केंद्रीय बजट 2026-27 में कृषि क्षेत्र के लिए भले ही कुछ नई योजनाओं का जिक्र है, लेकिन यह बजट किसानों की वास्तविक समस्याओं को पूरी तरह अनदेखा करता नजर आ रहा है। जहां एक ओर ज्यादा आमदनी दिलाने वाली फसलों और एआई आधारित टूल्स जैसे 'भारत विस्तार' की बात की गई है, वहीं एमएसपी की कानूनी गारंटी, इनपुट लागतों पर राहत, और ग्रामीण रोजगार जैसे मूल मुद्दों पर चुप्पी साध ली गई है। ग्रामीण रोजगार के लिए मनरेगा योजना को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह जी राम जी योजना लाई गई। बजट में यह खोजना पड़ा कि इस योजना के लिए आवंटन कितना है। दूर दूर तक किसी बजट प्रस्ताव का जिक्र नहीं है। ग्रामीण रोजगार का कोई विकल्प इस बजट में नहीं दिया गया है।

आवंटन में कटौती: आंकड़ों की बाजीगरी

बजट दस्तावेजों के मुताबिक, कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए कुल आवंटन पिछले वर्ष (2025-26) के 3.38% से घटकर इस वर्ष मात्र 3.04% रह गया है। हालांकि, कृषि मंत्रालय को 1.37 लाख करोड़ रुपये का आवंटन मिला है, जो पिछले साल के 1.27 लाख करोड़ से मामूली बढ़ोतरी दिखाता है, लेकिन महंगाई और बढ़ती लागतों को ध्यान में रखें तो यह रियल टर्म्स में नेगेटिव वृद्धि है। पिछले दस वर्षों में कृषि बजट कई गुना बढ़ा है, लेकिन किसानों की वास्तविक आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। डीजल, खाद, बीज और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने सरकारी सहायता को काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया है।

पीएम-किसान योजना के तहत मिलने वाली सालाना 6,000 रुपये की सहायता आज भी राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनी हुई है, लेकिन आर्थिक रूप से यह किसान की लागत के सामने नगण्य साबित होती है। बजट में इस योजना का आवंटन स्थिर रखा गया है, जबकि मांग थी कि इसे बढ़ाकर 12,000 रुपये किया जाए। इसके अलावा, एमजीएनआरईजीए का आवंटन 86,000 करोड़ रुपये पर स्थिर है, जो ग्रामीण बेरोजगारी की बढ़ती समस्या को देखते हुए अपर्याप्त है।

कितने किसान करते हैं काजू, चंदन की खेती

बजट में ज्यादा पैसा दिलाने वाली फसलों जैसे चंदन, काजू, कोको, नारियल और उत्तर-पूर्व में अगर के पेड़ों को बढ़ावा देने की बात है।
साथ ही, पशुपालन और मछली पालन के लिए क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी और एक दाम का जिक्र है। लेकिन यह रणनीति मुख्यतः उन किसानों को लाभ पहुंचा सकती है जिनके पास पूंजी, स्टोरेज और बाजार संपर्क पहले से मौजूद हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह बदलाव जोखिम भरा साबित हो सकता है, यदि उन्हें पर्याप्त तकनीकी और वित्तीय समर्थन नहीं मिला। जलवायु परिवर्तन के दौर में जहां सूखा और बाढ़ किसानों को तबाह कर रहे हैं, फसल बीमा योजना का आवंटन भी अपर्याप्त है।

एमएसपी, लागत से ऊपर लाभकारी मूल्य, और कृषि उपज के बाजारीकरण जैसे मूलभूत मुद्दों पर बजट में कोई ठोस समाधान नहीं है। कृषि आय दोगुनी करने का लक्ष्य अभी भी कागजों तक सीमित दिखाई देता है। किसान नेता योगेंद्र यादव ने एक्स पर कहा है कि "यह पहली बार है जब बजट में किसानों का नामोनिशान नहीं। न सिंचाई, न उर्वरक, न कृषि मजदूर। यह अनदेखी नहीं, राजनीतिक बजट है।"

राजनीतिक प्रबंधन बनाम संकट समाधान
राजनीतिक रूप से देखें तो कृषि बजट अब संकट समाधान से अधिक संकट प्रबंधन का औजार बनता जा रहा है। सरकार बड़े आवंटन दिखाकर असंतोष को नियंत्रित करना चाहती है, लेकिन भूमि सुधार, बाजार सुधार और लाभकारी मूल्य जैसी बुनियादी मांगों से दूरी बनाए रखती है। यही कारण है कि ग्रामीण भारत में नाराजगी समय-समय पर आंदोलनों के रूप में फूट पड़ती है। लेकिन सरकार को इसकी ज़रा भी परवाह नहीं है।
बजट 2026-27 कृषि क्षेत्र के लिए संसाधनों में वृद्धि और दीर्घकालिक सोच को तो दर्शाता है, लेकिन किसानों की वास्तविक चिंताओं, आमदनी की गारंटी, बाजार तक सीधी पहुंच और जोखिम से संरक्षण पर ठोस और समयबद्ध नीतिगत हस्तक्षेप की कमी अब भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है। यह बजट सत्ता के लिए राजनीतिक रूप से सुरक्षित हो सकता है, लेकिन किसान के लिए अभी भी असुरक्षित है। जब तक MSP की कानूनी गारंटी, लागत आधारित मूल्य निर्धारण और छोटे किसानों के लिए ठोस बाजार सुरक्षा नहीं दी जाती, तब तक हर बढ़ा हुआ कृषि बजट केवल आंकड़ों की राजनीति ही बना रहेगा। कृषि को एक रणनीतिक विकास इंजन के रूप में देखा जाना चाहिए—जलवायु-अनुकूल और प्रौद्योगिकी-आधारित कृषि द्वारा समर्थित, पूर्वानुमानित बाजारों, उच्च उत्पादकता, किफायती ऋण और प्रभावी फसल बीमा के माध्यम से किसानों की आय सुरक्षा को मजबूत करना आवश्यक है।