महिला आरक्षण के बहाने लोकसभा सीटों की संख्या 850 तक बढ़ाने की चर्चा पर सवाल उठ रहे हैं। क्या इसके बहाने से सरकार मनमाना डिलिमिटेशन करने का नियंत्रण चाहती है? इसके लिए संविधान संशोधन कितना खतरनाक हो सकता है?
महिला आरक्षण के नाम पर क्या लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का बड़ा खेल होने वाला है और क्या यह बेहद ख़तरनाक है? कम से कम विपक्षी दल और इस विषय के जानकार तो यही कहते हैं। उनका कहना है कि इसके लिए संविधान में जो संशोधन का प्रस्ताव है इससे राज्यों की सीटों का पूरा-पूरा बंटवारा फिर से हो सकता है और मनमाने तरीक़े से इलाकों की सीमा बदलने के रास्ते खुल जाएंगे। इसमें कम से कम चार ऐसे विवादास्पद बिंदु हैं जिन्हें बेहद ख़तरनाक कहा जा रहा है। तो ये ख़तरनाक बिंदु क्या हैं? इसे जानने से पहले यह जान लीजिए कि आख़िर पूरा प्रस्ताव क्या है।
मोदी सरकार के प्रस्ताव में मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने की योजना है। सरकार का कहना है कि इस बढ़ोतरी से लंबे समय से लंबित महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण क़ानून को आसानी से लागू किया जा सकेगा। इसके साथ ही 2011 की जनगणना के आधार पर नए सिरे से सीटों का डिलिमिटेशन भी होगा। रिपोर्टों के अनुसार इस संबंध में एक मसौदा बिल सांसदों के बीच बांटा जा चुका है। सरकार 16 अप्रैल से शुरू होने वाले तीन दिन के विशेष संसद सत्र में ज़रूरी संवैधानिक संशोधन लाने की तैयारी कर रही है।
सांसदों को बाँटे गए प्रस्ताव के मुताबिक़ राज्यों में 815 सीटें होंगी, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों में 35 सीटें होंगी। इस तरह कुल 850 सीटें हो जाएंगी। ये बदलाव 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू होने की संभावना है।
महिलाओं का आरक्षण कैसे लागू होगा?
2023 में पास हुए महिलाओं के आरक्षण वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए पहले सीटों की नई डिलिमिटेशन ज़रूरी है। सीटें बढ़ाने से पुरानी सीटों को काटे बिना ही एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकेंगी। इससे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी।
योगेंद्र यादव ने किया आगाह
पोलिटिकल एक्टिविस्ट और विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इस संशोधन को लेकर आगाह किया है और इनको बेहद ख़तरनाक बताया है। उन्होंने कहा है, 'मैंने अभी संसद में इस हफ्ते की स्पेशल सेशन में पेश होने वाले संविधान (131वें संशोधन) विधेयक, 2026 की एक कॉपी देखी। इससे सबको जितना डर था यह उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक है। इससे राज्यों की सीटों का पूरा-पूरा बंटवारा फिर से हो सकता है और मनमाने तरीके से इलाकों की सीमा बदलने के रास्ते खुल जाएंगे।'- यादव ने कहा, "जैसा सबको लग रहा था, महिलाओं की ज्यादा भागीदारी के नाम पर असल में यह बिल जल्दी डिलिमिटेशन करने और लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 815 करने का रास्ता तैयार कर रहा है।'
- उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री और मंत्रियों ने जो आश्वासन दिया था, उसके उलट इस बिल में हर राज्य की मौजूदा सीटों का अनुपात बरकरार रखने की कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने कहा कि 1971 की जनगणना पर आधारित पुरानी रोक को पूरी तरह हटा दिया गया है। इसे 2026 के बाद भी जारी रखने की बात थी। सरकार जो सुरक्षा देने का वादा कर रही थी, उसका कोई ज़िक्र तक नहीं है।
- योगेंद्र यादव ने कहा, 'और सबसे बुरी बात- किस जनगणना के आधार पर सीटें फिर से बांटी जाएंगी, यह फ़ैसला अब संविधान से हटाकर साधारण कानून यानी संसद के साधारण बहुमत के हाथ में दे दिया गया है।'
- उन्होंने कहा, 'असल सीटों का बंटवारा और इलाकों की सीमाएं तय करना डिलिमिटेशन कमीशन करेगा, जिसके बारे में संविधान में कुछ भी नहीं लिखा है। और इस फैसले को कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती।'
विपक्ष की आपत्तियाँ
विपक्ष इस प्रस्ताव का विरोध करने की तैयारी कर रहा है। खासकर, 2011 की जनगणना के आधार पर डिलिमिटेशन करने पर आपत्ति है। कांग्रेस, आप, आरजेडी, डीएमके जैसी पार्टियाँ कह रही हैं कि 2021 की नई जनगणना के आधार पर यह काम होना चाहिए। इंडिया गठबंधन की कई पार्टियाँ पिछड़ी जातियों की महिलाओं के लिए आरक्षण के अंदर आरक्षण की मांग भी उठा रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के घर विपक्षी नेताओं की बैठक होने वाली है। तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के नेता इसमें शामिल होंगे। दोनों पार्टियाँ पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव लड़ रही हैं।
तृणमूल सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा है कि संवैधानिक संशोधन बिल पास करने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए, इसलिए सरकार को विपक्ष का सहयोग लेना पड़ेगा।
स्टालिन का ‘अंतिम चेतावनी’ वाला संदेश
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने मंगलवार को वीडियो संदेश जारी कर केंद्र सरकार को ‘अंतिम चेतावनी’ दी। उन्होंने कहा कि चुनाव के बीच विशेष सत्र बुलाकर बिना चर्चा के संवैधानिक संशोधन थोपने की कोशिश की जा रही है। स्टालिन ने कहा, 'यह तमिलनाडु के दरवाजे पर पहुंचा गंभीर खतरा है। हमने परिवार नियोजन अपनाया, छोटे परिवार बनाए। क्या अब इसके लिए सजा मिल रही है? दक्षिणी राज्यों को नुकसान न हो, इसकी गारंटी प्रधानमंत्री संसद में दें, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अगर तमिलनाडु को नुक़सान हुआ तो हम पूरे देश को जगाएंगे। तमिलनाडु लड़ेगा और जीतेगा।'
स्टालिन ने कहा कि उन्होंने कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और विपक्षी नेताओं के साथ चेन्नई में संयुक्त कार्रवाई समिति बनाई थी। फिर भी केंद्र सरकार बिना सलाह-मशविरे के आगे बढ़ रही है।
सरकार का कहना है कि सीटें बढ़ाने से विकास और प्रतिनिधित्व दोनों बेहतर होंगे। वहीं विपक्ष इसे दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय और राजनीतिक चाल बता रहा है। 16 अप्रैल से शुरू होने वाला विशेष सत्र बेहद अहम होगा। पूरे देश की नज़र इस पर है कि आखिर क्या फ़ैसला होता है- महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी या क्षेत्रीय असंतुलन का नया विवाद खड़ा होगा।