बिहार और असम के बाद अब दिल्ली सरकार ने जंतर-मंतर पर नीट प्रदर्शन से जुड़ी 13 FIR वापस लेने का फ़ैसला किया है। यह राहत उन लोगों पर लागू नहीं होगी जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है।
सीजेपी जंतर मंतर प्रोटेस्ट
कॉकरोच जनता पार्टी के लगातार दबाव के बीच बिहार और असम के बाद अब दिल्ली सरकार ने भी नीट प्रोटेस्टरों के ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर वापस लेने की घोषणा की है। जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ हुए छात्र आंदोलन से जुड़े मामलों में दिल्ली सरकार ने कहा है कि प्रदर्शन से जुड़ी 13 एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी और शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ आगे कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालाँकि, सरकार ने साफ़ कर दिया है कि जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है, उन्हें इस राहत का लाभ नहीं मिलेगा। उनके खिलाफ जांच और कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।
छात्र प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर वापस लेने और आपराधिक बैकग्राउंड वालों की एफ़आईआर बरकरार रखने का ऐसा ही फ़ैसला पहले बिहार और असम की सरकारों ने भी लिया है। इन सरकारों के फ़ैसले सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के तर्ज पर लगते हैं जिसमें अदालत ने कहा था कि जिन प्रदर्शनकारियों का आपराधिक रिकॉर्ड है उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
दिल्ली: गृह विभाग ने जारी किया आदेश
दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव (गृह) संतोष डी. वैद्य द्वारा जारी नोट में कहा गया है कि 29 जुलाई 2026 की शाम 6 बजे तक नीट-यूजी परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के विरोध में हुए प्रदर्शनों से जुड़े कुल 13 मामले दिल्ली पुलिस ने दर्ज किए थे।
सरकार ने कहा कि इन प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ अब कोई प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी और मामले को आगे बढ़ाने की सरकार की मंशा नहीं है। आदेश में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी और इस संबंध में भविष्य में कोई नई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
दिल्ली सरकार का यह फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के हालिया अंतरिम आदेश के बाद आया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि 18 वर्ष से कम उम्र के गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए छात्रों को रिहा किया जाए। जिन प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न की जाए। हालाँकि, सरकारें दर्ज एफआईआर की जांच जारी रख सकती हैं। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को अदालत की यह सुरक्षा नहीं मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इसी फ़ैसले के आधार पर दिल्ली सरकार ने साफ़ किया है कि केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को राहत दी जाएगी, जबकि आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों पर कार्रवाई जारी रहेगी।
गिरफ्तार लोगों की समीक्षा होगी
सरकार ने कहा है कि जिन लोगों को इन मामलों में गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है, उनके मामलों की जल्द समीक्षा की जाएगी। पात्र लोगों को शीघ्र रिहा करने की प्रक्रिया भी तेज़ी से पूरी की जाएगी।
सीजेपी ने लगाया था वादा तोड़ने का आरोप
इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी ने केंद्र सरकार पर 25 जुलाई को हुए समझौते का पालन नहीं करने का आरोप लगाया था। संगठन का कहना था कि समझौते के अनुसार सभी प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर वापस ली जानी थीं। गिरफ्तार छात्रों को रिहा किया जाना था। भविष्य में किसी भी छात्र के खिलाफ नया मामला दर्ज नहीं होना था। सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने चेतावनी दी थी कि यदि सरकार ने अपने वादे पूरे नहीं किए, तो संगठन फिर से देशव्यापी आंदोलन शुरू करेगा।सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर क्या कहा?
सीजेपी ने अपने बयान में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का चौथा दिशा-निर्देश बेहद चिंता का विषय है। सीजेपी का कहना है कि इस आदेश से सरकारें पहले से दर्ज मामलों की जाँच जारी रख सकती हैं और इसी का इस्तेमाल छात्रों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
सीजेपी का दावा है कि 25 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार ने भरोसा दिया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी एफ़आईआर वापस ली जाएंगी और किसी भी छात्र के ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्रवाई नहीं होगी। इसी आश्वासन के बाद संगठन ने अपना देशव्यापी आंदोलन ख़त्म किया था।
सीजेपी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्य अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सहारा लेकर छात्रों के ख़िलाफ़ पुराने मामलों को आगे बढ़ा सकते हैं। इसका कहना है कि इससे हजारों छात्रों को अनावश्यक कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
सीजेपी के प्रवक्ता सौरभ दास ने कहा है, 'सरकार को फ़ायदा पहुँचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का राजनीतिकरण नहीं किया जा सकता है। उन फ़ायदों को हासिल करने के लिए कोर्ट के आदेशों का हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। देश के सामने एक पक्का वादा किया गया था। उसका सम्मान किया जाना चाहिए। सभी FIR वापस ली जानी चाहिए।'
सीजेपी ने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार को 25 जुलाई के समझौते और उसके बाद हुई बातचीत की पूरी जानकारी थी तब उसके वकीलों ने यह बात सुप्रीम कोर्ट के सामने क्यों नहीं रखी। संगठन ने कहा कि अदालत का आदेश सरकार द्वारा दी गई सार्वजनिक गारंटी के विपरीत है और इससे युवाओं का भरोसा टूट सकता है।
बिहार और असम ने भी उठाया कदम
दिल्ली के फैसले से पहले बिहार और असम की सरकारें भी घोषणा कर चुकी हैं कि 26 जुलाई की शाम 6 बजे से पहले छात्र आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज मामले वापस लिए जाएंगे और उन्हें रिहा किया जाएगा। इन राज्यों में आपराधिक रिकॉर्ड वालों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर वापस नहीं लेने की घोषणा की गई है।
नीट-यूजी पेपर लीक के आरोपों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबा आंदोलन चलाया था। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई थी, जिसके बाद कई एफआईआर दर्ज की गई थीं।
बाद में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत हुई और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे सहित कई मांगों पर सहमति बनने के बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया था। बहरहाल, अब दिल्ली सरकार के 13 एफआईआर वापस लेने के फैसले को आंदोलन के बाद हुई सहमति को लागू करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। हालाँकि, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस राहत से बाहर रखने के कारण आने वाले दिनों में इस फैसले पर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी रह सकती है।