सीबीएसई के 7वीं से लेकर 10वीं क्लास के छात्रों को तीन भाषा फॉर्मूले के तहत उस विषय की परीक्षा नहीं देनी पड़ रही थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने फैसले में यही राहत छठी क्लास के छात्रों को भी दे दी है। इसमें कोई पास-फेल भी नहीं होगा।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण निर्देश दिया। कोर्ट ने मौजूदा कक्षा 6 के छात्रों को तीन-भाषा फॉर्मूले के तहत वही राहत देने का निर्देश दिया है, जो पहले कक्षा 7 के छात्रों को दी गई है। इसका सीधा असर तीसरी भाषा के मूल्यांकन और बोर्ड परीक्षा पर पड़ेगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। पीठ CBSE की तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
कक्षा 6 के छात्रों को क्या राहत मिली?
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि कक्षा 7, 8 और 9 के छात्रों को पहले ही राहत दी गई है। इसके तहत तीसरी भाषा के लिए कक्षा 10 में CBSE बोर्ड परीक्षा नहीं होगी। तीसरी भाषा का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर आंतरिक रूप से किया जाएगा और इसका बोर्ड परीक्षा के परिणाम में पास या फेल होने पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसी व्यवस्था को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कक्षा 6 के छात्रों को भी कक्षा 7 के छात्रों के समान राहत दी जाए। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि इसमें पास या फेल का सवाल नहीं होगा, बल्कि केवल उपस्थिति प्रमाणपत्र दिया जाएगा।सरकार ने कहा- 99 फीसदी स्कूलों में व्यवस्था तैयार
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि कोर्ट के पहले दिए गए सुझाव के बाद सरकार ने इस मुद्दे पर विस्तृत विचार-विमर्श किया है। सरकार चाहती थी कि कक्षा 6 में तीन-भाषा व्यवस्था को इसी शैक्षणिक वर्ष से लागू करने की अनुमति दी जाए। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि कुल 28,819 CBSE स्कूलों में से करीब 1.2 प्रतिशत को छोड़कर बाकी स्कूलों में तीन-भाषा योजना लागू करने के लिए आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध है। सरकार के अनुसार पाठ्यपुस्तकें और अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध हैं और छात्रों ने इस योजना के तहत भाषाओं का चयन किया है।जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि चूंकि CBSE की तीन-भाषा नीति की अधिसूचना मार्च में जारी हुई थी और अब तक व्यवस्था काफी हद तक तैयार हो चुकी है, इसलिए कक्षा 6 के छात्रों के लिए इसे एक तरह से 'सॉफ्ट लॉन्च' के रूप में लागू किया जा सकता है। अदालत ने माना कि मौजूदा छात्रों के सामने अचानक नई व्यवस्था लागू होने से पैदा हुई लॉजिस्टिक और शैक्षणिक कठिनाइयों को देखते हुए उन्हें वही सुविधा दी जा सकती है जो कक्षा 7 के छात्रों को मिली है।
याचिकाकर्ताओं ने उठाए कई सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि छात्रों ने तीन-भाषा व्यवस्था का पालन इसलिए किया क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। उन्होंने कहा कि शुरुआत में पाठ्यपुस्तकें ऑनलाइन भी उपलब्ध नहीं थीं। उन्होंने यह भी बताया कि CBSE के दायरे में लगभग 28.83 लाख छात्र आते हैं। उनका तर्क था कि ICSE और राज्य बोर्डों ने स्कूल की पढ़ाई के बीच में बच्चों पर इस तरह की नई भाषा व्यवस्था लागू नहीं की है। उन्होंने कक्षा 6 के लिए नीति को कम से कम 2027 तक टालने की मांग की।अंग्रेजी पढ़ने को लेकर सवालः सुनवाई में अंग्रेजी को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठा। एक वकील ने कहा कि CBSE द्वारा अंग्रेजी को गैर-देशी भाषा के रूप में वर्गीकृत किए जाने के कारण कुछ छात्र उन विदेशी भाषाओं को नहीं चुन पा रहे हैं, जिन्हें वे पहले से पढ़ रहे थे। वकील ने सवाल उठाया कि जब संविधान का अंग्रेजी में भी आधिकारिक पाठ उपलब्ध है और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही भी अंग्रेजी में होती है, तो अंग्रेजी को गैर-देशी भाषा क्यों माना जा रहा है? न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत इस मुद्दे पर विचार करेगी। इससे पहले की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी को लेकर CBSE के रुख के औचित्य पर सवाल उठा चुका है।
ग्रामीण इलाकों में किताबों और भाषा विकल्पों की समस्या
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने यह भी कहा कि कई स्कूलों में पर्याप्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है। कुछ स्कूलों में भाषा के विकल्प सीमित हैं और कई जगह छात्रों को मुख्य रूप से हिंदी और संस्कृत जैसे विकल्प ही मिल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता भी एक समस्या बताई गई। एक वकील ने कहा कि ऑनलाइन उपलब्ध पाठ्य सामग्री भी पर्याप्त नहीं है। एक अभिभावक की ओर से पेश हुए वकील ने कक्षा 9 के छात्र की समस्या बताते हुए भाषा विकल्पों की कमी का मुद्दा उठाया। वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने उदाहरण देते हुए पूछा कि अगर कोई छात्र पंजाबी पढ़ना चाहता है तो उसे पर्याप्त विकल्प कैसे मिलेंगे।अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को निर्देश दिया कि वह उन बचे हुए स्कूलों तक पहुंचने के लिए एक अधिकारी नियुक्त करे, जिन्होंने अभी तक तीन-भाषा नीति के लिए आवश्यक व्यवस्था पूरी नहीं की है। अदालत ने इन स्कूलों की समस्याओं का पता लगाने और उन्हें दूर करने को कहा। न्यायमूर्ति बागची ने यह भी संकेत दिया कि अगर किसी स्कूल ने आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर किसी छात्र को रोकने की कोशिश की, तो अदालत इस मामले में हस्तक्षेप कर सकती है।मामला अभी खत्म नहीं हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को चार सप्ताह के भीतर अपना काउंटर-अफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को अपना जवाब दाखिल करने का अवसर मिलेगा। मुख्य याचिका और इससे जुड़ी अन्य याचिकाओं पर आगे सुनवाई जारी रहेगी।क्या है CBSE की तीन-भाषा नीति?
CBSE ने अपनी पढ़ाई की व्यवस्था को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और National Curriculum Framework for School Education (NCF-SE), 2023 के अनुरूप बनाने के तहत तीन-भाषा व्यवस्था लागू की है। नीति के तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी हैं, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में इस नीति की शुरुआत, भाषा विकल्पों, पाठ्यपुस्तकों और इसे लागू करने की समय-सीमा को लेकर कई सवाल उठ चुके हैं। ताजा आदेश का व्यावहारिक अर्थ यह है कि मौजूदा कक्षा 6 के छात्रों को तीसरी भाषा के मामले में कक्षा 7 के छात्रों के समान राहत मिलेगी- यानी तीसरी भाषा को लेकर उन्हें ऐसी बोर्ड परीक्षा या पास-फेल की स्थिति का सामना नहीं करना होगा। हालांकि तीन-भाषा नीति की व्यापक वैधता और उससे जुड़े अन्य सवालों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी बाकी है।