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गुटबाज़ी की शिकार कांग्रेस, कैसे करेगी बीजेपी का सामना?

लोकसभा चुनाव में क़रारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने नया अध्यक्ष चुनने की बात कहकर पार्टी को संकट में डाल दिया है। लेकिन इससे भी ज़्यादा मुसीबत पार्टी के लिए कई राज्यों में सामने आई है, जहाँ हार के बाद पार्टी नेताओं की गुटबाज़ी खुलकर सामने आ गई है। निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए देश की आज़ादी के बाद का यह सबसे ख़राब समय है जब वह कुछ ग़िने-चुने राज्यों में ही सत्ता में है और इनमें से भी कुछ जगह पर भयंकर गुटबाज़ी की शिकार है। आइए, जानते हैं कि ऐसे राज्य कौन-कौन से हैं, जहाँ पार्टी के भीतर इन दिनों ज़बरदस्त गुटबाज़ी है। पार्टी में बढ़ते असंतोष को थामना उसके लिए एक बड़ी चुनौती है।  
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पंजाब

भले ही उत्तर भारत के सभी राज्यों से कांग्रेस का लगभग सूपड़ा साफ़ हो गया हो लेकिन पंजाब में उसने 13 में से 8 सीटें जीती हैं। लेकिन जीत की यह ख़ुशी अगले ही दिन तब काफ़ूर हो गई जब मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की अंदरुनी लड़ाई सड़कों पर आ गई। सिद्धू ने आरोप लगाया कि कैप्टन के क़रीबी पंजाब में बाक़ी सीटों पर हार की ज़िम्मेदारी उन पर डाल रहे हैं। इसके बाद हुई पंजाब कैबिनेट की बैठक में भी सिद्धू नहीं गए और कैप्टन ने इसे गुस्ताख़ी मानते हुए सिद्धू से शहरी विकास मंत्रालय छीन लिया और उन्हें ऊर्जा मंत्रालय दे दिया। इससे संकेत यह गया कि कैप्टन ने सिद्धू के पर कतरने की कोशिश की है। 
अब कयास यह लगाये जा रहे हैं कि सिद्धू कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे सकते हैं। कुल मिलाकर इस लड़ाई से पंजाब में कांग्रेस बैकफ़ुट पर आ गई है।

राजस्थान

याद दिला दें कि राजस्थान में मुख्यमंत्री का चयन करते वक़्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को ख़ासी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थकों के बीच काफ़ी रस्साकशी का दौर चला था। राहुल ने जैसे-तैसे मुख्यमंत्री के रूप में गहलोत का तो चयन कर लिया लेकिन लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी 25 सीटों पर क़रारी हार के बाद पायलट ख़ेमे ने गहलोत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। 
गहलोत ने कहा है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट को उनके बेटे वैभव गहलोत को जोधपुर में मिली हार की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। माना जा रहा है कि पायलट-गहलोत के इस संग्राम को इस बार रोक पाना राहुल गाँधी के लिए आसान नहीं होगा।

हरियाणा

एक और राज्य हरियाणा में कांग्रेस नेताओं की अंदरुनी लड़ाई से पार्टी कार्यकर्ता बहुत परेशान हैं। राज्य में विपक्षी नेता चुटकी लेते हुए कहते हैं कि यहाँ तो छह तरह की कांग्रेस है, एक पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा की कांग्रेस, दूसरी विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी की कांग्रेस, तीसरी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर की कांग्रेस, चौथी रणदीप सुरजेवाला की कांग्रेस, पाँचवीं कुलदीप बिश्नोई की कांग्रेस और छठी पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा की कांग्रेस। पुराने नेताओं की अपनी माँग मनवाने के लिए आलाकमान पर दबाव बनाने की रणनीति से छुटकारा पाने के लिए ही राहुल गाँधी ने पिछले साल हुए जींद उपचुनाव में मीडिया विभाग के राष्ट्रीय प्रभारी रणदीप सुरजेवाला को भेजा लेकिन उन्हें बुरी हार का सामना करना पड़ा था। तब भी माना गया था कि सुरजेवाला की हार गुटबाज़ी के कारण हुई थी। 
इस बार कांग्रेस को हरियाणा की सभी 10 सीटों पर हार मिली है और सितंबर-अक्टूबर में पार्टी को विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरना है। ऐसे में पार्टी कैसे बीजेपी को चुनौती दे पाएगी, इस पर उसे मंथन करना चाहिए।

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश वह राज्य है, जहाँ कांग्रेस दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में बड़ी मुश्किल से सरकार बना पाई थी। यहाँ भी मुख्यमंत्री के लिए कई दावेदार थे लेकिन वरिष्ठ नेता कमलनाथ को मौक़ा मिला। इस बार राज्य की 29 में से 28 सीटों पर पार्टी को हार मिली है। कमलनाथ मुख्यमंत्री होने के साथ ही प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में हार के बाद अंदरखाने यह आवाज़ उठने लगी है कि कमलनाथ को हटाकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को सत्ता सौंपी जाए। कम से कम यह माना जा रहा है कि कमलनाथ से प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष का पद छिन सकता है।

असम

असम में कांग्रेस की गुटबाज़ी के कारण ही उसके वरिष्ठ नेता हेमंत बिस्व सरमा बीजेपी में शामिल हो गए थे। सरमा तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से नाराज़ थे और नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि गोगोई अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ा रहे हैं। सरमा ने राहुल गाँधी से भी अपनी बात कही लेकिन कुछ नहीं हुआ। इससे नाराज़ होकर सरमा के कांग्रेस छोड़ दी और पार्टी को इसका बहुत नुक़सान हुआ। आज सरमा पूर्वोत्तर में बीजेपी को लगातार जीत दिला रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस पिछड़ती जा रही है। इस बार उसे राज्य की 14 में से सिर्फ़ 3 सीटों पर जीत मिली है।
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गुजरात

गुजरात में कांग्रेस को अपने पैरों पर खड़ा करने की राहुल गाँधी ने भरसक कोशिश की और 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 99 सीटों पर रोक दिया था। लेकिन अब उसके विधायक पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। कांग्रेस से नाराज़ चल रहे विधायक अल्पेश ठाकोर के बीजेपी में शामिल होने की ख़बरें हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद परेश धनाणी ने नेता विपक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। पार्टी छोड़ चुकीं विधायक डॉ. आशा पटेल का दावा है कि कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा से बेहद नाराज है।
इससे पहले भी कांग्रेस के विधायक कुंवरजी बावडिया, वल्लभ धाराविया, जवाहर चावड़ा, परषोत्तम सपारिया पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। ठाकोर ने दावा किया है कि राज्य में कांग्रेस के 15 से ज़्यादा विधायक पार्टी छोड़ने वाले हैं।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में 2014 में कांग्रेस को सिर्फ़ 2 सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इस बार उसे केवल एक ही सीट मिली है। पार्टी के लिए बेहद शर्मिंदगी की बात है कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण भी चुनाव हार गए। जब से अशोक चव्हाण को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, पार्टी नेताओं का एक वर्ग उनके ख़िलाफ़ हो गया। इसी तरह पूर्व मंत्री कृपाशंकर सिंह ने मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष प्रमुख संजय निरुपम को हटाने की माँग की थी और उनकी जगह पर मिलिंद देवड़ा को अध्यक्ष बनाया गया था। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता राधाकृष्णन विखे पाटिल बीजेपी में शामिल हो गए। ऐसे हालात में कांग्रेस किस तरह विधानसभा चुनाव में बीजेपी से मुक़ाबला करेगी, इस पर उसे गंभीरता से सोचना चाहिए।

दिल्ली

दिल्ली में भी पार्टी के भीतर ज़बरदस्त गुटबाज़ी है। पिछले विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ़ होने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर भरोसा जताया और उन्हें पार्टी की बागडोर सौंप दी। इसका नतीजा सिफ़र रहा और पार्टी सभी सातों सीटों पर बड़े अंतर से चुनाव हार गई। ख़ुद शीला दीक्षित को भी क़रारी हार मिली।  छह महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, शीला, माकन, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली के गुटों में बँटी कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव में बीजेपी का मुक़ाबला करना आसान नहीं होगा।
इसके अलावा तेलंगाना में कांग्रेस के 12 विधायक पार्टी छोड़कर तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस की पश्चिम बंगाल इकाई में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सोमेन मित्रा के गुटों के बीच भी आपसी रार देखने को मिलती है।

उत्तराखंड, कर्नाटक में असंतोष

उत्तराखंड में ही कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के गुटों में बँटी हुई है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में क़रारी हार मिलने के बाद भी यह गुटबाज़ी समाप्त नहीं हुई और इस चुनाव में उसे पाँचों सीटों पर हार के रूप में इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। कर्नाटक में भी पार्टी आंतरिक संघर्ष से जूझ रही है। ज़्यादा विधायक होने के बाद भी उसे राज्य में मुख्यमंत्री का पद हासिल नहीं है। इसे लेकर राज्य के नेताओं में असंतोष है।
राहुल गाँधी के इस्तीफ़ा देने की ख़बर के बाद कई राज्यों में कांग्रेस के नेताओं ने अपने इस्तीफ़े पार्टी आलाकमान को सौंप दिए हैं। राहुल गाँधी इस जिद पर अड़े हैं कि वह कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर नहीं रहेंगे। ऐसे में कांग्रेस को इस ख़राब हालत से उबारने के लिए पार्टी नेतृत्व को राज्यों में नेताओं की गुटबाज़ी पर लगाम लगानी होगी और इसके लिए कड़े से कड़े क़दम उठाने होंगे। वरना हार के बाद हार के लगातार झटकों के बाद पार्टी का संगठन इस स्थिति में नहीं है कि वह बीजेपी का मुक़ाबला कर सके।  
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