दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और कथित मतदाता अधिकारों के मुद्दे पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्रकारों के मुताबिक, प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पुलिस ने उनके साथ मारपीट की, उन्हें जबरन हिरासत में लिया, कैमरे और मोबाइल फोन छीनने की कोशिश की तथा कई मामलों में पत्रकारों के मोबाइल, कैमरे आदि भी तोड़ दिए।
The News Minute की रिपोर्ट के अनुसार, जंतर मंतर प्रदर्शन की कवरेज करने वाले करीब 20 पत्रकारों से बातचीत की गई। इन पत्रकारों ने हिरासत, शारीरिक हमले, धमकी और काम करने से रोकने के आरोप लगाए। इनमें डिजिटल मीडिया, यूट्यूब समाचार चैनलों और दूसरे मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकार शामिल हैं।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पत्रकारों, वकीलों और अन्य पेशेवरों को उनके काम में बाधा नहीं डालने का निर्देश दिए जाने के बाद भी पत्रकारों को हिरासत में लेने और उनके साथ कथित मारपीट की घटनाएं सामने आईं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी पत्रकार हिरासत में

रिपोर्ट के अनुसार, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपने पेशेवर कर्तव्य निभाने से किसी भी तरह नहीं रोका जाना चाहिए। इसके बावजूद, उसी दिन दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों को पुलिस ने पकड़ा। पत्रकारों के बयानों के मुताबिक, प्रेस कार्ड और मीडिया संस्थान का पहचान पत्र दिखाने के बावजूद कई पुलिसकर्मियों ने उनकी बात नहीं सुनी। कुछ पत्रकारों को बसों और पुलिस वाहनों में बैठाकर अलग-अलग जगहों पर ले जाया गया। कुछ को दूसरे पत्रकारों के हस्तक्षेप के बाद छोड़ा गया, जबकि कुछ को घंटों तक पुलिस थानों में रखा गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई पत्रकारों के मोबाइल फोन में मौजूद वीडियो और तस्वीरों को मिटाने का दबाव बनाया गया। कुछ पत्रकारों ने अपने कैमरे, लेंस, बैटरी और मेमोरी कार्ड के गायब होने या क्षतिग्रस्त होने की शिकायत की।
ताज़ा ख़बरें

प्रेस कार्ड दिखाने पर भी पीटा, पेट पर बंदूक की नली लगाई

The News Minute को एक पत्रकार ने बताया कि 11 अक्टूबर की शाम करीब छह बजे वह कनॉट प्लेस और संसद मार्ग के आसपास पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहा था। इसी दौरान एक पुलिस अधिकारी, जिसकी पहचान एएसआई कपिल कुमार के रूप में बताई गई, ने उससे पूछताछ शुरू कर दी।
पत्रकार के मुताबिक, उसने पुलिसकर्मियों से कहा कि वह केवल प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहा है और किसी तरह की परेशानी पैदा नहीं करना चाहता। इसके बावजूद चार-पांच लोगों ने उसे पकड़कर धक्का दिया, कॉलर से खींचा और सिर पर वार किए। उसका आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उसे बस में बैठाया और उसका फोन छीनने तथा कैमरा तोड़ने की कोशिश की। बाद में उसे दूसरे पुलिसकर्मियों के हवाले किया गया। उसने प्रेस कार्ड दिखाकर हिरासत में नहीं लेने की अपील की, लेकिन कथित तौर पर उसे पुलिस वाहन में डाल दिया गया।
पत्रकार ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उसके पेट पर बंदूक की नली और डंडे से दबाव बनाया तथा चेहरे पर भी वार किए। उसने यह भी बताया कि जब उसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया तो पुलिसकर्मियों ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। आखिरकार, जब उसने अपने फोन में मौजूद तस्वीरों को डिलीट करने का दिखावा किया, तब उसे जाने दिया गया।

पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा को उठाकर बस में ले गई पुलिस

रिपोर्ट में पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा के साथ हुई घटना का भी उल्लेख है। वह 11 अक्टूबर को रामकृष्ण आश्रम मेट्रो स्टेशन के आसपास प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने पहुंची थीं। उनके साथ कैमरामैन अनुज भी थे। प्रज्ञा के अनुसार, उन्होंने एक युवक को पुलिस की लाठी से घायल होकर गिरते देखा और उसकी रिपोर्टिंग शुरू की। इसी दौरान पुलिस ने उनके कैमरामैन को पकड़ लिया। जब वह उसे बचाने पहुंचीं तो एक पुलिस अधिकारी ने कथित तौर पर उन्हें भी पकड़ने और बस में डालने का निर्देश दिया।
प्रज्ञा ने पुलिस को अपना माइक आईडी और पहचान पत्र दिखाया, लेकिन इसके बावजूद महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें जबरन बस में बैठाया। उनके मुताबिक, उन्हें इस तरह खींचा गया कि उनके कपड़े तक फट गए। रिपोर्ट में मौजूद वीडियो फुटेज के विवरण के अनुसार, कम से कम चार पुलिसकर्मी प्रज्ञा मिश्रा को हाथ-पैर से पकड़कर उठाते और बस की ओर ले जाते दिखाई देते हैं। इस दौरान वह अपना माइक पकड़े हुए थीं और हिरासत का विरोध कर रही थीं।

24 News के पत्रकार सुहैल मोहम्मद और कैमरामैन को भी घसीटा

रिपोर्ट के मुताबिक, एक अन्य पत्रकार ने बताया कि वह रामकृष्ण आश्रम मेट्रो स्टेशन की ओर प्रदर्शन कवर करने जा रहा था। रास्ते में उसने पुलिस को 24 News के रिपोर्टर सुहैल मोहम्मद और कैमरामैन राहुल को बस में डालते देखा। उसने घटना की रिकॉर्डिंग शुरू की तो पुलिसकर्मियों ने उसका हाथ पकड़ लिया। पहचान पत्र दिखाने के बावजूद उसे भी वैन में बैठा दिया गया। वाहन में मौजूद पत्रकारों ने पुलिस को बताया कि वे मीडिया से हैं, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। बाद में उन्होंने सड़क पर खड़े केरल के कुछ मीडियाकर्मियों को आवाज लगाकर अपनी हिरासत की जानकारी दी। दूसरे पत्रकारों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया और विरोध जताया। इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया। इस वाहन में सात लोगों को ले जाया गया था, जिनमें रिपोर्ट के अनुसार केवल एक व्यक्ति प्रदर्शनकारी था। बाकी लोगों में पत्रकार भी शामिल थे।

सारा खान को 8 से 10 पुलिसकर्मियों ने घसीटा

11 अक्टूबर को दोपहर करीब 12:30 बजे पत्रकार वेदांत और वीडियो पत्रकार सारा खान राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के सामने कनॉट प्लेस में रिपोर्टिंग कर रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने दोनों को पकड़कर अलग-अलग बसों में बैठा दिया। सारा खान ने बार-बार बताया कि वह पत्रकार हैं, लेकिन पुलिस ने उनकी बात नहीं सुनी। उनके अनुसार, आठ से दस पुलिसकर्मियों, जिनमें अधिकतर महिला कांस्टेबल थीं, ने उन्हें घसीटकर बस में डाला। इस दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की और कथित मारपीट हुई। उन्हें करीब पांच से दस मिनट तक बस में रखा गया। बाद में डीसीपी सचिन शर्मा ने वेदांत को पहचान लिया और दोनों को छोड़ने के लिए कहा। एक अन्य डीसीपी ने सारा खान से बल प्रयोग के लिए माफी भी मांगी। पुलिस की ओर से यह सफाई दी गई कि उन्हें पता नहीं था कि दोनों पत्रकार हैं।

दक्षिणपंथी समूह के साथ विवाद के बाद पत्रकार को हिरासत में लियाः एक अन्य पत्रकार ने बताया कि 11 अक्टूबर की रात करीब आठ बजे उसे कनॉट प्लेस के ब्लॉक बी के सामने हिरासत में लिया गया और लगभग एक घंटे बाद छोड़ा गया। उसके मुताबिक, वहां विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े लोगों के समूह के साथ एक व्यक्ति मौजूद था, जो कथित तौर पर लोगों पर हमला करने की कोशिश कर रहा था। पत्रकार ने इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग शुरू की तो समूह के लोगों ने उसके खिलाफ नारेबाजी की और रिपोर्टिंग रोकने की कोशिश की।

पत्रकार ने आरोप लगाया कि उसने पुलिस से मदद मांगी, लेकिन उसकी शिकायत सुनने के बजाय उसे ही हिरासत में ले लिया गया। उसने एक कांस्टेबल धर्मेंद्र कुमार से सुरक्षा मांगी थी। पत्रकार के मुताबिक, हिरासत में ले जाते समय उसने नारे लगाए तो पुलिसकर्मी ने उसकी पीठ और जांघ पर लाठी से तीन बार वार किया। बाद में उसके वकील ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया, जिसके बाद उसे छोड़ा गया।

सीपीएम दफ्तर के बाहर प्रदर्शन कवर करते समय पत्रकार के कपड़े फटे

10 अक्टूबर को मंडी हाउस स्थित एचकेएस सुरजीत भवन, जो सीपीआई (एम) का कार्यालय है, के बाहर वामपंथी संगठनों के प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे एक पत्रकार ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने अचानक उसे खींचना शुरू कर दिया। पत्रकार ने कहा कि उसके गले में प्रेस कार्ड था और उसने पुलिस को अपनी पहचान बताई, लेकिन उसे बस में डाल दिया गया। इस दौरान उसकी कमर पर चोट लगी और शर्ट के कई बटन टूट गए। उसके मुताबिक, पुलिस बस करीब डेढ़ घंटे तक घूमती रही। गर्मी के बीच बस से धुआं निकलने लगा, जिससे अंदर बैठे लोगों में घबराहट फैल गई। यात्रियों ने बस में आग लगने की आशंका जताते हुए छोड़ने की मांग की। इसके बाद पुलिस ने बस का दरवाजा खोला और सभी लोग बाहर निकले।

कैमरे का लेंस टूटा, बैटरी और मेमोरी कार्ड गायब

जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे एक पत्रकार ने बताया कि वह पुलिस द्वारा एक महिला को घसीटकर ले जाने की घटना रिकॉर्ड कर रहा था। पुलिसकर्मियों ने उससे पहचान पूछी और उसका कैमरा अपने कब्जे में ले लिया। करीब आधे घंटे बाद कैमरा लौटाया गया तो उसका लेंस टूटा हुआ था और बैटरी तथा मेमोरी कार्ड गायब थे। इसके बाद पत्रकार को जाफराबाद पुलिस थाने ले जाया गया, जो उसके अनुसार जंतर-मंतर से 50 किलोमीटर से भी अधिक दूर था। पत्रकार ने बताया कि उसे लगभग दो घंटे तक थाने में रखा गया और शाम करीब 7:30 बजे अन्य हिरासत में लिए गए लोगों के साथ छोड़ दिया गया। उसने कहा कि नया लेंस खरीदने पर 50,000 से 60,000 रुपये तक खर्च हो सकते हैं।

घर के बाहर से पत्रकार को उठाया, वीडियो डिलीट करने का दबाव

रिपोर्ट में स्क्रॉल की एक रिपोर्ट को भी अनुमति के साथ दोबारा प्रकाशित किया जा रहा है। पत्रकार शोएब ने बताया कि 10 अक्टूबर को वह दक्षिण दिल्ली में अपने घर के बाहर टैक्सी का इंतजार कर रहे थे। उन्हें जंतर-मंतर जाना था। घर के बाहर पुलिस चेकपोस्ट देखकर उन्होंने एक पुलिसकर्मी से बातचीत की। इसके बाद पुलिसकर्मी ने उनका बैग जांचा, आधार कार्ड की तस्वीर ली, पता दर्ज किया और उन्हें हिरासत में लेने की बात कही। शोएब के अनुसार, पुलिस ने उन्हें बस में बैठा लिया और नजदीकी थाने ले जाने की बात कहकर भी सड़क पर ही एक घंटे से ज्यादा समय तक रोके रखा। पुलिसकर्मियों ने उनके फोन में हिरासत की घटनाओं के वीडियो डिलीट करने के लिए दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। उनका कहना था कि पुलिस ने हिरासत का कारण बताते हुए शहर में अव्यवस्था और उस दिन के हालात का हवाला दिया। बाद में उन्हें दोपहर करीब 2:30 बजे छोड़ा गया।

केरल के पत्रकारों को थानों में ले जाकर घंटों बैठाए रखने का आरोप

10 अक्टूबर को दिल्ली के केरल हाउस पहुंचने में बैरिकेडिंग के कारण दिक्कतों का सामना करने वाले कुछ पत्रकारों ने बताया कि प्रेस कार्ड दिखाने के बाद भी पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी। बाद में एचकेएस सुरजीत भवन के पास वामपंथी नेताओं के मार्च की रिकॉर्डिंग के दौरान एक महिला पुलिस अधिकारी ने एक पत्रकार का हाथ पकड़ लिया। कुछ देर बाद पत्रकारों को जबरन पुलिस वैन में बैठाया गया। उनके मुताबिक, उन्हें पहले बुराड़ी पुलिस थाने और फिर सराय रोहिल्ला पुलिस थाने ले जाया गया। रास्ते में उनसे नागरिकता संशोधन कानून (CAA)-राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध और पहले के प्रदर्शनों में शामिल होने के बारे में सवाल पूछे गए। पुलिस ने उनके पते, फोन नंबर और अन्य निजी जानकारी दर्ज की और उनसे हस्ताक्षर भी कराए। पत्रकारों को शाम करीब 5:45 बजे तक बैठाए रखा गया। उनका कहना था कि पुलिस ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है।

एक लाख रुपये का कैमरा जब्त, पुलिस ने नहीं लौटाया

10 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में रिपोर्टिंग कर रहे दो पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वे सादे कपड़ों में मौजूद कुछ लोगों को पुलिस के साथ खड़े होकर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ नारे लगाते हुए रिकॉर्ड कर रहे थे। उन लोगों के नारे का आशय था कि पुलिस प्रदर्शनकारियों को लाठियों से पीटे और  उन्हें पाकिस्तानी कहकर संबोधित किया जाए। पत्रकारों ने पुलिस से सवाल किया कि ये लोग कौन हैं और पुलिस के साथ उनकी क्या भूमिका है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के प्रमुख आईपीएस अधिकारी अनिल शुक्ला ने पत्रकार लखविंदर सिंह का कैमरा ले लिया और एक कांस्टेबल को सौंप दिया। दोनों पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। उन्हें पहले सिविल लाइंस और फिर कश्मीरी गेट थाने ले जाया गया। शाम करीब 7:30 बजे उन्हें छोड़ा गया। पत्रकारों ने बताया कि कैमरे की कीमत करीब एक लाख रुपये थी और उन्हें यह जानकारी नहीं दी गई कि कैमरा कहां है।

हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार अशिष सिंह को बस में डालाः हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार अशिष सिंह ने बताया कि वह पुलिस द्वारा लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया और किसी नुकीली वस्तु से चोट पहुंचाई। उन्होंने बार-बार बताया कि वह हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार हैं और अपना पहचान पत्र भी दिखाया, लेकिन पुलिस ने उनकी बात नहीं सुनी। इसके बाद उन्हें एक फोटो पत्रकार के साथ बस में बैठा दिया गया। अशिष सिंह के मुताबिक, वह प्रदर्शनकारियों से दूर थे और पुलिस के काम में बाधा भी नहीं डाल रहे थे। फिर भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। करीब 20 से 30 मिनट बाद जब बस मंदिर मार्ग के पास पहुंची, तो वह दूसरे पत्रकार के साथ बस से उतर गए। उन्हें आशंका थी कि पुलिस उनके फोन छीनकर रिकॉर्डिंग मिटा सकती है।

सिर्फ PIB कार्ड वाले पत्रकारों को मान्यता देने पर सवाल

10 अक्टूबर को जंतर-मंतर की ओर जा रहे दो पत्रकारों ने बताया कि सम्राट होटल के पास पुलिस ने उन्हें रोका। उन्होंने अपने मीडिया संस्थानों के पहचान पत्र दिखाए, लेकिन पुलिस ने कहा कि किसी के पास भी प्रेस कार्ड हो सकता है और उसकी जांच जरूरी है। पत्रकारों के अनुसार, पुलिस ने कहा कि केवल प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) कार्ड वाले पत्रकारों को जाने दिया जाएगा। इसके बाद उन्हें चाणक्यपुरी पुलिस थाने ले जाया गया। वहां उनसे आधार कार्ड, घर का पता और अन्य विवरण मांगे गए। उन्हें करीब चार घंटे तक रखा गया। पत्रकारों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें काफी देर तक यह भी नहीं बताया कि वे औपचारिक रूप से हिरासत में हैं या नहीं। रिपोर्ट में दूसरे पत्रकारों ने भी कहा कि पुलिस ने उनके संस्थान के कार्ड को मान्यता देने से इनकार किया, जबकि उनके मुताबिक पुलिस की एडवाइजरी में संस्थान द्वारा जारी पहचान पत्र या PIB कार्ड, दोनों स्वीकार करने की बात थी।

वरिष्ठ पत्रकार को भी नहीं छोड़ा गया

रिपोर्ट में 70 वर्ष से अधिक उम्र के एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ हुई घटना का भी जिक्र है। वह जंतर-मंतर के पास एक मीडिया संस्थान को इंटरव्यू दे रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें पकड़कर वाहन में बैठा लिया। वीडियो के मुताबिक, तीन पुलिसकर्मियों ने उन्हें हाथों से पकड़कर उठाया। वहां मौजूद लोग सवाल कर रहे थे कि वरिष्ठ पत्रकार को हिरासत में लेने की क्या जरूरत है। पत्रकार ने बताया कि उन्हें लगभग 20 मिनट तक वाहन में रखा गया और फिर उस जगह से करीब आधा किलोमीटर दूर छोड़ दिया गया, जहां से उन्हें उठाया गया था। उन्होंने कहा कि अब वह पुलिस की कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए अदालत जाने की तैयारी कर रहे हैं।

न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार हिरासत में

न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकारों ने बताया कि 10 अक्टूबर को उनके सहयोगी अनमोल प्रीतम और कैमरापर्सन अंशु आनंद को पुलिस ने हिरासत में लिया। जब दूसरे पत्रकार वहां पहुंचे और अपना परिचय दिया, तो पुलिस ने कथित तौर पर उन्हें भी पकड़ने की बात कही। एक पत्रकार ने बताया कि उसने अपना मीडिया कार्ड दिखाने के लिए फोन निकाला तो एक आईपीएस अधिकारी ने उसका फोन छीन लिया। पत्रकारों के मुताबिक, उन्हें छत्रसाल स्टेडियम होते हुए आदर्श नगर पुलिस थाने ले जाया गया। पूरी यात्रा में लगभग डेढ़ घंटे लगे। बाद में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद कुछ पत्रकारों को छोड़ने की बात हुई। पत्रकारों ने सभी हिरासत में लिए गए मीडियाकर्मियों को एक साथ छोड़ने की मांग की। पुलिस ने इस कार्रवाई को अनजाने में हुई गलती बताया, जबकि पत्रकारों ने आरोप लगाया कि पुलिस को उनकी पहचान के बारे में पता था।

पत्रकारों की पहचान उजागर करने वालों पर भी सवाल

रिपोर्ट में कई पत्रकारों ने यह आरोप लगाया कि कुछ दक्षिणपंथी समूहों के लोग प्रदर्शन स्थल पर पत्रकारों की पहचान कर पुलिस को उनके बारे में बता रहे थे। इसके बाद पुलिस उन्हें हिरासत में ले लेती थी। कुछ पत्रकारों ने यह भी कहा कि पुलिसकर्मियों ने उनके कैमरों और प्रेस कार्ड को छिपाकर रखने की स्थिति पैदा कर दी। उनका कहना था कि सामान्य तौर पर प्रेस कार्ड सार्वजनिक रूप से पहनने से पत्रकारों को प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहचान बताने में मदद मिलती है, लेकिन इस बार उन्हें डर था कि पहचान उजागर होने पर उन्हें ही निशाना बनाया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कुछ पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को पकड़ने के दौरान चोटें आईं। एक पत्रकार ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने उसे जमीन पर गिरा दिया और कूल्हे पर लात मारी। दूसरे पत्रकार ने एक पुलिस अधिकारी पर धमकी देने का आरोप लगाया।

प्रेस की आज़ादी पर गंभीर सवाल

The News Minute की रिपोर्ट में सामने आए इन बयानों से दिल्ली में प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और स्वतंत्र पत्रकारिता के अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
इन घटनाओं में तीन प्रमुख चिंताएं सामने आती हैं:
  • पत्रकारों के काम में बाधा: पहचान पत्र दिखाने के बावजूद रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लेने के आरोप।
  • रिकॉर्डिंग और उपकरणों पर कार्रवाई: मोबाइल फोन, कैमरे और मेमोरी कार्ड छीनने, क्षतिग्रस्त करने या वीडियो डिलीट कराने के दबाव के आरोप।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन: 11 अक्टूबर के आदेश के बाद भी पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की शिकायतें।