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नया आरक्षण 10% लेकिन सीटें बढ़ेंगी 25% - ऐसा क्यों?

ग़ैर-आरक्षित वर्गों के ‘ग़रीबों’ के लिए नया 10% आरक्षण लागू करने के लिए शिक्षा संस्थानों को क़रीब 3 लाख सीटें बढ़ानी होंगी जो कि मौजूदा सीट क्षमता का 25% है। संस्थानों ने कहा है कि उनके पास हर पाठ्यक्रम में 25% सीटें बढ़ाने के लिए न तो जगह है न ही पैसा। इसपर सरकार ने कहा है कि वह इसके लिए आर्थिक मदद करेगी।

सरकार क्या और कितनी मदद करेगी, यह दीगर बात है। पहला सवाल तो यह कि 10% अतिरिक्त आरक्षण देने के लिए 25% सीटें बढ़ाने की आवश्यकता क्या और क्यों है? क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि अभी हर पाठ्यक्रम के लिए जो जनरल सीटें हैं, उनमें से ही 10% सीटें अलग से अनारक्षित वर्गों के ग़रीब तबक़ों के लिए अलग कर दी जातीं? जैसे यदि अभी कहीं 49.5% सीटें आरक्षित हैं और बाक़ी 50.5% सीटें जनरल हैं तो क्या इन जनरल सीटों में से 10% नए आरक्षण के मद में आ जातीं और शेष 40.5% सीटें जनरल कोटे में रहतीं?

आसान रास्ता क्यों नहीं अपनाया?

ऐसा करना आसान था। लेकिन तब जनरल सीटों की संख्या पहले से कम हो जाती। और शायद सरकार चाहती है कि हर पाठ्यक्रम में जनरल कैंडिडेटों के लिए पहले जितनी सीटें थीं, उतनी ही नए आरक्षण के बाद भी रहें। जैसे कहीं यदि 100 सीटें हैं और नए आरक्षण से पहले वहाँ 50 सीटें जनरल कोटे में थीं तो नए आरक्षण के तहत 10% सीटें देने के बाद भी 50 सीटें जनरल कोटे में रहें।

क्या केवल 10 नई सीटें बढ़ाना काफ़ी नहीं था? पहले की 100 सीटें रहतीं और 10 सीटें और बढ़ जातीं। पहले जिनको जितनी सीटें मिली हुई हैं, वे बनी रहतीं और कुल 110 सीटों से सबका काम चल जाता। फिर हर 100 सीटों पर 25 सीटों को बढ़ाने की बात क्यों हो रही है?

ऐसे समझें पूरे मामले को 

आइए, इसको समझते हैं। मान लिया, किसी संस्थान ने नए आरक्षण के लिए 10 सीटें और बढ़ाईं और पिछली सीटों में कोई छेड़छाड़ नहीं की। यानी पहले जो आरक्षित और जनरल सीटें थीं, वे वही रहीं। लेकिन समस्या यह है कि जैसे ही नई 10 सीटें जुड़ीं, कुल सीटों की संख्या हो गई 110। अब इसमें से क़रीब आधी (49.5%) सीटें एसी/एसटी और ओबीसी को देनी हैं सो उनका कोटा हो गया 55 जो कि पहले से उनको हासिल सीटों से 5 ज़्यादा हैं। यानी उनके हिस्से की 5 सीटें और बढ़ानी होंगी।
  • इसके अलावा जो नया आरक्षण है, वह भी 10% होना चाहिए लेकिन कुल सीटों की संख्या 110 होते ही उनकी ज़रूरी संख्या भी 10 से बढ़कर 11 हो गई।
  • यानी पहले से जिनको आरक्षण मिला हुआ था और जिनको नया आरक्षण मिला है, उनका 49.5% और 10% आरक्षण बनाए रखना है तो सीटों की संख्या 110 से और 5+1-6 बढ़ानी होगी। यानी कुल सीटें होनी चाहिए 116।
  • लेकिन फिर वही मुश्किल। कुल सीटों की संख्या बढ़ते ही दोनों का हिस्सा फिर बढ़ गया क्योंकि 110+6=116 का आधा होता है 58 और उसका 10% हिस्सा होता है 11.6 यानी 12। अर्थात दोनों तबक़ों के लिए 3+1=4 सीटें और बढ़ानी होंगी। कुल सीटें हो गईं 120।
  • लेकिन 120 होने पर भी काम नहीं बना क्योंकि अब पुराने आरक्षित तबक़े की सीटें होनी चाहिए 59.4 यानी 60 जबकि अभी उनको मिल रही हैं 58। नए आरक्षित कोटे को मिल रही 12 सीटें 10% के हिसाब से ठीक हैं सो वहाँ कोई परिवर्तन की ज़रूरत नहीं।
  • यानी 2 सीटें और बढ़ाएँ। कुल हो गईं 122। लेकिन 122 सीटें होते ही नए और पुराने दोनों ही आरक्षित तबक़ों की सीटों की ज़रूरी संख्या 1 और 1 के हिसाब से बढ़ जाती हैं - 61 और 13। 2 और सीटें बढ़ानी होंगी। कुल सीटें हो गईं 124।

124 सीटें होते ही एसी/एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित आधी सीटों की संख्या 61 से हो गईं 62। यानी 1 और सीट चाहिए। कुल सीटें हो गईं 125।

अब इन 125 सीटों का हिसाब लगाइए तो सभी तबक़े अपने-अपने कोटे के हिसाब से फ़िट हो जाते हैं। पुराने आरक्षित तबक़े को 125 में से 49.5% सीटें मिलनी चाहिए यानी 62। नए आरक्षित तबक़े को 10% के हिसाब से 12.5 (12-13) और जनरल तबक़े को 40.5% के हिसाब से 50.5 (50-51) सीटें मिलनी चाहिए तो उनको मिल रही हैं।

  • आपने देखा कि हमारे इस जोड़-घटाव-गुणा-भाग से अनारक्षित तबक़े के लिए 10% आरक्षण करने के बावजूद जनरल कोटे की सीटें पहले से नहीं घटेंगी। वे 50 की 50 रहेंगी। और सबसे ज़्यादा फ़ायदा पुराने आरक्षित कोटे का होगा जिनकी सीटें पहले के मुक़ाबले 25% बढ़ जाएँगी। यानी पहले जहाँ 50 थीं, वहाँ वे 62 हो जाएँगी। पहले जहाँ 100 थीं, वहाँ 125 हो जाएँगी।

लेकिन ध्यान दें कि यह लाभ केवल शिक्षा क्षेत्र में होगा जहाँ सीटें बढ़ाना सरकार के हाथ में है। जहाँ तक सरकारी नौकरियों का मामला है, वहाँ कोई लाभ नहीं होनेवाला क्योंकि नौकरियाँ तो जितनी हैं, उतनी ही रहेंगी और वहाँ सबका कोटा निश्चित है। एससी/एसटी और ओबीसी के लिए पहले 100 में से 50 के क़रीब नौकरियाँ आरक्षित थीं तो अब भी वही रहेंगी। जनरल कोटे की नौकरियाँ यदि पहले 100 में 50 थीं तो अब वे 40 हो जाएँगी। लेकिन वहाँ भी किसको लाभ होगा, और किसको नुक़सान यह भी एक अलग पहेली है जिसपर आशुतोष पहले ही शंका जता चुके हैं। 

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नीरेंद्र नागर
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