीटों पर सिमटे राजद को ऐसा क्यों लग रहा है कि वह नीतीश कुमार को अपने साथ आने का निमंत्रण दे सकता है? ध्यान रहे कि 2025 के विधानसभा चुनाव में जदयू को पचासी सिम मिली थी और सरकार बनाने के लिए 122 सीटों की ज़रूरत होती है। राजद 25 सीटों के अलावा महागठबंधन में शामिल कांग्रेस के पास 6, भाकपा माले के पास दो और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी के पास एक सीट है यानी महागठबंधन के पास कुल 34 विधायक हैं।

इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि 2025 के विधानसभा चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी के नेताओं विशेष कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुरुआत अगर मगर के बाद अंत में साफ़ तौर पर कहा था कि नीतीश कुमार ही अगले मुख्यमंत्री होंगे। इसके अलावा जेडीयू की ओर से यह नारा भी लगाया गया था- 25 से 30 फिर से नीतीश।

इसके बाद एनडीए ने विधानसभा चुनाव में नीतीश के नाम के सहारे 202 सीटें लाईं लेकिन इस बार नीतीश कुमार 6 महीने भी मुख्यमंत्री पद पर नहीं रह सके और ऐसा समझा जाता है कि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें इस पद से हटने को मजबूर किया। 

नीतीश कुमार ने 10वीं बार 20 नवंबर 2025 को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 14 अप्रैल 2026 को उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। नीतीश कुमार के कोर वोटर और समर्थक तब से यह मानते रहे हैं कि उन्होंने खुद से इस्तीफा नहीं दिया बल्कि उनसे इस्तीफा दिलवाया गया।

उस चुनाव के दौरान की यह बात भी याद करने की है कि जब जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने भारतीय जनता पार्टी के साथ कुछ सीटों पर ऐसे समझौते किए जो जदयू के उम्मीदवारों को बिल्कुल नागवार गुजरे तो नीतीश कुमार अचानक फॉर्म में आ गए और उन्होंने कई फैसलों को तुरंत पलटवा दिया। उस समय भी यह बात कही जाती थी कि नीतीश कुमार की सेहत सही नहीं है और उनके अधिकतर फैसले उनके इर्द-गिर रहने वाले कुछ वरिष्ठ नेता ही ले रहे हैं जिनमें संजय झा के अलावा ललन सिंह, विजय कुमार चौधरी, अशोक कुमार चौधरी और कुछ और नेता थे।

UCC पर जेडीयू का रुख

भाई वीरेंद्र ने नीतीश कुमार को बीजेपी से अलग होकर महागठबंधन के साथ सरकार बनाने का निमंत्रण दिया है उसकी ताजा वजह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का वह बयान बना है जिसमें उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के शासन वाले 21 राज्यों में 2029 से पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड- यूसीसी लागू करने की बात कही थी।
अमित शाह के इस बयान के बाद जदयू के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने साफ तौर पर कहा कि उनके नेता (नीतीश कुमार) ने इस तरह यूसीसी लागू करने का विरोध किया था और उनकी पार्टी इसे बिहार में लागू होने नहीं देगी। लेकिन अगले ही दिन जेडीयू के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने गोल मटोल बयान देते हुए इस विरोध को एक तरह से दबाते हुए यह कहा कि उनकी पार्टी पहले ड्राफ्ट देखेगी, उसके बाद फैसला करेगी। यानी यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर जेडीयू स्पष्ट रूप से दो खेमे में बंट गया है।

नीतीश कुमार और धर्मनिरपेक्षता 

ऐसे में भाई वीरेंद्र नीतीश कुमार और उनसे ज़्यादा उनके पुत्र निशांत को भी यह संदेश देना चाह रहे हैं कि उनकी राजनीति और महागठबंधन की राजनीति के वैचारिक आधार मिलते-जुलते हैं और बीजेपी जो कुछ कर रही है उससे नीतीश कुमार की बची खुची सेक्युलर छवि भी खत्म हो जाएगी। भाई वीरेंद्र ने अपने बयान में यह कहा कि बिहार की मौजूदा एनडीए सरकार नीतीश कुमार से नहीं बल्कि नागपुर से गाइड हो रही है। यूसीसी के मुद्दे पर भाई वीरेंद्र ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और इसमें हर धर्म वाले को अपने धर्म पर चलने की आजादी है।

दरअसल भाई वीरेंद्र ने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे को छेड़ा है क्योंकि जेडीयू के नेता इस बात पर बहुत जोर देते हैं कि सम्राट चौधरी भले ही भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन वह नीतीश कुमार की विरासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने नीतीश कुमार के नाम के आगे आदरणीय लगाते हुए यह कहा कि कुछ लोग आपको बर्बाद करने में लगे हुए हैं और आगे भी बर्बाद करते रहेंगे।

भाई वीरेंद्र ने सामाजिक न्याय का भी हवाला देते हुए नीतीश कुमार से यह कहा कि वह जिस तरह की राजनीति करते हैं, उसी तरह की राजनीति आरजेडी भी करता है इसलिए उन्हें भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन तोड़कर राजद के साथ आ जाना चाहिए।

जेडीयू में घमासान!

ध्यान देने की बात यह भी है कि नीतीश कुमार के लिए यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब उनकी पार्टी खेमों में बंटी हुई नजर आती है और उनके एक विधायक अनंत सिंह और मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार के बीच खुल्लम खुल्ला बेहद निचले स्तर के आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। इसके अलावा यह बात भी चर्चा में है कि जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह हाल ही में आयोजित जदयू विधायकों के ओरिएंटेशन प्रोग्राम में शामिल नहीं हुए और उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें तो इसकी जानकारी ही नहीं थी। हालांकि उसके बाद ललन सिंह ने नीतीश कुमार से मुलाकात की और यह संदेश बाहर आया कि शायद नीतीश कुमार इन सारी परिस्थितियों से बहुत खुश नहीं हैं।

अब सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार इतने होश में आ चुके हैं और इतने परेशान हो चुके हैं कि वह भाई वीरेंद्र के ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं? जाहिर तौर पर इसकी संभावना बहुत कम लगती है क्योंकि वह जिन नेताओं और परिस्थितियों से घिरे हुए हैं उसमें उनका फिर से पलटी मारना पहले के मुकाबला बहुत मुश्किल होगा।
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तो भाई वीरेंद्र ने यह प्रस्ताव क्यों दिया? दरअसल भाई वीरेंद्र ने जो संदेश नीतीश कुमार को दिया है वह उनके बेटे निशांत के लिए भी है क्योंकि निशांत आजकल राजनीतिक रूप से पहले से अधिक सक्रिय दिख रहे हैं और वह अपने पिता की राजनीतिक विचारधारा की बात भी करते हैं। इस प्रस्ताव से कुछ हो या ना हो जदयू का वह खेमा जरूर खुश हो रहा होगा जो निशांत को बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करना चाहता है और इस समय नीतीश कुमार को घेरे में रखने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं से तंग चल रहा है।