आप सरकार के दिनों में यमुनापार में आम आदमी पार्टी के विधायक रहे एक नेता का किस्सा बड़ा ही चर्चा में रहा है। किस्सा यह था कि उस विधायक के इलाके में दिल्ली जल बोर्ड कोई काम नहीं कर रहा था। वह जो भी काम कहता, योजना की रूपरेखा देता या फिर जनता की शिकायतों को अधिकारियों तक पहुंचाता, अधिकारी एक कान से उसकी बात सुनते और दूसरे से निकाल देते थे। विधायक बहुत परेशान हो गया और क्षेत्र के कुछ गणमान्य लोगों को साथ लेकर उस समय के मुख्यमंत्री अरविद केजरीवाल के पास पहुंच गया। विधायक ने केजरीवाल से शिकायत की कि दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारी उसकी बात नहीं सुनते और इलाके के गणमान्य लोगों ने भी इस बात की पुष्टि कर दी कि विधायक तो बहुत कोशिश कर रहे हैं लेकिन दिल्ली जल बोर्ड उनकी सुनवाई नहीं कर रहा।
केजरीवाल विधायक पर ही भड़क गये
विधायक को यह उम्मीद थी कि अरविंद केजरीवाल इस मुद्दे को जोरशोर से उठाएंगे ताकि यह साबित किया जा सके कि दिल्ली के अधिकारी उनकी और उनके विधायकों की कोई बात नहीं सुनते। उनका यह भी विश्वास था कि इस आरोप से बीजेपी को आरोपों के घेरे में लिया जा सकेगा और यह भी साबित किया जा सकेगा कि अधिकारी बीजेपी की जी हजूरी कर रहे हैं और क्षेत्र में जनता की शिकायतें न सुनकर जनता को त्रस्त कर रहे हैं। जब विधायक यह शिकायत कर रहे थे तो पार्टी के कई और नेता भी वहां मौजूद थे।
मगर, क्या आप जानते हैं कि केजरीवाल ने क्या किया? केजरीवाल ने उस भरी सभा में विधायक का ही चीरहरण कर दिया। उन्होंने विधायक के इलाके के लोगों के सामने यह कहा कि हमने पता नहीं किन लोगों को विधायक बनवा दिया। ये महाशय इतने कमजोर हैं कि इलाके में अधिकारी इनकी नहीं सुनते। आखिर इतने कमजोर लोगों को हमने विधायक क्यों बनवाया। उस विधायक को काटो तो खून नहीं। अपने इलाके के गणमान्य लोगों के सामने उसकी जो बुरी गत बनी, उससे वह बहुत शर्मिन्दा हुए। उन लोगों ने इलाके में आकर इस घटना का जिक्र किया और विधायक महोदय का बहुत अपमान हुआ। मैं उन विधायक महोदय का नाम इसलिए नहीं लिख रहा कि अब वह इस दुनिया में नहीं हैं।
आपको एक और घटना याद दिलाता हूं। कुछ साल पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें लालू यादव एक आराम कुर्सी पर पांव फैलाकर लेटे हुए हैं। पार्टी का एक नेता उनसे टिकट की मांग कर रहा है और लालू यादव उसे दुत्कारते-से दिखाई देते हैं। बीएसपी के एक नेता का भी एक किस्सा है। उसने एक सभा में मायावती के साथ स्टेज पर अपनी कुर्सी लगवा ली थी और इसलिए उसे पार्टी छोड़नी पड़ी थी।
केजरीवाल भी अन्य नेताओं जैसे?
आप सोचेंगे कि इन घटनाओं का आपस में क्या संबंध है। आज मैं इस घटना का जिक्र क्यों कर रहा हूं। दरअसल इसकी एक बड़ी वजह है। मैं केजरीवाल के काम करने के तरीके को उजागर कर रहा हूं। केजरीवाल का काम करने का तरीका ठीक वैसा ही है, जैसा मायावती, लालू यादव या उन पार्टियों के नेताओं जैसा है जो पार्टी में सर्वेसर्वा माने जाते हैं। पार्टी में उनके खिलाफ खड़े होने या उनके समकक्ष खड़े होने की इजाजत किसी को नहीं होती। अगर कोई ऐसा करता है या फिर केजरीवाल सरीखे नेताओं के किसी फैसले को गलत कहने का दुस्साहस करता है तो फिर उसकी हालत वैसी ही कर दी जाती है जैसी दूसरी वन मैन शो वाली पार्टियों में ऐसे नेताओं की होती है।आम आदमी पार्टी में केजरीवाल जैसा बनने या फिर उनसे भी आगे निकलने की कोशिश करने वाले राघव चड्ढा की यह हालत भी इसीलिए बनी है। हालांकि उन्हें पार्टी से नहीं निकाला गया लेकिन अब आम आदमी पार्टी की तरफ से तो उनके मुंह पर टेप लगा दी गई है।
मैंने तो पहली बार ऐसा सुना है कि जब कोई पार्टी संसद या किसी भी सदन के अध्यक्ष को यह लिखकर देती हो कि हमारे सांसद को बोलने का समय नहीं दिया जाए वरना पार्टियां तो यह शिकायत करती हैं कि सदन में हमारे नेताओं को बोलने ही नहीं दिया जाता। राहुल गांधी का उदाहरण सामने है और उनकी वजह से स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक आ गया। फिर, आप ने ऐसा क्यों किया। वजह साफ है कि राघव चड्ढा वह बोलते हैं जो केजरीवाल को पसंद नहीं है। कहीं केजरीवाल को यह आशंका तो नहीं रही कि राघव चड्ढा ऐसे मुद्दे उठाकर उनसे भी बड़े नेता बन जाएंगे?
राजनीतिक क्षेत्रों में यह चर्चा कि आखिर केजरीवाल ने राघव चड्ढा को पार्टी से निष्कासित क्यों नहीं किया तो फिर इसका जवाब यह भी है कि निकाले जाने के बाद भी राघव चड्ढा की सदस्यता समाप्त होने की संभावना नहीं है। राघव चड्ढा ने कम से कम वैसा तो नहीं किया जैसा स्वाति मालीवाल ने किया है। स्वाति ने तो केजरीवाल के लाडले विभव कुमार पर मारपिटाई के साथ-साथ ऐसे आरोप लगाए हैं जिनसे केजरीवाल की इज्जत चौराहे पर उछल गई। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार के लिए स्वाति मालीवाल भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। केजरीवाल ने तो उन्हें भी पार्टी से नहीं निकाला और औपचारिक रूप से वह आज भी पार्टी की सदस्य हैं और आप की राज्यसभा सांसद हैं। वैसे, इस्तीफा तो कभी कुमार विश्वास ने भी नहीं दिया। दिल्ली से राज्यसभा का टिकट न मिलने के बाद जब उन्होंने जहर उगला तो उन्हें भी पार्टी में राजस्थान के प्रभारी के पद से हटाया गया लेकिन उस तरह निलंबित या निष्कासित नहीं किया गया जिस तरह प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार, धर्मवीर गांधी या कपिल मिश्रा को किया गया था।
केजरीवाल की पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र
लोग तो यह भी कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित नहीं होने दिया और न ही पारदर्शिता के अपने दावे-वादे को कभी पूरा किया। जिस लोकपाल विधेयक के नाम पर वह सत्ता में आए, वही लागू नहीं हो सका। दिल्ली में 2013 में पहली बार सत्ता में आते ही उन्होंने पत्रकारों के दिल्ली सचिवालय में प्रवेश पर रोक लगाई जबकि राजनीति में उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में मीडिया का सबसे बड़ा हाथ था। दिल्ली में करोड़ों रुपए के विज्ञापनों का इस्तेमाल उन्होंने अपना चेहरा चमकाने के लिए किया और शीशमहल का कलंक तो हमेशा के लिए उनपर चस्पा हो ही चुका है। पार्टी के फंड को भी उन्होंने छिपा लिया जबकि पहले वह दावा करते थे कि एक-एक पैसे का हिसाब दूंगा।अब देखना यह है कि उनकी यह बिगड़ी हुई छवि पंजाब में भी कुछ असर डालती है या नहीं, जहां फरवरी 2027 से पहले चुनाव होने हैं। पंजाब में उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान को कभी अपने तौर पर सरकार नहीं चलाने दी और वह केवल केजरीवाल की कठपुतली के रूप में ही काम कर रहे हैं जिसे वह स्वीकार भी करते रहे हैं। और फिर, राघव चड्ढा भी तो पंजाब से ही राज्यसभा के सांसद हैं। क्या राघव चड्ढा के साथ यह सलूक पंजाब पर कोई असर नहीं डालेगा?