जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा आप नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के आदेश के आधार पर आम आदमी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने और अरविंद केजरीवाल व अन्य नेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की याचिका लगाई गई थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द करने और अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया व दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने वाली जनहित याचिका को बुधवार को खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह गलत और बेबुनियाद बताया। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि याचिका में दिए गए तर्क बिल्कुल आधारहीन हैं। याचिकाकर्ता ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा आप नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के आदेश के आधार पर यह याचिका लगाई थी।
इस पर हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा आप नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के आदेश को सिर्फ उसी मामले तक सीमित समझा जाएगा। इसे पूरे पार्टी या संविधान के प्रति निष्ठा न होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की, 'यह दलील बिल्कुल बेबुनियाद है। अवमानना का आदेश केवल उसी मामले के लिए है, इसे दूसरे किसी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।'
चुनाव आयोग के अधिकार पर फ़ैसला
याचिकाकर्ता सतीश कुमार अग्रवाल ने चुनाव आयोग से आप का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने यह मांग भी खारिज कर दी और कहा कि चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल को रद्द करने की सामान्य शक्ति नहीं है। इंडियन नेशनल कांग्रेस बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर केस में सुप्रीम कोर्ट के 2002 के फ़ैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग केवल तीन विशेष परिस्थितियों में ही किसी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर सकता है-
- अगर रजिस्ट्रेशन धोखे से लिया गया हो।
- अगर पार्टी का नाम या विवरण बदलकर कानून का उल्लंघन किया गया हो।
- अगर पार्टी खुद चुनाव आयोग को बताए कि वह संविधान में विश्वास नहीं रखती।
कोर्ट ने कहा कि इस याचिका में इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि न्यायमूर्ति शर्मा के आदेश से साबित होता है कि आप नेता संविधान के प्रति निष्ठा नहीं रखते, इसलिए पार्टी को रद्द किया जाना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इसे बहुत दूर की कौड़ी बताया और कहा कि पार्टी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि वह संविधान में विश्वास नहीं रखती।
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, 'क्या कोई कानून है जो राजनीतिक दल को रद्द करने की इजाजत देता है?' वकील को कोई सीधा जवाब नहीं दे पाए।
कोर्ट ने आगे कहा, 'अगर कोई व्यक्ति अदालत का अपमान करता है तो उसके खिलाफ अवमानना कानून के तहत कार्रवाई होती है। इससे पूरा दल रद्द नहीं हो सकता। व्यक्तिगत नेताओं की गलती को पूरे दल से जोड़कर रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग सही नहीं है।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा फैसले से जुड़ा है केस
यह याचिका जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के उस आदेश पर आधारित थी जिसमें आप नेताओं के खिलाफ क्रिमिनल कंटेम्प्ट की कार्यवाही शुरू की गई थी। दरअसल, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा और अरविंद केजरीवाल का यह पूरा मामला दिल्ली हाईकोर्ट में शराब नीति घोटाला से जुड़ा एक विवादित घटनाक्रम है।सीबीआई ने दिल्ली शराब नीति 2021-22 घोटाले में कई आप नेताओं के खिलाफ चार्जशीट दायर की। निचली अदालत ने केजरीवाल समेत कुछ आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में उस फ़ैसले को चुनौती दी। यह अपील जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में आई।
केजरीवाल और अन्य ने जस्टिस शर्मा से केस सुनने से हटने की मांग की। आरोप लगाया गया कि जज के बच्चों को केंद्र सरकार की तरफ से वकील के तौर पर पैनल में रखा गया है और इस तरह से यह कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटेरेस्ट का मामला है। बाद में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 115 पेज के विस्तृत फैसले में रेक्यूजल याचिका खारिज कर दी। उन्होंने कहा कि बिना ठोस सबूत के जज पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने अपने बच्चों के सरकारी पैनल में होने को भी पर्याप्त आधार नहीं माना।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा और अरविंद केजरीवाल
केजरीवाल का बहिष्कार
फ़ैसले के बाद केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा को पत्र लिखा और कहा कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद टूट चुकी है। उन्होंने गांधीजी के सत्याग्रह का हवाला देते हुए अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया।
मई 2026 में जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज आदि आप नेताओं के खिलाफ क्रिमिनल कॉन्टेम्प्ट की कार्यवाही शुरू की। कारण बताया गया कि सोशल मीडिया पर जज के खिलाफ अपमानजनक और कलंक लगाने वाला अभियान चलाया गया। कॉन्टेम्प्ट शुरू करने के बाद जस्टिस शर्मा ने खुद को शराब नीति केस से अलग कर लिया। अब यह केस किसी अन्य बेंच को ट्रांसफर हो गया है।
बहरहाल, दिल्ली हाईकोर्ट के इस फ़ैसले से आप को बड़ी राहत मिली है। पार्टी अब बिना किसी कानूनी अड़चन के चुनाव लड़ने के लिए तैयार रह सकती है। यह फैसला राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन और चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर अहम माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि बिना ठोस आधार के किसी पार्टी को खत्म करने की कोशिश नहीं की जा सकती।