आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वह एक्साइज पॉलिसी मामले में उनकी अदालत के सामने पेश नहीं होंगे। सिसोदिया ने भी जज को लेकर वही आरोप लगाए हैं, जो केजरीवाल ने लगाए थे। केजरीवाल ने कहा था कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं। उनके दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं, जहां से उन्हें सैलरी मिलती है। ऐसे में हितों के टकराव को देखते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बजाय किसी अन्य जज की कोर्ट में पेश होना चाहेंगे। सिसोदिया ने भी पत्र लिखकर इन्हीं आरोपों को दोहराया है।
यह फैसला पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के एक दिन पहले ही लिए गए समान निर्णय के ठीक बाद आया है। केजरीवाल ने भी जस्टिस शर्मा की अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने या कोई वकील नियुक्त करने से इनकार कर दिया था।
20 अप्रैल 2026 को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों की रेक्यूसल याचिका खारिज कर दी थी। इनमें जज के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाया गया था। जस्टिस शर्मा ने कहा था कि याचिकाओं में कोई ठोस सबूत नहीं हैं, बल्कि केवल “आरोप और संदेह” हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक नेता बिना आधार के न्यायपालिका पर हमला नहीं कर सकते।
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सत्याग्रह के अलावा कोई विकल्प नहींः सिसोदिया

X पर पत्र साझा करते हुए सिसोदिया ने लिखा, “अत्यंत आदर के साथ, मैंने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांत शर्मा को पत्र लिखकर निवेदन किया है कि मौजूदा हालात में, मेरी अंतरात्मा मुझे इस मामले की कार्यवाही में आगे भाग लेने की अनुमति नहीं देती है। मेरे लिए यह किसी व्यक्ति विशेष का सवाल नहीं है, बल्कि उस विश्वास का सवाल है जिस पर न्याय व्यवस्था टिकी है। न्याय न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि हर नागरिक को निष्पक्ष नज़र भी आना चाहिए।” उन्होंने आगे कहा, “मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि न्यायपालिका और संविधान में मेरा विश्वास पूरी तरह अडिग है। लेकिन जब मन में गंभीर संदेह उत्पन्न होते हैं, तो केवल औपचारिक भागीदारी मेरे लिए उचित नहीं है। इसलिए, मेरे पास सत्याग्रह के अलावा कोई विकल्प नहीं है…।”
सिसोदिया ने लिखा, “कल, 27 अप्रैल 2026 को, अरविंद केजरीवाल ने जज महोदया को एक पत्र लिखकर इस मामले की आगे की कार्यवाही में भाग लेने में असमर्थता के कारण बताए। मैंने उस पत्र के सार पर ध्यानपूर्वक विचार किया है। ऐसा करने के बाद, मैं उनके द्वारा लिए गए रुख से पूरी तरह सहमत हूँ, जो महात्मा गांधी के सत्याग्रह संबंधी उपदेशों पर आधारित है।” उन्होंने आगे कहा, “मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस मामले के दो पहलू मुझे बहुत परेशान करते हैं। पहला मुद्दा माननीय जज महोदया की अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (आरएसएस से संबंधित वकीलों के संगठन) में बार-बार सार्वजनिक उपस्थिति से संबंधित है। दूसरा मुद्दा माननीय जज महोदया के बच्चों का केंद्र सरकार के कई पैनलों में प्रोफेशनल रूप से शामिल होना है, और इसके परिणामस्वरूप उन न्यायिक अधिकारियों से उनकी निकटता का आभास होता है जो अब मेरे विरुद्ध दूसरी तरफ पेश हो रहे हैं।”

जज साहिबा को खुद ही तथ्यों का खुलासा कर देना चाहिए थाः सिसोदिया

उन्होंने अरविंद केजरीवाल के पत्र में दिए गए उदाहरणों का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने बताया कि कुछ जजों ने तो अपने राज्य से तबादला भी करवा लिया जब उनके बच्चों ने उसी क्षेत्राधिकार में वकालत शुरू कर दी। उन्होंने इसे देश में अपनाए जाने वाले "न्यायिक नैतिकता का उच्च मानक" बताया। उन्होंने वर्तमान मामले में निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठाए और पूछा कि स्पष्टवादिता और स्व-नियमन के न्यूनतम कर्तव्य क्या होने चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अभिभावक जज का यह कर्तव्य नहीं था कि वे ऐसी परिस्थितियों का शुरुआत में ही खुलासा करें। क्या सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को इन तथ्यों को न्यायालय और वादियों के सामने पूरी निष्पक्षता के साथ नहीं रखना चाहिए था। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या इस मामले में, इसकी "असाधारण राजनीतिक संवेदनशीलता" को देखते हुए, अधिक सावधानी, खुलासे और संस्थागत जांच की आवश्यकता थी।
दिल्ली एक्साइज पॉलिसी (शराब नीति) घोटाले से जुड़े इस मामले में CBI ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की है, जिसमें फरवरी 2026 में केजरीवाल, सिसोदिया समेत 21 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था। मनीष सिसोदिया ने जस्टिस शर्मा को पत्र लिखकर स्पष्ट रूप से कहा कि वह उनकी अदालत में पेश नहीं होंगे। इससे पहले केजरीवाल ने भी यही रुख अपनाया था। दोनों नेताओं का यह कदम रेक्यूसल याचिका खारिज होने के बाद आया है। यह घटनाक्रम दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले को नई दिशा दे रहा है, जिसमें CBI और ED दोनों एजेंसियां सक्रिय हैं। हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई जारी है।