फ़िलहाल जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू है और इस साल के आख़िर तक यहाँ चुनाव होने के आसार हैं। संभावित परिसीमन की इस ख़बर के बाद राज्य के प्रमुख दलों ने इसका विरोध किया है और कहा है कि यह धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिश है।
देश की भौगोलिक, भाषायी, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए ही 35ए का यह प्रावधान किया गया है ताकि यदि किसी समय पर केंद्रीय ताक़त मज़बूत हो जाए तो राष्ट्रीय एकता के नाम पर क्षेत्रीय पहचान से छेड़छाड़ न की जा सके।
सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गयी है कि 35ए को संसद के ज़रिए लागू नहीं करवाया गया है, इसलिए इसे हटाया जाना चाहिए। एक दलील यह भी है कि देश के विभाजन के समय बड़ी संख्या में शरणार्थी जम्मू-कश्मीर में आए, लेकिन अनुच्छेद 35ए के हवाले से इन शरणार्थियों को निवासी बनाने से वंचित कर दिया गया। इनमें 85 फ़ीसदी पिछड़े और दलित समुदाय से हैं।