क्या कांग्रेस में अत्यधिक उदारता से अनुशासन कमजोर पड़ा? क्या राहुल गांधी पार्टी को फिर से धारदार और संगठित बना पाएंगे? पढ़िए हरियाणा के कुरुक्षेत्र से राहुल गांधी ने क्या संदेश दिया?
उद्देश्यों को छोड़कर महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित कांग्रेस के प्रादेशिक नेता क्या संगठन, प्रशिक्षण और प्रतिबद्धता को अपनाकर दिन-प्रतिदिन पिछड़ती जा रही पार्टी को कोई मजबूती प्रदान कर पाएंगे? यह सवाल राहुल गांधी की हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक दिन की यात्रा के बाद कांग्रेस की सियासत के लिए बहुत अहम हो गया है।
राहुल गांधी कांग्रेस के 'संगठन सृजन' अभियान के अंतर्गत हरियाणा और उत्तराखंड के नव-नियुक्त जिला अध्यक्षों के दस दिन से चल रहे प्रशिक्षण शिविर के अंतिम दिन 22 जनवरी को कुरुक्षेत्र पहुंचे थे। उन्होंने पार्टी की नीतियों और उद्देश्यों को पुनर्जीवित करने तथा सभी पदाधिकारियों में पार्टी के प्रति विश्वास और प्रेरणा जगाने का प्रयास किया। कुरुक्षेत्र के पंजाबी धर्मशाला में आयोजित इस प्रशिक्षण शिविर में हरियाणा के 32 जिला अध्यक्षों और उत्तराखंड के 27 जिला अध्यक्षों को प्रशिक्षण दिया गया। राहुल गांधी की मौजूदगी में करीब 3 घंटे तक प्रशिक्षण सत्र चला।
2014 से लगातार कमजोर होती कांग्रेस अपनी वास्तविकताओं को ढककर केवल तात्कालिक समाधानों पर केंद्रित होकर खुद को राजनीति की राह पर धकेल रही है। हरियाणा और उत्तराखंड इसके सबसे प्रमुख गवाह बने, जहाँ कांग्रेस को जनता ने जीतने के स्पष्ट संकेत समय पर दिए, लेकिन प्रादेशिक नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और गुटबाजी ने सरकार बनने में बाधाएँ खड़ी कीं। एक अन्य राज्य पंजाब में कांग्रेस का बड़ा जनाधार है, लेकिन वहाँ भी अलग-अलग खेमे आपसी प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं और प्रदेश के उद्देश्यों के प्रति गंभीरता की कमी के कारण पार्टी को बड़ा नुक़सान हो रहा है। 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। अंतर्कलह और अंतर्विरोध का सार्वजनिक होना कांग्रेस की जड़ों को पंजाब में कमजोर करता जा रहा है।
हरियाणा में इस प्रशिक्षण सत्र के दौरान सभी अध्यक्षों को कांग्रेस का पूरा इतिहास और देश की आज़ादी में कांग्रेस की भूमिका के बारे में विस्तार से बताया गया। पार्टी ने किस प्रकार देश के लिए अपना योगदान दिया, यह भी समझाया गया। साथ ही, ज़मीनी स्तर पर काम करके पार्टी को मज़बूत करने का महत्व भी बताया गया। ट्रेनिंग के दौरान जिला अध्यक्षों के अलावा किसी अन्य नेता की मौजूदगी नहीं रही; बाक़ी नेताओं को एक अलग कमरे में बैठाया गया था। राहुल गांधी के दौरे के दौरान पंजाबी धर्मशाला में हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह, नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा, सिरसा सांसद कुमारी शैलजा, रणदीप सुरजेवाला समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
पार्टी के प्रति निष्ठा, वैचारिक प्रतिबद्धता और अनुशासन के बजाय व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य की सुरक्षा की लालसा में ग्रस्त नेताओं की कार्यशैली ने समर्पित कार्यकर्ताओं को उपेक्षित महसूस कराया है। कांग्रेस की यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। जनविश्वास के संकट का कोई समाधान कांग्रेस अभी तक नहीं खोज पाई है। विभिन्न आंतरिक और बाहरी कारकों ने कांग्रेस के राष्ट्रव्यापी समर्थन आधार को काफी हद तक कम कर दिया है। अब कांग्रेस अक्सर कम सीटों पर चुनाव लड़ती है और गठबंधन में एक कनिष्ठ सहयोगी के रूप में भाग लेने की स्थिति तक पहुंच गई है।
मुद्दों का समाधान नहीं ढूंढ पा रही कांग्रेस?
पार्टी की आलोचना इस बात के लिए भी हो रही है कि वह वर्तमान मुद्दों का प्रभावी ढंग से समाधान नहीं खोज पा रही और केंद्रीय नेतृत्व असहाय-सा दिखता है। उसकी वैचारिक स्थिति में निरंतरता की कमी है। 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' की धारणा और धर्मनिरपेक्षता के रुख से विचलन ने बीजेपी के मुक़ाबले पार्टी का समर्थन खोने में योगदान दिया है। 2014 में सत्ता खोने के बाद से पार्टी एक तरह के अपराधबोध से ग्रस्त रही है, जिसके चलते पिछले एक दशक में अधिकतर मुद्दों पर कांग्रेस के नेता लगभग खामोश रहे और सत्ताधारी बीजेपी की नीतियों का प्रभावी ढंग से विरोध करने में विफल रहे। उदारीकरण और निजीकरण के अंतर को परिभाषित करने में कांग्रेस के नेताओं की असफलता साफ़ दिखती है। संचार और चुनाव रणनीतियाँ अक्सर अप्रभावी साबित हुई हैं।
नागरिकों का अपनी सरकार, अधिकारियों और संस्थानों पर यह विश्वास कि वे आम भलाई के लिए नैतिक और ज़िम्मेदार तरीक़े से कार्य करेंगे, कांग्रेस अपने एक दशक के कार्यकाल में स्थापित नहीं कर पाई, जिसके परिणाम अब पार्टी को भुगतने पड़ रहे हैं। प्रदेशों में भी नेतृत्व अपनी कार्यशैली से विश्वास को मजबूत करने में असफल रहा। जन अपेक्षाओं के अनुकूल नीतियों के निर्माण में कांग्रेस की चूक ने विपक्षी राजनीतिक दलों और सांप्रदायिक ताक़तों के विस्तार की राह आसान बनाई है।
पार्टी की उदारवादिता ने अनुशासन को कमजोर किया, जिसका अनुचित लाभ उठाने में पुराने नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, पैरवी और विशेष हितों ने जनविश्वास को गहरी ठेस पहुंचाई, जिसके चलते आम मतदाता के लिए अन्य विकल्पों के रास्ते खुले। राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी ने कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया है।
केंद्रीय नेतृत्व में अब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पार्टी को पुनः विश्वास और विस्तार की ओर ले जाने के प्रयास कर रहे हैं। पार्टी की अवधारणा में सुधार के लक्ष्य को लेकर समाज के सभी वर्गों में इसे स्थापित करने की कोशिश में राहुल गांधी संगठन को नए स्वरूप में गढ़ने में लगे हैं। कुरुक्षेत्र में राहुल गांधी ने प्रदेश के दिग्गज और पुराने नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी में उदारता को अनुशासन से ऊपर नहीं होने दिया जाएगा। व्यक्तिगत स्वार्थ या महत्वाकांक्षा पार्टी के उद्देश्यों को निगल नहीं सकती। नए नेतृत्व में ऊर्जा का संचार करने के लिए राहुल गांधी ने पुराने नेताओं को चेतावनी दी कि अधिकारवाद से निकलकर योगदान के दृष्टिकोण को अपनाना होगा, अन्यथा पार्टी अब कठोर निर्णय लेने में देर नहीं करेगी। अनुशासन और पार्टी विचारधारा के विपरीत काम करने वाले नेताओं से कोई समझौता संभव नहीं है।
राहुल गांधी ने एक नई लकीर खींचने की कोशिश की है, लेकिन देखना होगा कि इसका प्रभाव कब तक धरातल पर उभरता है और पार्टी अपने लक्ष्य हासिल कर पाती है। नए बनाए गए सिद्धांतों पर राहुल गांधी को स्वयं को भी साबित करना होगा। जनता आकलन करके ही अपनी धारणा बनाती है।