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जाफराबाद हिंसा के लिए ज़िम्मेदार कौन, कपिल मिश्रा क्यों दे रहे थे धमकी?

नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ जाफराबाद में शांतिपूर्वक प्रदर्शन में आख़िर ऐसा क्या हो गया कि इतने बड़े स्तर पर हिंसा हो गई और एक पुलिसकर्मी सहित पाँच लोगों की मौत हो गई? इस हिंसा से पहले वहाँ क्या-क्या हुआ और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? यदि इन सवालों का जवाब ढूंढना है तो उसके पहले के घटनाक्रमों को देखना होगा। सड़क पर बैठ कर किया जा रहा यह प्रदर्शन रविवार को तब तक शांतिपूर्ण था जब तक कि बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों के विरोध में वहाँ नागरिकता क़ानून के समर्थन में रैली नहीं निकाली थी। मिश्रा ने अपने समर्थकों के साथ जब रैली निकाली तो उस दौरान नागरिकता क़ानून का विरोध करने वालों के साथ झड़प हुई। दोनों ओर से पत्थरबाज़ी हुई। मिश्रा ने वीडियो जारी किया और फिर प्रदर्शनकारियों को धमकी भी दी। यह सब पुलिस के सामने हुआ। 

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अक्सर देखा जाता है कि हिंसा को उकसाने में भड़काऊ बयानबाज़ी आग का काम करती है। और शायद यही हुआ भी। रविवार को कपिल मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों को चेतावनी देते हुए एक वीडियो जारी किया था। फिर वह अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन वाली जगह पर इकट्ठा हुए। वहाँ भारी संख्या में पुलिस बल भी तैनात था। उस दौरान का एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में दिख रहा है कि एक पुलिस अफ़सर के बगल में खड़े कपिल मिश्रा वहाँ पर धमकी देते हैं। वह पुलिस अफ़सर को संबोधित करते हुए कहते हैं, '...आप सबके (समर्थक) बिहाफ़ पर यह बात कह रहा हूँ, ट्रंप के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे यदि रास्ते खाली नहीं हुए तो... ठीक है?'

हालाँकि इस धमकी के बाद भी पुलिस सक्रिय नहीं हुई।

लेकिन हाल ही में दिल्ली चुनाव में बुरी तरह हारे कपिल मिश्रा के इस रवैये की आलोचना की जा रही है कि यदि उन्हें आपत्ति थी तो पुलिस से कार्रवाई करवाना चाहिए या ख़ुद ही कार्रवाई करने लग जाना चाहिए। यदि पुलिस न सुने तो अदालतें हैं। इसके बाद भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन का रास्ता है। लेकिन वह सीधे-सीधे ऐसी भाषा में बात करते सुने जा सकते हैं जिसे भड़काऊ भाषण ही कहा जा सकता है। हालाँकि यह नयी बात नहीं है। वह दिल्ली चुनाव में भी भड़काऊ बयानबाज़ी करते रहे हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में मॉडल टाउन से बीजेपी उम्मीदवार कपिल मिश्रा ने चुनावी सभा में नारा लगवाया था 'देश के गद्दारों को... गोली मारो ... को'। इसके बाद उन्होंने चुनाव को भारत पाकिस्तान का मैच क़रार दिया था। शाहीन बाग़ के प्रदर्शन को लेकर भी वह ज़हर उगलते रहे हैं। 

जाफराबाद में रविवार को कपिल मिश्रा ने धमकी दी थी कि ट्रंप के जाने के बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे, लेकिन ट्रंप जिस दिन भारत आए यानी सोमवार को ही हिंसा भड़क गई।

दो समुदायों के लोग बाबरपुर-मौजपुर मेट्रो लाइन पर सड़क के दोनों ओर से आमने-सामने आ गए। तब पुलिस की तैयारी बिल्कुल ही नहीं थी और पुलिसकर्मी दोनों गुटों के सामने काफ़ी कम पड़ गए। दोनों गुटों में झड़प हो गई। फ़िलहाल तक यह साफ़ नहीं हुआ है कि हिंसा की शुरुआत किस गुट ने की। दोनों तरफ़ से जमकर पत्थरबाज़ी हुई। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि पुलिसकर्मी भी पत्थरबाज़ी में शामिल हो गई, हालाँकि पुलिस ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार किया है। इस बीच आगजनी हुई, गाड़ियों में तोड़फोड़ हुई। गोलियाँ चलीं। एक युवक को सरेआम गोलियाँ चलाते देखा गया। पुलिस ने दावा किया है कि उसकी पहचान शाहरूख के रूप में हुई है और उसे हिरासत में लिया गया है।

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किस पक्ष ने की हिंसा

अब स्थिति यह है कि दोनों गुटों की तरफ़ से ये दावे किए जा रहे हैं कि हिंसा दूसरे पक्ष ने भड़काई। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार उस क्षेत्र में रहने वाले कुछ मुसलिम लोगों ने आरोप लगाया कि रविवार रात से ही उनके समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, हाथ में रॉड लिए और चेहरे ढँके एक युवक ने दावा किया, 'उनके ही पड़ोस में रहने वाले लोगों ने उन पर पत्थर फेंके। रविवार रात को लोगों को ऑटो से उतारा जा रहा था और हिंदू समुदाय के लोग पत्थर इकट्ठे कर रहे थे।'

रिपोर्ट के अनुसार दूसरी ओर मौजपुर मंदिर में कई महिलाओं ने दावा किया कि सोमवार सुबह क़रीब 10 बजे जब वे हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं तभी मुसलिम समुदाय के लोग आए और पत्थरबाज़ी की। इस कार्यक्रम में कई लोग नागरिकता क़ानून के समर्थन वाली तख्तियाँ लिए हुए थे। रोहित कुमल शुक्ला ने भी दावा किया कि जब वे हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे तो दूसरे पक्ष ने पथराव किया।

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दोनों पक्षों के दावे चाहे जो भी हों, चाहे किसी पक्ष ने भी हिंसा की शुरुआत की हो, क्या बिना उकसावे की ऐसी स्थिति बनती? आख़िर क्या कारण है कि शाहीन बाग़ में दो महीने से ज़्यादा समय से प्रदर्शन होने के बावजूद वहाँ सब शांतिपूर्ण तरीक़े से चल रहा है और जाफराबाद में हिंसा हो गई? क्या इसमें उकसावे और भड़काऊ भाषण का हाथ नहीं है? और यदि है तो कौन ज़िम्मेदार है? और पुलिस क्या कर रही है? न तो पुलिस ने भड़काऊ भाषण देने के समय वैसी कार्रवाई की और न ही भाषण के बाद अपनी तरफ़ से तैयारी के तौर पर पुलिस बल तैनात किया। सुप्रीम कोर्ट के जज ही बार-बार कहते रहे हैं कि शांतिपूर्ण तरीक़े से अहमति जताने यानी प्रदर्शन करने का अधिकार सबको है। तो फिर कौन है जो क़ानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है?
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