मवेशियों के ट्रांसपोर्ट वाले जिन मामलों में लिंचिंग जैसी घटनाएँ आती रही हैं वैसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सजा तभी दी जा सकती है जब वध का उद्देश्य साबित हो।
मवेशियों के ट्रांसपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
मवेशियों के ट्रांसपोर्ट और वध से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल ट्रांसपोर्ट के दस्तावेज नहीं होने के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि मवेशियों को वध के लिए ले जाया जा रहा था। अदालत ने साफ़ किया कि किसी व्यक्ति को छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम, 2004 के तहत दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि मवेशियों का ट्रांसपोर्ट वध के उद्देश्य से किया जा रहा था या आरोपी को इस बात की जानकारी थी कि उनका वध किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर 32 बैलों के ट्रांसपोर्ट से जुड़े मामले में एक आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रांसपोर्ट के दस्तावेज न होना अपने आप में वध के मक़सद का प्रमाण नहीं है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि क़ानून के तहत अभियोजन को अपराध के ज़रूरी तत्व पहले साबित करने होंगे। इसके बाद ही आरोपी पर अपने बचाव में सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी डाली जा सकती है।
32 बैलों को ट्रक से जाने का था आरोप
यह मामला छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम, 2004 के तहत दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार, 32 बैलों को एक ट्रक में भरकर केडुवा से ओडिशा की ओर ले जाया जा रहा था। पुलिस को मवेशियों के इस परिवहन की सूचना मिली थी। इसके बाद एक हेड कांस्टेबल ने ट्रक को रोक लिया। ट्रक में ले जाए जा रहे सभी मवेशियों को जब्त कर लिया गया और ट्रक के चालक तथा क्लीनर को गिरफ्तार किया गया।
ट्रक के आगे एक बोलेरो गाड़ी भी चल रही थी। पुलिस का आरोप था कि यह गाड़ी ट्रक को रास्ता दिखाने या उसकी निगरानी करने के लिए आगे चल रही थी। बोलेरो में चार लोग सवार थे। इन चारों को भी गिरफ्तार किया गया। अपील करने वाला व्यक्ति इन्हीं में से एक था। आरोप लगाया गया कि मवेशियों का परिवहन कानून की धारा 6 का उल्लंघन करते हुए वध के मक़सद से किया जा रहा था।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत और पुनरीक्षण अदालत ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। कानून की धारा 10 के तहत आरोपियों को एक साल के कठोर कारावास और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
बाद में हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सजा को पहले से काटी जा चुकी अवधि तक सीमित कर दिया। हालांकि, दोषसिद्धि को रद्द नहीं किया गया। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कानून की संबंधित धाराओं और उपलब्ध सबूतों की समीक्षा की और आखिरकार आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी।
दस्तावेज पर SC ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम की धारा 6 और धारा 11 को साथ पढ़ते हुए कहा कि केवल मवेशियों को बिना दस्तावेज ले जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि उनका परिवहन वध के लिए किया जा रहा था।
अदालत ने साफ़ किया कि धारा 6 के तहत अपराध के लिए यह जरूरी है कि मवेशियों को वध के उद्देश्य से ले जाया जा रहा हो या आरोपी को इस बात की जानकारी हो कि उनका वध किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि मामले में हेड कांस्टेबल ने मवेशियों को वध के लिए ले जाए जाने की आशंका जताई थी, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि वास्तव में परिवहन का उद्देश्य वध था।
आरोपी पर सबूत देने की जिम्मेदारी कब आएगी?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कानून की धारा 11 के तहत अभियोजन और आरोपी के बीच सबूत की जिम्मेदारी के सवाल पर भी टिप्पणी की। आमतौर पर आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करना होता है। लेकिन कुछ कानूनों में विशेष परिस्थितियों में आरोपी पर भी अपने बचाव से जुड़े तथ्य साबित करने की जिम्मेदारी डाली जाती है। इसे सबूत का उलटा भार यानी रिवर्स बर्डन कहा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम की धारा 11 के तहत आरोपी पर यह जिम्मेदारी तभी आएगी, जब जब्ती करने वाला अधिकारी पहले यह साबित करे कि मवेशियों का परिवहन वध के उद्देश्य से किया जा रहा था या वध की आशंका की जानकारी थी।
अदालत के मुताबिक, अपराध के जरूरी पक्ष साबित होने से पहले आरोपी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह साबित करे कि मवेशियों को वध के लिए नहीं ले जाया जा रहा था। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि धारा 11 के तहत उलटी धारणा तभी लागू होगी, जब अपराध के ज़रूरी तत्व ट्रायल कोर्ट के सामने साबित कर दिए जाएं। इसके बाद आरोपी को यह साबित करने का अवसर और जिम्मेदारी होगी कि परिवहन या वध कानून का उल्लंघन नहीं था। इस मामले में हेड कांस्टेबल यह साबित नहीं कर पाया कि मवेशियों को वध के लिए ले जाया जा रहा था। इसलिए आरोपी पर सबूत का उलटा भार लागू नहीं हुआ।
लिंचिंग जैसी घटनाएँ क्यों?
मवेशियों के ट्रांसपोर्ट को लेकर कई राज्यों में हिंसक घटनाएँ सामने आती रही हैं। कई मामलों में पशुओं को ले जाने वाले लोगों पर तस्करी या वध के आरोप लगाए जाते हैं। ऐसे विवादों में कभी-कभी भीड़ द्वारा हमला किए जाने और मॉब लिंचिंग की घटनाएं भी चर्चा में रही हैं।
गो तस्करी या गोवध के आरोप में लिंचिंग के मामले 2015 से बढ़े हैं जब यूपी के दादरी में मोहम्मद अखलाक को गोवध के शक में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। 2017 में राजस्थान के अलवर में डेयरी किसान पहलू खान को गो तस्करी के आरोप में गौ रक्षकों ने मार दिया था। झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन अंसारी को मांस ले जाते समय मार दिया गया था। 2016 में लातेहार में मज्लूम अंसारी और इम्तियाज खान को पेड़ से लटकाया गया। 2018 में अलवर में रकबर खान की भी गो तस्करी के शक में हत्या हुई थी।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला सीधे तौर पर मॉब लिंचिंग के किसी मामले का फ़ैसला नहीं है। लेकिन यह मवेशियों के ट्रांसपोर्ट पर लगाए जाने वाले आरोपों की क़ानूनी जाँच के लिए अहम सिद्धांत सामने रखता है। अदालत ने साफ़ किया है कि किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ केवल संदेह, आशंका या दस्तावेजों की कमी के आधार पर वध के मक़सद की धारणा नहीं बनाई जा सकती है।