सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को वैध ठहराए जाने के बाद कांग्रेस ने कई कड़े सवाल पूछे हैं। कांग्रेस ने कहा कि कोर्ट ने SIR की संवैधानिक वैधता तो मानी, लेकिन अपने फ़ैसले में उतने ही नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं। पार्टी ने कहा है कि फ़ैसले में ये भी लिखा है कि जहाँ नागरिकता का प्रश्न उठता है, वहां चुनाव आयोग को ये मुद्दा गृह मंत्रालय जैसी सक्षम संस्था को रेफर करना होगा और ऐसे में उनका निर्णय बाध्यकारी होगा। इसने पूछा है कि यदि ये बात सही है तो देश के कई राज्यों में 7.5 करोड़ लोगों को नागरिकता का निर्णय लेने से पहले कैसे हटाया गया? पार्टी ने पूछा कि इन करोड़ों लोगों का मताधिकार एक ऐसी संस्था द्वारा कैसे छीन लिया गया, जिसे ये अधिकार ही नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि नागरिकता तय करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। यह अधिकार नागरिकता कानून के तहत गृह मंत्रालय जैसी सक्षम संस्था के पास है। चुनाव आयोग सिर्फ प्रशासनिक रूप से इस मामले को देख सकता है।'

कांग्रेस के मुख्य सवाल

सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विरोधाभास बताते हुए पूछा-
  • यदि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता और उसे मामले को गृह मंत्रालय को भेजना होगा तो देश के कई राज्यों में 7.5 करोड़ लोगों को नागरिकता का फ़ैसला होने से पहले ही मतदाता सूची से कैसे हटा दिया गया?
  • इन करोड़ों लोगों का मताधिकार एक ऐसी संस्था ने कैसे छीन लिया, जिसे यह अधिकार ही नहीं है?
उन्होंने आगे कहा, 'फैसले के पैरा 97 से 101 तक पढ़ने से पता चलता है कि चुनाव आयोग में गंभीर खामियां थीं। इन खामियों को सुधारने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि राजनीतिक दल और एनजीओ कोर्ट गए। बिहार में 65 लाख नाम हटाए गए थे। इन नामों को दोबारा प्रकाशित करना और कारण बताना भी कोर्ट में याचिकाएं दायर होने के बाद ही संभव हुआ। कई राज्यों में हाईकोर्ट ने पार्टियों को पक्षकार बनाया, बीएलए यानी बूथ लेवल एजेंट और पैरालीगल को शामिल किया गया ताकि लोग फॉर्म सही तरीक़े से भर सकें।

SIR की समय-सीमा पर सवाल

सिंघवी ने SIR की समय सीमा को सबसे बड़ी गलती क़रार देते हुए कहा कि बिहार में सिर्फ 4 महीने का समय दिया गया और पश्चिम बंगाल में 5 महीने का समय दिया गया। उन्होंने कहा कि यदि यह प्रक्रिया आने वाले चुनावों के लिए शुरू की जाती तो ये समस्याएँ नहीं होतीं। 

कांग्रेस ने कहा कि चुनाव आयोग पहले लोगों को वोटर लिस्ट से हटाता है, फिर फ़ैसला बाद में आता है और बीच में चुनाव हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चुनाव आयोग को जिम्मेदार नहीं ठहराया।

दस्तावेजों को लेकर बड़े गंभीर सवाल

कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट के फ़ैसले के हवाले से कहा, 'पैरा 156 में लिखा है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। पैरा 198 में लिखा है कि राशन कार्ड भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है। जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता का जन्म प्रमाण, जाति प्रमाण पत्र, 10वीं की मार्कशीट आदि भी नागरिकता प्रमाण नहीं माने जा सकते। फिर भी चुनाव आयोग ने SIR की पूरी प्रक्रिया इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर चलाई। मतलब निष्कासन यानी डिलीशन पहले हुआ और निर्णय बाद में लिया गया।'

पश्चिम बंगाल को लेकर SC से कड़े सवाल

सिंघवी ने बताया कि पश्चिम बंगाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अपील की व्यवस्था बनाई गई। 6000 अपीलों में से 4000 अपीलें यानी 80% मंजूर हो गईं। यानी 80% लोगों को गलती से हटाया गया था। लेकिन तब तक चुनाव हो चुका था। उन्होंने पूछा, 'क्या इससे चुनावों की वैधता पर सवाल नहीं उठता? कोर्ट को इस पर भी टिप्पणी करनी चाहिए थी।'

बीजेपी का राहुल पर हमला

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद बीजेपी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने एक्स पर लिखा, "राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी बेनकाब! सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को कानूनी और संवैधानिक घोषित कर दिया है। साफ है कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने SIR का विरोध इसलिए किया क्योंकि वे अवैध घुसपैठियों के साथ खड़े थे, भारतीय मतदाताओं के साथ नहीं।
यह सच्चे अर्थों में ‘एंटी-नेशनल एक्ट’ था।" बीजेपी ने राहुल गांधी से पूछा है कि क्या वे भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने के लिए माफी मांगेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को SIR की वैधता को बरकरार रखा है। क्या चुनाव आयोग यानी ईसीआई किसी व्यक्ति की नागरिकता सीमित दायरे में तय कर सकती है, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग ऐसा कर सकता है, लेकिन सिर्फ यह तय करने के सीमित उद्देश्य से कि उस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं। इससे उस शख्स की नागरिकता खत्म नहीं हो जाएगी। कोर्ट ने कहा कि अगर आयोग किसी व्यक्ति की पात्रता को लेकर संतुष्ट नहीं होता, तो उसे उस व्यक्ति का मामला केंद्र सरकार के सक्षम अथॉरिटी को भेजना होगा। चुनाव आयोग का फैसला केवल मतदाता सूची तक सीमित रहेगा और नागरिकता का अंतिम निर्णय संबंधित ट्रिब्यूनल ही करेगा।
यह फैसला बिहार समेत अन्य राज्यों में SIR के दौरान लाखों नाम हटाए जाने को लेकर दायर याचिकाओं पर आया है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व एक्ट के तहत SIR करने का अधिकार नहीं है। अब इस फ़ैसले पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस कांग्रेस इसे बड़े पैमाने पर वोटरों के अधिकार छीनने का मामला और लोकतंत्र के लिए खतरा बता रही है, जबकि भाजपा इसे स्वच्छ और पारदर्शी मतदाता सूची बनाने की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।