दिल्ली जल बोर्ड में कथित घोटाला मामले में आप नेता सत्येंद्र जैन जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आ गए। दिल्ली की अदालत ने जमानत देते हुए जैन की गिरफ़्तारी पर बड़े सवाल उठाए हैं। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के करीब 27 महीने बाद बिना किसी नए ठोस कारण के अचानक की गई गिरफ्तारी मनमानी लगती है। इसके अलावा अदालत ने साफ़ साफ़ कह दिया कि जैन को गिरफ़्तार करने वाली एजेंसी एसीबी के पास प्रथम दृष्टया कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं है।

इस मामले में सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि जाँच एजेंसी ने दो साल से अधिक समय तक सत्येंद्र जैन को गिरफ्तार करने की ज़रूरत नहीं समझी। इसके बाद जाँच के अंतिम चरण में बिना किसी नए घटनाक्रम के अचानक गिरफ्तारी करना उचित नहीं कहा जा सकता।
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अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई जांच एजेंसी वर्षों तक किसी आरोपी को गिरफ्तार किए बिना जांच करती रहती है और आरोपी जांच में सहयोग भी करता है तो बाद में बिना मजबूत कारण बताए अचानक गिरफ्तारी करना मनमाना क़दम माना जा सकता है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने कहा कि इस मामले में एसीबी यह बताने में असफल रही कि आखिर ऐसा कौन-सा नया तथ्य सामने आया, जिसके कारण 27 महीने बाद गिरफ्तारी ज़रूरी हो गई।

'दो साल में जाँच में खास प्रगति नहीं हुई'

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि लंबे समय तक चली जाँच के दौरान एसीबी ने मुख्य रूप से दस्तावेज और जवाब इकट्ठा किए। जांच में ऐसा कोई बड़ा नया सबूत सामने नहीं आया, जिसके आधार पर गिरफ्तारी को ज़रूरी बताया जा सके। कोर्ट ने कहा कि एजेंसी को पहले पूरी जांच कर पर्याप्त सबूत जुटाने चाहिए थे उसके बाद ही गिरफ्तारी जैसे कदम पर विचार करना चाहिए था।

इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं मिले

जमानत आदेश में अदालत ने कहा कि पहली नजर में जांच एजेंसी सत्येंद्र जैन को अन्य सह-आरोपियों से जोड़ने वाले ठोस इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश नहीं कर सकी। कोर्ट के अनुसार व्हाट्सएप चैट में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, जिससे जैन की कथित साजिश में भूमिका साबित होती हो। 

कॉल रिकॉर्ड या एसएमएस जैसे अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी फिलहाल अदालत के सामने नहीं रखे गए, जो सत्येंद्र जैन को कथित रिश्वत या हवाला लेन-देन से जोड़ते हों।

कोर्ट ने यह भी माना कि सत्येंद्र जैन को जब-जब एसीबी ने पूछताछ के लिए बुलाया, वे जांच में शामिल हुए। इसके अलावा अन्य मामलों में भी उनकी अदालत में उपस्थिति का रिकॉर्ड संतोषजनक रहा है। अदालत ने कहा कि सत्येंद्र जैन दिल्ली के स्थायी निवासी हैं, पूर्व विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। ऐसे में उनके फरार होने की आशंका को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष कोई ठोस आधार नहीं दे सका।

एसीबी ने पुलिस हिरासत भी नहीं मांगी

कोर्ट ने अपने आदेश में एक और अहम बात कही। अदालत के अनुसार एसीबी ने गिरफ्तारी के बाद भी सत्येंद्र जैन की पुलिस रिमांड नहीं मांगी, बल्कि केवल न्यायिक हिरासत की मांग की। कोर्ट ने कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि जांच एजेंसी को उनसे हिरासत में पूछताछ की तत्काल कोई ज़रूरत नहीं थी।
अदालत ने यह भी कहा कि मामले में सत्येंद्र जैन द्वारा लिए गए कुछ फैसलों पर सवाल जरूर उठ सकते हैं और यह भी संभव है कि वह पूरी तरह निर्दोष न हों। लेकिन केवल इस आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय कानून में प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध अदालत में साबित न हो जाए।

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली पुलिस की एंटी करप्शन ब्रांच यानी एसीबी ने दिल्ली जल बोर्ड में कथित गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के मामले में सत्येंद्र जैन के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। इस मामले में उन्हें पिछले महीने गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद 19 अगस्त को अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। अब जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उन्हें राहत दे दी है।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

अपने आदेश में अदालत ने कहा कि यदि शुरुआती स्तर पर ही अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर दिखाई देता है तो अदालत जमानत देने के पक्ष में झुक सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी को किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी से पहले पर्याप्त और ठोस सबूत जुटाने चाहिए। केवल लंबे समय बाद बिना नए कारण के गिरफ्तारी करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
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सत्येंद्र जैन को जमानत मिलने से आम आदमी पार्टी को कानूनी स्तर पर राहत मिली है। हालांकि, अदालत ने यह साफ़ किया है कि जमानत देने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी निर्दोष घोषित हो गया है। मामले की जांच और सुनवाई आगे भी जारी रहेगी और अंतिम फैसला ट्रायल पूरा होने के बाद ही आएगा।