दिल्ली में UNI दफ्तर सीलिंग के दौरान पत्रकारों से कथित बदसलूकी पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत तीन संगठनों ने कड़ी निंदा की। पढ़िए, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल क्यों उठ रहे हैं।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया यानी पीसीआई सहित तीन प्रमुख पत्रकार संगठनों ने शनिवार को यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया यानी यूएनआई के दफ्तर को सील करने के दौरान पत्रकारों के साथ कथित बदसलूकी की कड़ी निंदा की है। यह घटना शुक्रवार शाम को दिल्ली के रफी मार्ग पर यूएनआई के मुख्यालय में हुई, जब दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस ने दफ्तर को सील कर दिया।
कथित बदसलूकी को लेकर पीसीआई के अलावा एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया यानी ईजीआई और इंडियन वीमेन्स प्रेस कॉर्प्स यानी आईडब्ल्यूपीसी ने कहा कि यूएनआई को ज़मीन के आवंटन को रद्द करने वाले हाई कोर्ट के आदेश को लागू करने में अनावश्यक जल्दबाज़ी दिखाई गई और शुक्रवार शाम इस प्रक्रिया के दौरान पत्रकारों के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया।
महिला पत्रकारों पर भी बल प्रयोग: पीसीआई
इस घटना पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने एक बयान जारी करके कहा कि यूएनआई के कई पत्रकारों ने बताया कि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ़ के जवानों ने उन्हें जबरदस्ती बाहर निकाला और उनके निजी सामान लेने भी नहीं दिया। बयान में कहा गया, 'प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया को यूएनआई के दफ्तर में काम कर रहे पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा की गई मारपीट से बहुत सदमा लगा है।'पीसीआई ने अधिकारियों के कथित बल प्रयोग की निंदा की और कहा कि महिला पत्रकारों को भी बल प्रयोग करके बाहर निकाला गया। पत्रकारों ने पुलिस को बताया था कि मैनेजमेंट ने कोर्ट के आदेश के बाद अभी कोई खाली करने का निर्देश नहीं दिया था, लेकिन फिर भी उन्हें जबरदस्ती हटाया गया।
प्रेस क्लब ने कहा कि ऐसा करना काम करने के अधिकार का उल्लंघन है, जो संविधान में गारंटी दिया गया है। उन्होंने मांग की कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो। पीसीआई ने प्रभावित पत्रकारों के साथ एकजुटता जताई और कहा कि प्रेस की आजादी और काम करने के अधिकार की रक्षा ज़रूरी है।
ईजीआई का बयान
ईजीआई ने कहा कि हाई कोर्ट की वेबसाइट पर आदेश उपलब्ध होने से पहले ही, सैकड़ों पुलिस और पैरामिलिट्री जवानों की एक टुकड़ी यूएनआई के दफ़्तर पहुँच गई थी। महिला कर्मचारी सहित वहाँ मौजूद पत्रकारों को ज़बरदस्ती बाहर निकाल दिया गया, जबकि वे उस समय अपना काम कर रहे थे।
गिल्ड ने कहा कि वह हाई कोर्ट के आदेश को लागू करने की ज़रूरत पर कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन जो बात परेशान करने वाली थी, वह थी सही प्रक्रिया का पालन न होना और अधिकारियों द्वारा ताक़त का साफ़ तौर पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रदर्शन करना।
महिला पत्रकारों को भी नहीं बख़्शा: IWPC
आईडब्ल्यूपीसी ने कहा कि जहाँ एक तरफ़ न्यायिक प्रक्रिया अपने हिसाब से आगे बढ़ी वहीं दूसरी तरफ़ दफ़्तर में मौजूद पत्रकारों के साथ पुलिस ने बेहद बुरा बर्ताव किया। इसने कहा, 'उस दिन यूएनआई के दफ़्तर को खाली कराने की कार्रवाई के दौरान पुलिस ने जिस तरह से काम किया, उसे वहाँ मौजूद लोगों के अनुसार, मनमाना, सख़्त और गरिमा के विपरीत माना जा सकता है। कहा जा रहा है कि महिला पत्रकारों को भी नहीं बख़्शा गया।'
संगठन ने कहा कि जहाँ एक तरफ़ इस मामले की कानूनी पेचीदगियाँ और हाई कोर्ट का फ़ैसला सार्वजनिक जानकारी में हैं और एक तय प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रहे हैं, वहीं यह चौंकाने वाली बात है कि देश की राजधानी में सबसे पुराने और सबसे सम्मानित मीडिया संस्थानों में से एक के न्यूज़रूम में ऐसी कार्रवाई की गई। इसने कहा, 'ये घटनाएँ संस्थान की गरिमा को कम करती हैं, प्रेस की आज़ादी को ख़तरे में डालती हैं। इन्हें एक गड़बड़ी के तौर पर देखा जा सकता है, ख़ास तौर पर इस पेशे में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा के मामले में।'
मीडिया की आज़ादी पर हमला: UNI
यूएनआई मैनेजमेंट ने इस कार्रवाई को अभूतपूर्व उत्पीड़न और मीडिया की आजादी पर हमला बताया है। यूएनआई का दफ्तर 9, रफी मार्ग पर है, जो दिल्ली के दिल में संसद और कई मंत्रालयों के पास है। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अधीन आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस ने शुक्रवार को हाई कोर्ट के आदेश के बाद दफ्तर को सील किया।कोर्ट ने यूएनआई की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें भूमि आवंटन रद्द करने को चुनौती दी गई थी। यह ज़मीन दशकों पहले यूएनआई को दी गई थी, लेकिन यूएनआई ने 45 सालों में शर्तों का पालन नहीं किया। शर्त थी कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के साथ मिलकर एक कॉम्पोजिट बिल्डिंग बनाई जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि मूल्यवान सरकारी जमीन को बंधक बनाकर रखा गया था। कोर्ट ने लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस को तुरंत कब्जा लेने का आदेश दिया।
पत्रकारों का आरोप है कि कोई नोटिस नहीं दिया गया, उन्हें खींचकर बाहर निकाला गया और धक्का-मुक्की की गई। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि 50 से ज्यादा पत्रकारों को जबरदस्ती हटाया गया। मीडिया जगत में इस घटना से चिंता बढ़ गई है। कई संगठनों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि कार्रवाई करने के दौरान संयम बरतना चाहिए था। अभी तक सरकार या पुलिस की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत जवाब नहीं आया है।
यह घटना प्रेस की आजादी और कार्यस्थल पर सुरक्षा के मुद्दे को फिर से उठा रही है। प्रेस क्लब ने कहा कि ऐसी घटनाएं पत्रकारों के मनोबल को तोड़ती हैं और लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका को प्रभावित करती हैं।