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नागरिकता क़ानून: विरोध बर्दाश्त करने को तैयार नहीं पुलिस, चंद्रशेखर को रोका

नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हुई रैलियों के दौरान पूरे देश भर में विशेषकर उत्तर प्रदेश में पुलिस की ज़्यादती की ख़बरें आईं। उसी दौरान दिल्ली में आयोजित एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुलिस के समर्थन में न सिर्फ़ ख़ुद खड़े हुए बल्कि लोगों से भी पुलिस के पक्ष में नारे लगवाए। तब यह सवाल उठा था कि क्या पुलिस के पक्ष में हज़ारों लोगों के बीच प्रधानमंत्री के नारे लगवाने से कहीं पुलिस निरंकुश तो नहीं हो जाएगी। वैसा ही कुछ हैदराबाद में देखने को मिला है। नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हैदराबाद पहुंचे भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को पुलिस ने प्रदर्शन करने से रोक दिया और दिल्ली वापस भेज दिया। 

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चंद्रशेखर जिस होटल में ठहरे हुए थे, वहां हैदराबाद पुलिस के एक इंस्पेक्टर पहुंचे और उनसे तेलंगाना से चले जाने को कहा। वहां मौजूद सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पारचा ने उनसे पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं। इस पर इंस्पेक्टर ने कहा कि चंद्रशेखर राज्य में कई जगहों पर रैलियां करेंगे। पारचा ने कहा कि चंद्रशेखर को इंजेक्शन लगा है और वह बीमार हैं। पारचा इंस्पेक्टर से पूछते हैं कि क्या एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट या एसीपी भी आपके साथ आए हैं तो इंस्पेक्टर कहते हैं कि वह इंस्पेक्टर हैं और गैजेटेड ऑफ़िसर हैं। इंस्पेक्टर यह बताने की कोशिश करते हैं कि वह क़ानून के जानकार हैं और जो वह कह रहे हैं वही क़ानून है। 

अगर आप सरकार की किसी नीति से नाराज़ हैं तो उसका विरोध कर सकते हैं। विरोध-प्रदर्शन करना लोगों का संवैधानिक अधिकार है और अगर चंद्रशेखर तेलंगाना में इस क़ानून का शांतिपूर्ण विरोध करते तो आख़िर इसमें हैदराबाद पुलिस या राज्य सरकार को क्या दिक्कत थी।

चंद्रेशखर ने ट्वीट कर कहा, ‘तेलंगाना में तानाशाही चरम पर है और लोगों के विरोध-प्रदर्शन करने के अधिकार को छीना जा रहा है। पहले हमारे लोगों को लाठियां मारी गईं फिर मुझे गिरफ्तार कर लिया गया, मुझे एयरपोर्ट ले आए हैं और दिल्ली भेज रहे हैं।’ चंद्रशेखर ने ट्वीट में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के आधिकारिक ट्विटर हैंडल को टैग करते हुए लिखा है कि मुख्यमंत्री इस बात को याद रखें कि बहुजन समाज इस अपमान को कभी नहीं भूलेगा और वह जल्द वापस आयेंगे। चंद्रशेखर तेलंगाना से दिल्ली वापस पहुंच चुके हैं। 

हैदराबाद पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार ने एनडीटीवी को बताया कि चंद्रशेखर को धारा 151 के तहत हिरासत में लिया गया क्योंकि उन्हें प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उनके प्रदर्शन से शांति भंग हो सकती थी। 

क्या आपने संविधान पढ़ा है? 

कुछ दिन पहले जब चंद्रशेखर नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में दिल्ली के जामा मसजिद के बाहर हो रही सभा में पहुंचे थे तो पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया था। तब दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट ने पुलिस को ज़बरदस्त फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है और कौन कहता है कि प्रदर्शन नहीं कर सकते। कोर्ट ने पुलिस से कहा था कि क्या आपने संविधान पढ़ा है? 

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कुछ दिन पहले जब हैदराबाद में एक डॉक्टर के साथ बलात्कर के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी तो पुलिस ने इस मामले में चारों अभियुक्तों का एनकाउंटर करने के आरोप लगे थे। पुलिस ने इस मामले में अदालत, क़ानून को पीछे रखते हुए ख़ुद ही ‘फ़ैसला’ कर दिया था। तब इसे लेकर समाज के एक वर्ग ने गहरी चिंता जताई थी और पूछा कि क्या हम पुलिस स्टेट बनने की ओर बढ़ रहे हैं। यह भी सवाल उठा था कि क्या इस तरह की कार्रवाइयों से बलात्कार जैसी घटनाएं रुक जाएंगी? 

जेएनयू में हाल ही में हुई गुंडागर्दी का मामला हो या उत्तर प्रदेश में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस की कार्रवाई का, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल ही सवाल उठे हैं। जेएनयू की गुंडागर्दी में पुलिस अभी तक किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकी है जबकि यह घटना देश की राजधानी में स्थित विश्व की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में हुई है। 

इस तरह की घटनाओं से डर यही पैदा हो रहा है कि कहीं पुलिस जिस पर सेवा का जिम्मा है, वह शासक न बन जाए। भले ही प्रधानमंत्री मोदी ने पुलिस के समर्थन में नारे लगवा दियें हो लेकिन उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पुलिस का निरंकुश हो जाना लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है।
पुलिस का काम है क़ानून का पालन करवाना, न्याय व्यवस्था को बनाये रखना। लेकिन यहां तो पुलिस ज़्यादती पर उतर आई है और ऐसा लग रहा है कि वह नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में आवाज़ उठाने वालों को बर्दाश्त करने के लिये तैयार ही नहीं है। वह डंडे के दम पर आवाज़ को दबा देना चाहती है लेकिन सवाल यह है कि क्या संवैधानिक मुल्क़ में ये सब होते देखकर क्या अदालतों को चुप रहना चाहिए। 
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पवन उप्रेती
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