राहुल गांधी को की गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कन्हैया कुमार डूसू चुनाव के दौरान कैंपस में मौजूद नहीं रहते थे। उन्होंने स्थानीय छात्र नेताओं से पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना फैसले लिए। शिकायत में हार के लिए पूरी तरह कन्हैया कुमार को जिम्मेदार ठहराया गया है।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 में कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के चारों केंद्रीय पदों पर हार के बाद संगठन के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। NSUI के एक सदस्य ने संगठन के प्रभारी कन्हैया कुमार की कार्यशैली और चुनावों में उनकी भूमिका को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से शिकायत की है।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायत में मुख्य रूप से उम्मीदवारों के चयन, टिकट के दावेदारों के साथ व्यवहार और विश्वविद्यालय परिसरों में चुनावी गतिविधियों के दौरान संगठन के शीर्ष नेतृत्व की कथित कम सक्रियता पर सवाल उठाए गए हैं।
कन्हैया कुमार पर जमीनी स्तर से दूरी का आरोप
शिकायत करने वाले NSUI सदस्य का आरोप है कि कन्हैया कुमार चुनाव के दौरान पर्याप्त रूप से कैंपस में मौजूद नहीं थे और उन्होंने स्थानीय छात्र नेताओं से पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना फैसले लिए। सदस्य के मुताबिक, संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं को चुनावी परिस्थितियों की बेहतर जानकारी थी, लेकिन उनकी राय को फैसलों में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।इस असंतोष का सबसे प्रमुख उदाहरण DUSU उपाध्यक्ष पद के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने वाले दीपांशु शौकीन का मामला बताया जा रहा है। शौकीन पहले NSUI से जुड़े थे और संगठन से टिकट की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।
दीपांशु शौकीन का टिकट विवाद बना बड़ा मुद्दा
दीपांशु शौकीन ने DUSU उपाध्यक्ष चुनाव में 30,615 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। इसके मुकाबले NSUI के आधिकारिक उम्मीदवार वीर चतरथ को सिर्फ 4,313 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे। NSUI के एक पदाधिकारी के मुताबिक, संगठन ने वीर चतरथ का टिकट पहले ही तय कर दिया था। उनका दावा है कि शौकीन अध्यक्ष पद से चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन संगठन की ओर से उन्हें अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए कहा गया।पदाधिकारी ने यह भी आरोप लगाया कि चतरथ का टिकट पहले ही तय हो चुका था और संगठन उसे बदलना नहीं चाहता था। इसकी वजह उन्होंने चतरथ का एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता का बेटा होना बताई। यह दावा संबंधित पदाधिकारी ने अपनी पहचान सार्वजनिक न करने की शर्त पर किया है। शौकीन के निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला करने के बाद भी संगठन के किसी वरिष्ठ नेता ने कथित तौर पर उनसे संपर्क कर उन्हें वापस NSUI में लाने की कोशिश नहीं की।
आर्थिक संसाधनों को लेकर भी सवाल
एक अन्य NSUI पदाधिकारी ने आरोप लगाया कि चुनाव प्रचार के दौरान शौकीन से उनके खर्च और आर्थिक संसाधनों को लेकर सवाल किए जाते थे।पदाधिकारी के अनुसार, शौकीन के पास बड़े आर्थिक संसाधन या महंगी गाड़ियां नहीं थीं। उनका कहना था कि वे दिल्ली परिवहन निगम (DTC) के बस कंडक्टर के बेटे हैं और दूसरे उम्मीदवारों की तरह चुनाव में बड़ी रकम खर्च करने की स्थिति में नहीं थे। NSUI के अंदर से उठी इस शिकायत में इसे संगठन की कार्यशैली और जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार से जोड़कर देखा गया है। हालांकि, ये आरोप संगठन के कुछ सदस्यों के दावे हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया गया है।विशेष यादव का मामला भी सामने आया
शौकीन अकेले ऐसे उम्मीदवार नहीं थे जिन्होंने टिकट विवाद के बाद NSUI से अलग होकर चुनाव लड़ा। एक अन्य दावेदार विशेष यादव ने संयुक्त सचिव पद का चुनाव संगठन से बाहर रहकर लड़ा। उन्हें 15,778 वोट मिले, जबकि NSUI के आधिकारिक उम्मीदवार गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले। यानी विशेष यादव को संगठन के आधिकारिक उम्मीदवार से 572 वोट अधिक मिले, हालांकि वे ABVP के लक्ष्य राज सिंह से पीछे रहे।2015 के बाद पहली बार चारों सीटों पर हार
DUSU चुनाव में इस बार NSUI का प्रदर्शन उसके हाल के चुनावी रिकॉर्ड की तुलना में कमजोर रहा।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक NSUI ने:
- 2023 में: 1 केंद्रीय पद जीता
- 2024 में: 2 पद जीते
- 2025 में: 1 पद जीता
- 2026 में: एक भी केंद्रीय पद नहीं जीता
2026 में चारों केंद्रीय पदों पर हार 2015 के बाद पहली बार हुई है। इस चुनाव में ABVP ने चार में से तीन पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष का पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन के खाते में गया।
सोशल मीडिया बनाम जमीनी संगठन का सवाल
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को भेजी गई शिकायत में NSUI नेतृत्व पर सोशल मीडिया और X पर दिखाई देने वाली राजनीतिक गतिविधियों को जमीनी संगठनात्मक कामकाज से ज्यादा महत्व देने का आरोप भी लगाया गया है। कुछ NSUI सदस्यों ने दावा किया कि टिकट वितरण के बाद चुनाव प्रचार के महत्वपूर्ण चरण में संगठन के वरिष्ठ नेताओं की जमीनी मौजूदगी सीमित रही। उनके मुताबिक, इससे कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं में असंतोष बढ़ा।NSUI के राष्ट्रीय संगठनात्मक ढांचे पर भी सवाल
विवाद केवल DUSU चुनाव तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। ThePrint के मुताबिक, NSUI के एक अन्य सदस्य ने संगठन के राष्ट्रीय स्तर के संगठनात्मक ढांचे को लेकर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि NSUI अध्यक्ष विनोद जाखड़ के पद संभालने के लगभग आठ महीने बाद भी राष्ट्रीय संगठनात्मक निकायों का गठन नहीं किया गया था। इन निकायों की भूमिका संगठन के जमीनी विस्तार और छात्रों के बीच संपर्क बढ़ाने से जुड़ी होती है।एक अन्य पूर्व कॉलेज छात्र नेता ने कहा कि NSUI प्रभारी के तौर पर कन्हैया कुमार को कॉलेज स्तर के नेताओं के साथ नियमित संवाद करना चाहिए था। उनका आरोप था कि ऐसा पर्याप्त रूप से नहीं हुआ और इससे संगठन के भीतर नेतृत्व और संवाद को लेकर समस्या पैदा हुई।
सोशल मीडिया पर भी असंतोष के संकेत
NSUI के एक अन्य सदस्य ने X पर संगठन और उसके नेतृत्व को लेकर गंभीर आत्ममंथन की जरूरत बताने वाला पोस्ट किया था। हालांकि, बाद में यह पोस्ट डिलीट कर दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि DUSU चुनाव में हार के बाद संगठन के भीतर केवल टिकट वितरण को लेकर ही सवाल नहीं उठ रहे हैं, बल्कि नेतृत्व, संगठनात्मक संवाद और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की भागीदारी को लेकर भी असंतोष है।क्या है पूरा विवाद?
DUSU चुनाव में NSUI की हार के बाद सामने आए विवाद के तीन प्रमुख पहलू हैं—टिकट वितरण, बागी उम्मीदवारों का प्रदर्शन और संगठन के शीर्ष नेतृत्व की जमीनी सक्रियता। दीपांशु शौकीन की भारी जीत और विशेष यादव के आधिकारिक NSUI उम्मीदवार से ज्यादा वोट हासिल करने ने टिकट चयन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं NSUI के भीतर से आई शिकायतों ने कन्हैया कुमार और संगठन के मौजूदा नेतृत्व की कार्यशैली को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।हालांकि, इन शिकायतों और आरोपों का बड़ा हिस्सा संगठन से जुड़े अज्ञात या अनाम सदस्यों के हवाले से सामने आया है। इसलिए इन्हें NSUI के पूरे संगठन की आधिकारिक राय नहीं माना जा सकता। कन्हैया कुमार और NSUI नेतृत्व की प्रतिक्रिया इस विवाद के दूसरे पक्ष को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगी।