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दिशा रवि केस बंद करने की तैयारी क्यों; बिना सबूत ही बताया था राजद्रोही?

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि के मामले में सरकार और पुलिस की ज़बरदस्त किरकिरी होनी तय है। रिपोर्ट है कि जल्द ही पुलिस इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करेगी। साफ़ तौर पर कहें तो पुलस केस बंद करने की तैयारी में है। वह अभी तक चार्जशीट भी दाखिल नहीं कर पाई है। दरअसल, उसे चार्जशीट के लिए कोई आधार ही नहीं मिल रहा है। वह भी तब जब पूरे पुलिस महकमे से लेकर सरकार में शामिल लोगों तक ने दिशा रवि को अंतरराष्ट्रीय साज़िश का हिस्सा बता दिया था, खालिस्तानियों से संबंध होने के आरोप लगाए थे और देश के लिए ख़तरा के तौर पर पेश किया गया था।

पुलिस ने दिशा रवि को उस टूलकिट का हिस्सा बताया है जिसके बारे में आरोप लगाया गया था कि 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा पूर्व नियोजित एक साज़िश थी और जिसका मक़सद भारत की संप्रभुता और सुरक्षा पर हमला करना था। उन पर राजद्रोह का भी मुक़दमा किया गया था।

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दिशा पर पुलिस ने आरोप लगाया है कि उन्होंने एक टूलकिट को तैयार करने और इसे सोशल मीडिया पर आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। दिल्ली पुलिस के मुताबिक़, दिशा ने मुंबई की वकील निकिता जैकब और पुणे के इंजीनियर शांतनु के साथ मिलकर टूलकिट को तैयार किया था। इस टूलकिट को स्वीडन की पर्यावरणविद् ग्रेटा तनबर्ग (थनबर्ग) ने ट्वीट किया था। पुलिस का दावा है कि इस टूलकिट के पीछे सिख अलगाववादी संगठन पोएटिक जस्टिस फ़ाउंडेशन यानी पीजेएफ़ का हाथ है। उसके अनुसार यह टूलकिट केंद्र सरकार के कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे किसानों को लेकर बनाया गया था। 

इस मामले में दिशा रवि ने अदालत को बताया था कि उन्होंने इस टूलकिट को नहीं बनाया और वह सिर्फ़ किसानों का समर्थन करना चाहती थीं। दिशा के मुताबिक़, 3 फ़रवरी को उन्होंने इस टूलकिट की दो लाइनों को एडिट किया था। दिशा को इस साल 13 फ़रवरी को गिरफ़्तार किया गया था और 10 दिन बाद ज़मानत पर छोड़ा गया था।

यह वह वक़्त था जब यह मामला छाया हुआ था। मुख्यधारा के अधिकतर मीडिया की रिपोर्टों से ऐसे जाहिर हो रहा था कि 22 साल की उस लड़की से पूरा देश ख़तरे में पड़ गया था। तब ऐसा लग रहा था कि देश में इससे बड़ा कोई मुद्दा ही नहीं है। बस गूगल पर एक दस्तावेज दिखा और फिर दिशा रवि गिरफ़्तार कर ली गईं।

लेकिन इसी मामले में अब आठ महीने बाद वही पुलिस एक सबूत भी नहीं ढूंढ पा रही है। इस मामले में वह लाचार सी दिख रही है।

'द इंडियन एक्सप्रेस' ने पुलिस सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि इस मामले में गूगल और ज़ूम ने पुलिस के सवालों का जवाब नहीं दिया है इसलिए उसके सामने अब केस को बंद करने का विकल्प है। रिपोर्ट के अनुसार एक अधिकारी ने कहा कि 26 जनवरी को लाल किला हिंसा से पहले ज़ूम कॉल पर कथित तौर पर दिशा रवि और निकिता जैकब दिखे थे और इस संदर्भ में ज़ूम से जानकारी मांगी गई। टूलकिट मामले में गूगल से भी जानकारी मांगी गई। लेकिन अधिकारी के अनुसार वहाँ से कोई जानकारी नहीं मिली है। 

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सरकारी एजेंसी को जवाब नहीं दे रहा गूगल?

पुलिस अधिकारी जिन गूगल और ज़ूम पर जानकारी नहीं देने का आरोप लगा रहे हैं वे ऐसी कंपनियाँ हैं जो सरकारी नियम-क़ायदों को मानने के लिए बाध्य हैं। सरकार हाल ही में डिजिटल मीडिया गाइडलाइंस एंड पॉलिसी लेकर आई है जिसे हर कंपनी को मानना ही होगा। इसमें शिकायत निवारण अधिकारी जैसे प्रावधान भी शामिल हैं जो आम लोगों की शिकायतों के लिए भी जवाबदेह होता है। ऐसे में किसी सरकारी एजेंसी के सवालों का जवाब देने से कोई कंपनी बच नहीं सकती है।

यदि कोई कंपनी उन नियमों को नहीं मानती है तो फिर देश में उन्हें क़ानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी और फिर उनके ख़िलाफ़ आपराधिक केस दर्ज किए जा सकते हैं। ट्विटर को ऐसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। ट्विटर इंडिया द्वारा नियमों का पूरा पालन नहीं करने पर उसे मिलने वाली क़ानूनी सुरक्षा ख़त्म हो गई थी और फिर इसी वजह से ट्विटर इंडिया के प्रमुख के ख़िलाफ़ कई एफ़आईआर भी दर्ज की गई थीं। 

delhi police on disha ravi toolkit case and sedition charges - Satya Hindi

बहरहाल, अब जो रिपोर्ट आ रही है कि जाँच टीम मामले में क्लोजर रिपोर्ट जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है, उसके संकेत तो अदालतों की टिप्पणियों में पहले से ही देखा जा सकता था। दिशा रवि की गिरफ़्तारी के 10 दिन बाद ही ज़मानत देते हुए कोर्ट ने कह दिया था कि जिन आरोपों के तहत दिशा को गिरफ़्तार किया गया है उसके लिए कोई सबूत नहीं है। सुनवाई के दौरान दिल्ली सत्र न्यायालय के न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने कहा था, '26 जनवरी को हिंसा के अपराधियों को उस पीजेएफ़ (पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन) या याचिकाकर्ता/आरोपी से जोड़ने वाला रत्ती भर भी सबूत मेरे सामने नहीं लाया गया है।'

‘सरकारों के घायल अहं की तुष्टि के लिये राजद्रोह...’

न्यायाधीश राणा ने अपने फ़ैसले में साफ़ लिखा था, 'किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिक सरकार की अंतरात्मा की आवाज़ के रक्षक होते हैं। उन्हें जेल में सिर्फ इस आधार पर नहीं डाला जा सकता है कि वे सरकार की नीतियों से इत्तेफाक़ नहीं रखते... राजद्रोह सरकारों की घायल अहं की तुष्टि के लिये नहीं लगाया जा सकता है।'

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केंद्र सरकार को फटकार

दिशा रवि की एक याचिका पर केंद्र सरकार ने जब 19 मई तक दिल्ली हाई कोर्ट में जवाब दाख़िल नहीं किया था तो इसे लेकर अदालत ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी। अदालत ने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार को 17 मार्च को अंतिम मौक़ा दिया गया था। जस्टिस रेखा पल्ली ने कहा था, 'भारत सरकार के लिए क्या कोई आख़िरी या अंतिम मौक़ा नहीं होता। यह ख़राब बात है। फिर अदालत की इस बात का क्या मतलब रह जाता है कि यह आख़िरी मौक़ा है। यह समझना मुश्किल है। अदालत की गरिमा का क्या होगा।'

बता दें कि दिशा रवि ने पहले सोशल मीडिया पर अपना अनुभव साझा किया था और अपनी एक पोस्ट में कहा था कि उनकी स्वायत्तता का उल्लंघन किया गया और इसके लिए टीआरपी चाहने वाले न्यूज़ चैनल ज़िम्मेदार हैं।

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