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फ़ोटो साभार: ट्विटर/साउथ एशिया रिसर्च इंस्टीट्यूट फ़ोर माइनरिटीज

दिल्ली में चर्च ढहाने के बाद विवाद; ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार क्यों नहीं?

दिल्ली के छतरपुर में एक चर्च के ढहाने के बाद विवाद हो गया है। इसको एक सरकारी एजेंसी ने ही ढहाया है लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी लेने से बचने की कोशिश की जा रही है। दिल्ली सरकार का कहना है कि यह काम डीडीए ने किया है और वह केंद्र सरकार के अधीन आता है जबकि डीडीए ने चर्च के ढहाए जाने के मामले से कुछ भी संबंध होने से इनकार किया है। दिल्ली में आरोप-प्रत्यारोप लग ही रहे थे कि केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस घटना को 'ख़ौफ़नाक' बताया है। हालाँकि, इसके साथ उन्होंने कहा कि इस मामले में वह दखल नहीं दे सकते हैं लेकिन फिर भी जितना हो सकता हैं वह करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रार्थना की जगह को लेकर ऐसी तनावपूर्ण स्थिति नहीं उपजनी चाहिए। 

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दरअसल, दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर के डॉ. आम्बेडकर कॉलोनी में लिटल फ्लावर साइरो मालाबार चर्च को अधिकारियों ने सोमवार को ढहा दिया। चर्च के प्रिस्ट फादर जोस ने कहा कि वह चर्च अस्थाई ढाँचे के तौर पर था। आरोप है कि चर्च वाली ज़मीन सरकारी थी और उस पर कुछ लोग अवैध कब्जा कर वहाँ धार्मिक निर्माण कर रहे थे। इसीलिए अधिकारियों ने उस कथित अवैध निर्माण को ध्वस्त कर दिया। 

यह जब मामला सामने आया तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गोवा में थे। गोवा में ईसाइयों की आबादी काफ़ी ज़्यादा संख्या में है और वहाँ पर केजरीवाल की पार्टी अपने पैर जमाने के प्रयास में लगी है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार गोवा के पंजिम कंवेंशन सेंटर में केजरीवाल ने कहा, 'मुझे बताया गया है, सबसे पहले, यह डीडीए द्वारा किया गया था। डीडीए केंद्र सरकार के अधीन आता है। इस पर दिल्ली सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। डीडीए शायद हाईकोर्ट गया था। हाईकोर्ट ने आदेश दिया और डीडीए ने वह कार्रवाई की है। हमारे स्थानीय विधायक चर्च से जुड़े हुए हैं। हमारे छतरपुर विधायक तंवरजी उनके साथ हैं, चर्च के साथ हैं। उन्हें जो भी मदद की ज़रूरत होगी हम मुहैया कराएँगे।'

जबकि डीडीए के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात से इनकार किया कि उनके द्वारा या उनकी सिफारिश पर चर्च को ढहाया गया। रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'हमारी टीम ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की है।'

दक्षिण दिल्ली ज़िले के खंड विकास अधिकारी द्वारा कथित अतिक्रमणकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, जो दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के अंतर्गत आता है। 7 जुलाई को जारी नोटिस में कहा गया है कि क्षेत्र के पंचायत सचिव द्वारा ग्राम सभा की ज़मीन पर अतिक्रमण देखा गया है।

नोटिस में कहा गया है कि ग्राम सभा की ज़मीन सार्वजनिक उपयोगिता के लिए है और किसी को आवंटित नहीं की गई है। इसने कब्जाधारियों को संरचना को हटाने के लिए तीन दिन का समय दिया, जिसमें कहा गया कि ऐसा करने में विफल रहने पर कार्रवाई की जाएगी।

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हालाँकि चर्च के फादर जोस ने आरोप लगाया है कि उन्हें बिना कोई जानकारी दिए विध्वंस किया गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, 'कोई चर्चा नहीं हुई, वे बिना किसी पूर्व सूचना के आए। जब यह हुआ तब मैं यहाँ था। सब कुछ ध्वस्त कर दिया गया है, मूर्तियों को तोड़ा गया है, प्रार्थना के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण, चर्च रिकॉर्ड, साउंड सिस्टम सभी क्षतिग्रस्त हो गए हैं। वेदी अभी भी है, लेकिन अब हम उसका उपयोग नहीं कर सकते। यह कोई ठोस ढांचा भी नहीं था, केवल एक अस्थायी शेड था। यह 14-15 वर्षों से अस्तित्व में था।'

वह सवाल उठाते हैं कि एक और चर्च, मसजिद व मंदिर भी पास में हैं, लेकिन उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया गया है। 

इस मामले में ज़िला मजिस्ट्रेट का भी बयान आया है। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार ज़िला मजिस्ट्रेट (दक्षिण) अंकिता चक्रवर्ती ने कहा, 'ज़मीन सरकार की है। हालाँकि कुछ लोगों ने धार्मिक ढांचों को स्थापित कर इस पर कब्जा कर लिया था। समय के साथ-साथ धार्मिक ढांचे के विस्तार की आड़ में अतिक्रमित क्षेत्र बढ़ने लगा। इसलिए, बीडीओ कार्यालय ने अनधिकृत संरचनाओं को गिराने का प्रयास किया।'

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ज़िला मजिस्ट्रेट ने कहा, 'हालांकि अतिक्रमणकारियों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया जहाँ से मामला धार्मिक समिति को स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद गृह पुलिस-द्वितीय विभाग से 3 मार्च 2021 को एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें उच्च न्यायालय के 2015 के आदेश का हवाला दिया गया था जिसमें मूर्तियाँ स्थापित नहीं हुई जगहों को बिना धार्मिक समिति के फ़ैसले के आए ही भूतल के साथ-साथ पूरे निर्माण को ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था।'

उन्होंने कहा कि उस ख़त की पालना में ढहाने का अभियान चलाया गया और अतिक्रमणकारियों को विधिवत नोटिस दिए गए और सोमवार को सफलतापूर्वक विध्वंस किया गया।

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