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फ़ोटो साभार - फ़ेसबुक

क्या एक बार फिर बीजेपी को अपने जाल में फंसा रही है ‘आप’?

दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) का चेहरा कौन होगा, इस सवाल का जवाब तो सभी जानते हैं। ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अलावा कोई और हो ही नहीं सकता। भले ही पिछले पांच सालों में केजरीवाल के मुक़ाबले उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली पर ज़्यादा ध्यान दिया है लेकिन केजरीवाल के सामने 'आप' में किसी की कोई हैसियत नहीं है। मान लेते हैं कि यह 'आप' का अंदरूनी मामला है लेकिन दूसरा सवाल यह है कि बीजेपी इन चुनावों में किसके नेतृत्व में उतरेगी यानी बीजेपी का चेहरा कौन होगा? इस सवाल का जवाब बीजेपी में भी कोई नहीं दे सकता लेकिन यही वह सवाल है जो इन दिनों बीजेपी से ज़्यादा 'आप' में पूछा जा रहा है। 

इसकी वजह यह है कि ‘आप’ इसी सवाल के जवाब में ही तो पिछले दो चुनावों में बीजेपी को उलझाती रही है। इसलिए उसके नेता इस सवाल को बीजेपी से इस बार भी और भी ज़्यादा शिद्दत से पूछेंगे। उन्होंने इस सवाल का जवाब पूछना शुरू भी कर दिया है। राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने पिछले दिनों बीजेपी सांसद विजय गोयल के घर के बाहर इसी सवाल को लेकर धरना भी दिया था और प्रेस कांफ्रेंस में भी यही सवाल उछाला गया था।

आने वाले दिनों में 'आप' का हर छोटा-बड़ा नेता बीजेपी से उसके चेहरे को लेकर सवाल पूछता नज़र आएगा। देखना यह है कि बीजेपी इस सवाल के जाल में उलझती है या फिर इस बार बच निकलती है?

दरअसल, बीजेपी को इस सवाल के जाल में उलझाना ‘आप’ की एक सोची-समझी रणनीति है। इस रणनीति को उन्होंने पिछले दो चुनावों में बड़ी कामयाबी के साथ अंजाम दिया है। इसीलिए इस बार भी पार्टी इसी सवाल को बार-बार पूछ रही है और पूछती रहेगी। 

आप कह सकते हैं कि कांग्रेस से इस सवाल का जवाब क्यों नहीं मांगा जा रहा है। वह इसलिए कि कांग्रेस अभी मूर्छित अवस्था में ही चल रही है। वैसे, भी पिछले दो विधानसभा चुनावों में उसका जैसा प्रदर्शन है, उसे देखते हुए कांग्रेस से यह सवाल पूछना बनता भी नहीं है। अगर शीला दीक्षित जीवित होतीं और वह कांग्रेस का चेहरा बनतीं तो फिर शायद 'आप' को थोड़ी चिंता होती लेकिन अब वह विधानसभा चुनावों में सिर्फ़ बीजेपी को ही अपना प्रतिद्वंद्वी मानती है और इसीलिए यह सवाल उसी की तरफ़ उछाला जाएगा।

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शीला दीक्षित को बताया था बेईमान

'आप' के लिए यह सवाल उछालना क्यों ज़रूरी है, इसके लिए 2013 के विधानसभा चुनावों पर एक नज़र डालनी पड़ेगी। 2013 में 'आप' ने यह माहौल बना दिया था कि अरविंद केजरीवाल बहुत ही ईमानदार उम्मीदवार हैं। ऑटो के पीछे  केजरीवाल के साथ शीला दीक्षित की फोटो नज़र आती थी जिसमें केजरीवाल के नीचे ईमानदार और शीला दीक्षित के नीचे बेईमान लिखकर इसका पूरा प्रचार किया गया था। 

एक पत्रकार ने शीला दीक्षित से पूछा भी था कि केजरीवाल इस तरह आपको बेईमान लिख रहे हैं तो आप उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं करतीं, इस पर शीला दीक्षित का कहना था कि दिल्ली केजरीवाल पर विश्वास नहीं कर रही है। लेकिन यह उनकी ग़लतफ़हमी थी क्योंकि केजरीवाल ने ईमानदारी का ऐसा गुब्बारा फुला दिया था कि उससे किसी को भी प्रभावित किया जा सकता था।

उस दौर में दिल्ली प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष विजय गोयल थे। विजय गोयल को चुनावों से आठ महीने पहले ही प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी दी गई थी। इसलिए यह एक मौन स्वीकृति थी कि विजय गोयल ही बीजेपी की तरफ़ से सीएम पद के उम्मीदवार होंगे। 

बीजेपी ने इससे पहले 2003 में मदन लाल खुराना को सीएम प्रोजेक्ट किया था और 2008 के चुनावों में तो विजय कुमार मल्होत्रा को सीएम इन वेटिंग कहकर सामने लाए थे। खुराना चले नहीं और मल्होत्रा वेट ही करते रह गए। इसलिए 2013 में बीजेपी फूंक-फूंक कर क़दम रख रही थी। विजय गोयल को सीएम का चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया गया था लेकिन इस बारे में कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया था। 

2013 के विधानसभा चुनाव में 'आप' केजरीवाल की ईमानदारी का डंका बजा रही थी और शीला दीक्षित को बेईमान लिख रही थी, उसी दौरान विजय गोयल को भी एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जा रहा था जिसकी छवि अच्छी नहीं हो।

'आप' बार-बार यह प्रचारित कर रही थी कि क्या विजय गोयल केजरीवाल की छवि के सामने टिक पाते हैं। इसीलिए 'आप' ऐसे सर्वे भी प्रोजेक्ट कर रही थी जिसमें केजरीवाल को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिलते दिखाया जा रहा था और शीला दीक्षित को नंबर तीन पर धकेला जा रहा था। इस चक्कर में विजय गोयल अपने आप बीजेपी के सीएम के चेहरे के रूप में स्थापित होते जा रहे थे। तब बीजेपी के कुछ शीर्ष नेताओं को चिंता हुई कि इस स्थिति में विजय गोयल को कैसे प्रोजेक्ट किया जा सकता है। 

ऐसे में चुनावों से सिर्फ़ कुछ दिन पहले ‘ईमानदारी’ के गुब्बारे का सामना करने के लिए बीजेपी डॉ. हर्षवर्धन को सामने ले आई। बीजेपी की तरफ़ से कहा गया कि केजरीवाल की ईमानदारी तो डॉ. हर्षवर्धन के सामने धरी की धरी रह जाएगी।

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फंस गई बीजेपी 

बीजेपी 'आप' के दबाव और चाल में फंस गई। यही तो 'आप' चाहती थी। बीजेपी को इसका दोहरा नुक़सान हुआ। एक तो यह कि आपने (बीजेपी) खु़द ही मान लिया कि विजय गोयल ईमानदारी के मामले में केजरीवाल और डॉ. हर्षवर्धन से उन्नीस हैं और दूसरा यह कि बीजेपी में इस फ़ैसले से जबरदस्त मतभेद पैदा हो गए। जहां पार्टी को जीत की पक्की उम्मीद थी, वह बहुमत से चार क़दम दूर रह गई। 

नतीजे आते ही डॉ. हर्षवर्धन ने अपनी एक और ईमानदारी का परिचय देते हुए घोषणा कर दी कि बीजेपी सरकार नहीं बनाएगी। सभी मानते हैं कि अगर विजय गोयल होते तो जोड़तोड़ करके सरकार बना डालते। बीजेपी तब इतनी आक्रामक भी नहीं थी कि गोवा और कर्नाटक में जैसे अब सरकार बनाई है, तब दिल्ली में बना लेती। बहरहाल, 'आप' के जाल में बीजेपी फंस गई और चेहरा घोषित करके उसने मात खा ली।

लगता था कि 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ज़रूर ही सबक लेते हुए आगे बढ़ेगी और वह इस बार जाल में नहीं उलझेगी लेकिन उसने कोई सबक नहीं सीखा।

बीजेपी ने किरन बेदी को उतारा

2015 में तो 'आप' ने इतना जबरदस्त दबाव बना दिया कि बीजेपी केजरीवाल का सामना करने के लिए उन्हीं की साथ की किरन बेदी को उतार बैठी। 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के समय दिल्ली में विधानसभा सस्पेंड थी क्योंकि किसी के पास बहुमत नहीं था। बीजेपी को 2014 में मिली सफलता के बाद तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी ने शानदार कामयाबी हासिल की थी। ऐसे में दिल्ली विधानसभा भंग करके नए चुनावों का ऐलान कर दिया गया। यह माना जा रहा था कि बीजेपी इन चुनावों को आसानी से जीत लेगी। 

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय थे लेकिन सभी जानते थे कि वह सीएम पद का चेहरा नहीं हैं। ऐसे में चेहरा कौन होगा। डॉ. हर्षवर्धन तो लोकसभा जीतकर मंत्री बन चुके थे और इस बार भी बीजेपी विजय गोयल को आगे लाना नहीं चाहती थी। बीजेपी चाहती तो हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड का फ़ॉर्मूला यहां भी लागू कर सकती थी जहां सीएम का फ़ैसला चुनावों के बाद करने का ऐलान किया गया था। 

2015 में 'आप' ने दिन-रात बीजेपी से एक ही सवाल पूछा कि क्या आपके पास दिल्ली में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए। यहां तक कहा गया कि क्या मोदी जी दिल्ली सरकार भी चलाएंगे।

बीजेपी फिर से 'आप' की चाल की शिकार बन गई और अरुण जेटली किरन बेदी को तुरूप का पत्ता मानते हुए दिल्ली का चेहरा बना बैठे। यहां तक कि प्रदेश कार्यालय में बेदी ने ख़ुद बैठना शुरू कर दिया और क़रीब 60 सांसदों को दिल्ली की कमान सौंप दी गई। 

किरन बेदी पहले ही दिन जिस तरह डॉ. हर्षवर्धन से उलझ बैठीं और पार्टी की एक मीटिंग में महासचिव आशीष सूद को डांट दिया, उससे पार्टी का चुनाव पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया। पार्टी पूरी तरह बिखर गई। किरन बेदी के आते ही स्थानीय नेता अलग-थलग पड़ गए और एक बार फिर 'आप' की चाल पूरी तरह कामयाब हो गई।

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'आप' ख़ुद ही बता रही नाम

अब फिर एक बार 'आप' बीजेपी के चेहरे को लेकर सवाल उठा रही है। 'आप' ख़ुद ही नाम भी बता रही है कि आख़िर चेहरा कौन होगा - विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता या मनोज तिवारी। जाहिर है कि 'आप' की चाल यही है कि तीनों नेताओं के मन में यह अभिलाषा पैदा करे कि वे पार्टी में सीएम का चेहरा बनने की कोशिश करें। इससे पार्टी फिर से गुटबाज़ी की शिकार हो जाए और हर नेता पार्टी को जिताने के बजाय दूसरों को हराने में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे। 

तीनों ने अब तक सख़्ती से यह भी नहीं कहा है कि नहीं मैं पार्टी का चेहरा नहीं हूं। वे कह रहे हैं कि पार्टी जो फ़ैसला करेगी, हमें मंजूर होगा। मनोज तिवारी ने कहा है कि हम मोदी जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे लेकिन 'आप' इस जवाब को तो 2015 में भी सुन चुकी है। अब वह फिर से बीजेपी पर दबाव बनाएगी। यह दबाव लगातार बढ़ता जाएगा और देखना यही है कि 'आप' की चाल इस बार सफल होती है या नहीं। अगर बीजेपी फिर से चेहरे के चक्कर में उलझ गई तो फिर 1998 से शुरू हुआ वनवास कैसे ख़त्म कर पाएगी। इस बार भी हार गए तो पार्टी नेता मोदी-शाह को अपना चेहरा कैसे दिखाएंगे।

दिलबर गोठी
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