मोदी सरकार अब उच्च शिक्षा संस्थानों के पीछे पड़ गई है? क्या नये उच्च शिक्षा विधेयक के ज़रिये संस्थानों पर अब मोदी सरकार पूरा नियंत्रण चाहती है? कम से कम कांग्रेस ने तो मोदी सरकार पर यही आरोप लगाया है। कांग्रेस ने केंद्र के नये उच्च शिक्षा विधेयक को 'संघीय ढाँचे पर सीधा हमला' क़रार दिया है। पार्टी का कहना है कि विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान यानी वीबीएसए विधेयक 2025 राज्यों के अधिकार छीनकर शिक्षा को पूरी तरह दिल्ली के कंट्रोल में लाने की कोशिश है।
जयराम रमेश ने इस विधेयक पर 7 गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनका आरोप है कि राज्यों से बिना सलाह के विधेयक बनाकर उनके अधिकार कम करने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि यह संविधान की संघीय संरचना का खुला उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक में अनुदान देने की शक्ति यूजीसी-एआईसीटीई से छीनकर मंत्रालय में लाने की कोशिश है। कांग्रेस ने कहा कि इस विधेयक के क़ानून बनने के बाद आईआईटी-आईआईएम जैसी स्वायत्त संस्थाएँ पूरी तरह स्वतंत्र होकर निर्णय नहीं ले पाएँगी और कई चीजों की मंजूरी के लिए केंद्र पर निर्भर रहना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा है कि विश्वविद्यालयों को नए कैंपस के लिए अनिवार्य मंजूरी की बात कही गई है, जबकि एनईपी ज़्यादा आज़ादी की बात करती है।
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कांग्रेस की 7 बड़ी आपत्तियाँ

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान यानी वीबीएसए विधेयक पर कांग्रेस ने बयान जारी किया है और 7 बड़ी आपत्तियाँ जताई हैं- 

राज्य सरकारों से परामर्श न करना

विधेयक तैयार करते समय शिक्षा मंत्रालय ने राज्य सरकारों से कोई सलाह नहीं ली। शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है और यह विधेयक सीधे राज्य विश्वविद्यालयों को प्रभावित करता है।

संवैधानिक अतिक्रमण

विधेयक को संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 66 के तहत पेश किया गया है, जो सिर्फ उच्च शिक्षा में मानकों के समन्वय और निर्धारण तक सीमित है। लेकिन विकसित भारत शिक्षा अभियान को इससे कहीं ज़्यादा व्यापक अधिकार दिए गए हैं। ये राज्य सरकारों के क्षेत्र में हस्तक्षेप करता है। 

कांग्रेस ने कहा है कि संघ सूची की प्रविष्टि-44 संसद को विश्वविद्यालयों के गठन, नियमन और समापन पर क़ानून बनाने से रोकती है, जबकि राज्य सूची की प्रविष्टि 32 यह अधिकार राज्य विधानसभाओं को देती है। इसलिए यह विधेयक संघीय ढांचे का उल्लंघन है।

फंडिंग काउंसिल का अभाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में चार हायर एजुकेशन काउंसिल ऑफ इंडिया की कल्पना की गई थी। लेकिन इस विधेयक में सिर्फ तीन काउंसिल हैं, और अनुदान देने वाली कोई अलग परिषद नहीं है। इसका मतलब है कि यूजीसी और एआईसीटीई जैसी स्वायत्त संस्थाओं से अनुदान देने की शक्ति वापस मंत्रालय के पास चली जाएगी। यह एनईपी का उल्लंघन और केंद्रीकरण है।

उच्च शिक्षा का नौकरशाहीकरण

अभी यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई को शिक्षाविद चलाते हैं। नए विधेयक में आयोग और तीनों परिषदों को सदस्य सचिव चलाएँगे यानी नौकरशाह चलाएँगे। कांग्रेस का कहना है कि शिक्षा का प्रशासन शिक्षाविदों द्वारा होना चाहिए, न कि नौकरशाहों द्वारा।
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राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों पर असर

विधेयक में आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी, आईआईआईटी और आईआईएसईआर जैसे संस्थानों को शामिल किया गया है। ये संस्थान स्वायत्त रहे हैं। आईआईटी एक्ट 1961 के तहत आईआईटी खुद अपने अकादमिक प्रोग्राम बना सकते हैं, बिना अतिरिक्त मंजूरी के। लेकिन सरकार के मौजूदा विधेयक की धारा 49 सभी मौजूदा कानूनों के ऊपर अधिकार देती है। हालाँकि दावा किया गया है कि इन संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित नहीं होगी, लेकिन इसकी जानकारी साफ़ नहीं दी गई है। इससे ये संस्थान भी आयोग के नियामक दायरे में आ सकते हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ। इससे उनकी स्वायत्तता को ख़तरा है।

यूजीसी का अधिकार कमजोर

मौजूदा यूजीसी एक्ट में यूजीसी को विश्वविद्यालयों के साथ परामर्श करके मानक तय करने, नियम बनाने और निरीक्षण करने का अधिकार है। नए विधेयक में परिषदों को अकेले विवेकाधीन अधिकार दिए गए हैं, बिना परामर्श के। इससे नियामक संस्थानों से अलग-थलग हो जाता है।
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एआईसीटीई: VBSA की ताक़त बढ़ेगी

अभी एआईसीटीई एक्ट के तहत विश्वविद्यालयों को कोई विभाग या प्रोग्राम शुरू करने के लिए एआईसीटीई से अनुमति नहीं लेनी पड़ती। लेकिन नए विधेयक में नए कैंपस शुरू करने के लिए नई परिषद से अनुमति अनिवार्य है। एनईपी 2020 उच्च शिक्षा संस्थानों को ज़्यादा स्वायत्तता देने की बात करती है, न कि ज्यादा नियंत्रण की।
जयराम रमेश ने कहा कि यह विधेयक उच्च शिक्षा के ढाँचे को फिर से गढ़ने की कोशिश है, लेकिन यह यूनियन की कल्पना, संस्थागत स्वायत्तता और एनईपी के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है। कांग्रेस ने मांग की है कि विधेयक पर व्यापक चर्चा और परामर्श हो। यह विवाद तब और गहरा गया है जब यूजीसी और एआईसीटीई जैसी नियामक संस्थाओं में बड़ी संख्या में पद खाली हैं और सरकार उच्च शिक्षा को एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश कर रही है।