दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में जब आप रिंग रोड से माल रोड की तरफ जाने के लिए मुड़ते हैं तो एक तरफ आई.पी. कॉलेज है तो दूसरी तरफ है 33 शामनाथ मार्ग। 33 शामनाथ मार्ग का बंगला बरसों से वीरान पड़ा है। 1920 में इस बंगले को अंग्रेजों ने बनवाया था और 1911 में जब कलकत्ता से राजधानी दिल्ली ट्रांसफर हुई थी तो इस पॉश इलाके का यह बंगला सभी की पसंद था। साढ़े पांच हजार वर्ग मीटर में फैला यह बंगला दो मंजिला बना हुआ है जिसमें उस समय के आला अफसर रहा करते थे। इस विशाल बंगले में चार बैडरूम के साथ ड्राइंग रूम, डाइनिंग हॉल, कांफ्रेंस रूम तो है ही, स्टाफ़ के रहने के लिए क्वार्टर बने हुए हैं। सारी सुविधाओं के होते हुए भी यह बंगला बरसों से खाली पड़ा है। अब इस बंगले को गिराने के आदेश आ गए हैं। कहा जाता है कि अब इसमें स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी का ऑफिस बनाया जाएगा क्योंकि इस विशाल बंगले में रहने के लिए कोई तैयार नहीं है।
इस बंगले के साथ एक अंधविश्वास जुड़ा रहा है। अंधविश्वास यह है कि जो भी इस बंगले में आकर रहता है, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं करता। उसे इस्तीफा देना पड़ जाता है या फिर असमय ही उसकी मृत्यु हो जाती है। कोई भी व्यक्ति ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहता कि उसका करियर चौपट हो जाए या फिर जान के ही लाले पड़ जाएं। यह कोई नहीं जानता इस अंधविश्वास को किसने हवा दी या फिर आखिर कैसे यह स्थापित हुआ लेकिन लोग उदाहरण देकर इस बंगले को हमेशा मनहूस ही कहते रहे।
दिल्ली के पहले सीएम का आवास था
आजादी से पहले का तो रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है लेकिन कहा जाता है कि आजादी के बाद इसे सबसे पहले 1952 में दिल्ली के मुख्यमंत्री चौ. ब्रह्मप्रकाश को अलॉट किया गया था। दरअसल, यह बंगला दिल्ली विधानसभा (ओल्ड सेक्रेट्रिएट) के बहुत करीब है। चौ. ब्रह्मप्रकाश यहां रहने के लिए तो नहीं आए लेकिन उन्होंने यहां अपना एक ऑफिस बनाया था और लोगों से यहीं मिला करते थे। दरअसल, उस दौर में जनता से जुड़े नेता यह बात गवारा नहीं करते थे कि चुनाव जीतने के बाद वे किसी आलीशान बंगले में रहने चले जाएँ। ऐसा करने पर उनका संपर्क जनता से टूटने का ख़तरा रहता था। मगर, चौ. ब्रह्मप्रकाश का इस बंगले में ऑफिस बनना भी एक तरह से अशुभ रहा क्योंकि पं. जवाहरलाल नेहरू से मतभेद होने के कारण उन्हें 1955 में इस्तीफा देना पड़ा था और जाहिर है कि यह बंगला भी खाली करना पड़ा था। हालांकि उनके बाद सरदार गुरमुख निहाल सिंह मुसाफिर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने लेकिन केंद्र सरकार को दिल्ली में विधानसभा का आइडिया ही पसंद नहीं आया। इसलिए दिल्ली में विधानसभा ही खत्म कर दी गई। इसके बाद यह बंगला दिल्ली के बड़े अफसरों को ही अलॉट किया जाता रहा।
अंधविश्वास की सुगबुगाहट
1993 में दिल्ली को फिर से विधानसभा मिली तो फिर इस बंगले को सीएम हाउस के रूप में पेश किया गया। हालाँकि तब इस बंगले के बारे में लोगों में अंधविश्वास की सुगबुगाहट तो थी लेकिन नए मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने इस पर कान नहीं धरे। उन्होंने इस बंगले को अपना ऑफिस बनाया और कुछ दिन यहां परिवार के साथ रहे भी, लेकिन कीर्ति नगर में उन्होंने अपना निजी घर नहीं छोड़ा। बंगले में उनके रहते हुए ही दिल्ली की राजनीति में उस समय बवंडर मच गया जब जैन बंधुओं की हवाला रिपोर्ट सामने आई। खुराना जी अपनी सरकार के दो साल के जश्न मनाने में व्यस्त थे लेकिन हवाला डायरी में नाम आने पर उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। उनका यह फैसला इस बंगले के मनहूस होने के साथ ही चस्पा हो गया। खुराना की जगह साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के नए मुख्यमंत्री बने और उन्हें भी मुख्यमंत्री होने के नाते यह बंगला ऑफर किया गया लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने इस बंगले से थोड़ी ही दूरी पर 9 शामनाथ मार्ग के बंगले में ही रहना गवारा किया जोकि उन्हें खुराना सरकार में शिक्षा मंत्री होने के नाते मिला था। हालांकि वर्मा भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और उनकी जगह दो महीने के लिए सुषमा स्वराज को दिल्ली की बागडोर सौंपी गई लेकिन उन्हें न तो यह बंगला अलॉट ही हुआ और न ही उन्हें इसकी जरूरत पड़ी।1998 के चुनाव में बीजेपी की जबरदस्त हार के बाद शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। उन्हें यह बंगला दिखाया गया लेकिन उन्होंने इस बंगले को लेने से इनकार कर दिया।
इससे पहले शीला दीक्षित निजामुद्दीन में रहा करती थीं। इस बंगले की बजाय उन्होंने अपेक्षाकृत छोटे घर एबी—17 मथुरा रोड पर ही रहना उचित समझा। तब तक मुख्यमंत्री और मंत्रियों का कार्यालय भी ओल्ड सेक्रेट्रिएट से हटकर आईटीओ के पास दिल्ली सचिवालय में आ गया था। मुख्यमंत्री का घर इससे ज्यादा दूर नहीं था। शीला दीक्षित बाद में 3 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर शिफ्ट हो गई थीं जहां वह 2013 तक रहीं।
मंत्री दीपचंद बंधु का बीमारी से निधन
इसी बीच, इस बंगले के साथ अंधविश्वास का एक और मामला जुड़ा जब शीला सरकार के मंत्री दीपचंद बंधु ने यहां आकर रहना स्वीकार कर लिया। दीपचंद बंधु लगभग दो साल तक शीला सरकार में मंत्री रहे लेकिन 2003 के विधानसभा चुनावों से कुछ पहले ही इस बंगले में रहते हुए वह बीमार पड़ गए और बाद में अपोलो अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। उसके बाद किसी भी मुख्यमंत्री तो क्या किसी मंत्री ने भी यहां आकर रहने का जोखिम नहीं उठाया।इस दौरान 33 शामनाथ मार्ग के बंगले को स्टेट गेस्ट हाउस के रूप में बदलने की बातें अक्सर होती रहीं। 2013 में दिल्ली सरकार के आला अफसर शक्ति सिन्हा इस बंगले में आकर रहे। उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें दिल्ली का चीफ सेक्रेट्री बनाया जाएगा लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने स्वैच्छिक रिटायरमेंट ले ली। एक तरह से वह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
अब तक यह बंगला पूरी तरह से मनहूस प्रचारित हो चुका था। 2013 में कांग्रेस सरकार की हार के बाद अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने लेकिन उन्होंने भी इस बंगले में रहना स्वीकार नहीं किया। इसकी बजाय उन्होंने कुछ ही दूरी पर 6 फ्लेग रोड का जर्जर बंगला ही चुन लिया। 6 फ्लेग रोड के बंगले पर ही बाद में शीशमहल बना। बहरहाल, 33 शामनाथ मार्ग का बंगला मनहूस बंगला ही बनकर रह गया। 2025 में बीजेपी की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को भी यह बंगला पसंद नहीं आया जबकि उनके सामने कई विकल्प रखे गए थे। दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्री रविंद्र इंद्राज इस बंगले को देखने अवश्य आए थे लेकिन जब इसका सारा इतिहास उनके सामने आया तो फिर उनकी हिम्मत भी इस बंगले में घुसने की नहीं हुई।
अब इस बंगले की जगह पर बहुमंजिला इमारत बनाई जाएगी। हालांकि यमुना के एकदम किनारे पर स्थित होने की बंदिशों के कारण यहां गगनचुंबी इमारत तो नहीं बन सकती लेकिन यह तय है कि इस बिल्डिंग में केवल ऑफिस ही होंगे, किसी का आशियाना नहीं बनेगा।