दिल्ली की एक अदालत ने अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय के दो आपराधिक मामलों में बरी कर दिया है। ये मामले दिल्ली की अब रद्द हो चुकी शराब नीति केस से जुड़े थे। ईडी ने केजरीवाल पर छह समन को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया था। इस फ़ैसले के बाद केजरीवाल ने एक्स पर लिखा- 'सत्यमेय जयते'। आप ने ईडी के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है। तमाम विपक्षी दल यही लगातार आरोप लगाते रहे हैं।

अदालत के फ़ैसले के बाद आम आदमी पार्टी ने ईडी और बीजेपी पर राजनीतिक विद्वेष से काम करने का आरोप लगाया है। आप ने कहा है, 'एक बार फिर साबित हो गया है कि बीजेपी राजनीतिक विद्वेष में ईडी का इस्तेमाल करती है और ईडी भी बीजेपी के राजनैतिक हथियार के रूप में काम करती है। अरविंद केजरीवाल जी को झूठे केस में फंसाने के लिए बीजेपी ने ईडी के साथ घटिया साजिश की थी। अदालत का ये फैसला इनके मुंह पर करारा तमाचा है।'

कोर्ट ने पूछा- क़ानून की अवमानना कैसे?

ईडी का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है और इस पर कैसे कैसे आरोप लगते रहे हैं, यह जानने से पहले यह जान लें कि कोर्ट ने क्या कहा है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट परास दलाल की अदालत ने फैसला सुनाया कि केवल पेश न होना जानबूझकर कानून की अवमानना नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ईडी यह साबित नहीं कर पाई कि केजरीवाल ने जानबूझकर समन की अवहेलना की।

ये दो मामले फरवरी और मार्च 2024 में दर्ज किए गए थे। इनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 174 के तहत केजरीवाल पर आरोप था। यह धारा किसी लोक सेवक के आदेश का पालन न करने पर लगती है। पीएमएलए यानी मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून के तहत ईडी को ऐसे मामलों में कार्रवाई करने का अधिकार है।
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ईडी समन भेजने का सबूत भी नहीं दे पायी

अदालत ने फ़ैसला दिया कि ईडी ने ईमेल से भेजे गए समन को सही तरीके से साबित नहीं किया। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और पीएमएलए में ईमेल से समन भेजने का कोई प्रावधान नहीं है। सीआरपीसी में समन को फिजिकल रूप से देने और उसकी रसीद लेने की प्रक्रिया बताई गई है। अदालत ने कहा कि जब पीएमएलए में समन देने का तरीका साफ़ नहीं है, तो ईडी अपना खुद का तरीका नहीं बना सकती। उसे सीआरपीसी के नियमों का पालन करना होगा।

ईडी ने छह समन ईमेल से भेजे थे। तीन 2023 में और तीन 2024 में। अदालत ने कहा कि ईडी के गवाहों द्वारा पेश किए गए ईमेल सबूत सही नहीं थे। उनमें मैसेज आईडी, तारीख, समय जैसी ज़रूरी जानकारी नहीं थी, जो सबूत क़ानून के तहत ज़रूरी है। अदालत ने इसे कानून के खिलाफ बताया।

समन भेजने में भी घपला?

केजरीवाल की तरफ से सीनियर एडवोकेट रेबेका जॉन ने अदालत में कहा कि समन गलत तरीके से भेजे गए थे और वे वैध नहीं थे। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने हर समन के जवाब में वैध कारण बताए थे। उन्होंने विधानसभा चुनाव, राज्यसभा चुनाव और दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों की जानकारी दी थी। 

केजरीवाल के वकील ने कोर्ट से कहा कि ईडी ने उन्हें राजनीतिक रूप से अपमानित करने के इरादे से समन जारी किए। अदालत से यह भी कहा गया कि ईमेल मिलने से पहले समन मीडिया में लीक किए जाते थे।

साबित होने से पहले आरोपी निर्दोष: कोर्ट

अदालत ने एक बेहद अहम टिप्पणी की। इसने कहा कि जांच अधिकारी को याद रखना चाहिए कि जिसे समन किया जा रहा है, वह आरोपी है और सबूत से पहले निर्दोष माना जाता है। किसी को सिर्फ संभावना या अनुमान पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता हर व्यक्ति के लिए पवित्र है।

बता दें कि केजरीवाल को शराब नीति मामले में 21 मार्च 2024 को ईडी ने गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें जमानत मिली और सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिली हुई है, जो अब भी जारी है। यह फैसला केजरीवाल और आप के लिए बड़ी जीत मानी जा रही है।

ईडी पर राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप क्यों?

ईडी पर राजनीतिक इस्तेमाल होने का आरोप अक्सर लगता है क्योंकि कई लोग मानते हैं कि यह एजेंसी मुख्य रूप से विपक्षी नेताओं को निशाना बनाती है। सरकारी डेटा और रिपोर्टों के अनुसार 2014 से अब तक ईडी ने राजनेताओं के खिलाफ सैकड़ों केस दर्ज किए हैं। इनमें से 95% से ज़्यादा केस कांग्रेस, आप, टीएमसी, जेएमएम जैसे विपक्षी पार्टियों के नेताओं के ख़िलाफ़ हैं। मुख्यमंत्री जैसे पदों पर रहने के दौरान ही दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल और झारखंड के पूर्व सीएम हेमंत सोरेन जैसे नेताओं पर कार्रवाई की गई, उनको गिरफ़्तार किया गया और उनको मुख्यमंत्री पद तक गँवाना पड़ा था।

कई बार चुनाव से पहले या राजनीतिक विवाद के दौरान ईडी की कार्रवाई बढ़ जाती है। विपक्ष का आरोप है कि यह राजनीतिक बदले की भावना से होता है, ताकि विरोधी नेता कमजोर पड़ें या पार्टी प्रभावित हो।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ईडी को फटकार लगाई है। जुलाई 2025 में कोर्ट ने कहा था कि 'ईडी का इस्तेमाल राजनीतिक लड़ाई के लिए क्यों हो रहा है? राजनीतिक मुद्दे वोटरों के सामने लड़ने चाहिए, कोर्ट में नहीं।' कोर्ट ने ईडी पर राजनीतिक लड़ाई लड़ने का आरोप लगाया और कहा कि यह संघीय ढांचे का उल्लंघन कर सकती है। हेमंत सोरेन के मामले में भी अदालत ने ईडी की खिंचाई की थी। मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन जैसे नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर भी ईडी को फटकार लगी।
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विपक्ष का दावा है कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी या उसके सहयोगियों पर ऐसे केस बहुत कम हैं। ईडी के पास पीएमएलए यानी मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून के तहत बिना वारंट छापा, गिरफ्तारी, संपत्ति जब्त करने जैसी बहुत सख्त ताकत है। आरोप है कि इनका दुरुपयोग राजनीतिक विरोध दबाने के लिए होता है।

ईडी कितने मामलों में सजा दे पाती है?

ईडी के कुल मामलों में सजा की दर बहुत कम है। 2014 से अब तक 6300 से ज़्यादा पीएमएलए केस दर्ज हुए। लेकिन यदि सजा की बात हो तो असल में कुल दर्ज मामलों की तुलना में सजा बहुत कम है। हालाँकि कुल सजा तो क़रीब 150 मामलों में हुई है। राजनेताओं पर पिछले 10 साल में 193 केस हुए, लेकिन सिर्फ 2 में सजा हुई यानी सजा 1% से भी कम है। यानी कुल पीएमएलए केस में कन्विक्शन रेट 1-2% के आसपास है क्योंकि ज्यादातर केस अभी ट्रायल में लंबित हैं, हजारों पेंडिंग हैं। विपक्ष कहता है कि इतने केस सिर्फ परेशान करने के लिए होते हैं, सजा कम मिलती है। बीजेपी इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि ईडी कानून के अनुसार काम कर रही है, लेकिन विपक्ष इसे 'लोकतंत्र पर हमला' मानता है।