दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान हटाए गए लाखों मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप के संकेत दिए हैं। अदालत ने चुनाव आयोग (ECI) की उस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई 28 अक्टूबर तय कर दी है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पहले से रजिस्टर्ड मतदाताओं को मतदाता सूची में दोबारा नाम शामिल कराने के लिए नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने को कहा जा रहा है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संकेत दिया कि वह इस समस्या का समाधान करने वाला आदेश पारित करने पर विचार कर रही है। अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दिल्ली में SIR के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और उन्हें दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है।

47.56 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला

दिल्ली में SIR की गणना प्रक्रिया के दौरान कुल 47,56,722 मतदाताओं के नाम मसौदा मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। यह संख्या SIR शुरू होने से पहले मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं की लगभग 32.78 प्रतिशत थी। इन मतदाताओं को ASDD श्रेणी में रखा गया। इस श्रेणी में अनुपस्थित (Absent), स्थानांतरित (Shifted), मृत (Dead) और डुप्लिकेट (Duplicate) मतदाताओं को शामिल किया गया है।
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विवाद इस बात पर है कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें नाम दोबारा जुड़वाने के लिए पहली बार पंजीकरण कराने वाले आवेदकों के लिए निर्धारित फॉर्म-6 भरने को क्यों कहा जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे मतदाताओं के सामने एक ऐसी घोषणा करने की बाध्यता पैदा होती है, जो उनकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती।

फॉर्म-6 पर आपत्ति क्यों?

फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में पहली बार नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। इसमें आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर रहा है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, SIR के दौरान जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, वे पहले ही मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड थे। इनमें ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जिन्होंने पिछले चुनावों में मतदान किया है। ऐसे मतदाताओं से फॉर्म-6 भरवाकर पहली बार नाम दर्ज कराने की घोषणा लेना तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है।
याचिका में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति यह घोषणा करता है और उसे गलत पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का खतरा पैदा हो सकता है। इसी आधार पर चुनाव आयोग से अनुरोध किया गया है कि हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए अलग और उपयुक्त प्रक्रिया बनाई जाए।

प्रशांत भूषण ने अदालत में क्या दलील दी?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में यह मामला उठाया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग हटाए गए मतदाताओं से फॉर्म-6 भरने को कह रहा है, जबकि इस फॉर्म में पहली बार मतदाता सूची में शामिल होने की घोषणा करनी होती है। भूषण ने अदालत से अनुरोध किया कि आयोग को ऐसे मतदाताओं के लिए फॉर्म-8 का इस्तेमाल करने या कोई नया उपयुक्त फॉर्म तैयार करने का निर्देश दिया जाए। फॉर्म-8 का इस्तेमाल मुख्य रूप से मतदाता सूची में दर्ज पते को बदलने या अन्य तय सुधारों के लिए किया जाता है। उन्होंने इस मामले की तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए कहा कि निर्धारित तारीख तक इंतजार करने से मतदाताओं को राहत देने का अवसर निकल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहले 30 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि दिल्ली SIR में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख भी 30 अक्टूबर तय थी। प्रशांत भूषण ने अदालत से कहा कि 28 अक्टूबर को सुनवाई होने से भी मतदाताओं को राहत देने के लिए बहुत कम समय बचेगा। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ऐसा आदेश पारित करने पर विचार कर रही है, जो इस समस्या का समाधान कर सके। पीठ ने मुख्य मामले की सुनवाई 28 अक्टूबर को तय कर दी। हालांकि, अदालत की टिप्पणी को अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। मतदाताओं के लिए कौन-सी वैकल्पिक प्रक्रिया लागू होगी, इस पर अंतिम आदेश का इंतजार है।

गलत घोषणा पर एक साल तक की सजा का खतरा?

याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 का हवाला दिया गया है। इस प्रावधान के तहत मतदाता सूची से संबंधित किसी घोषणा में जानबूझकर गलत जानकारी देने पर एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को जब पहली बार पंजीकरण कराने की घोषणा करने के लिए कहा जाता है, तो वे कानूनी दुविधा में पड़ सकते हैं। उनके सामने सवाल है कि नाम बहाल कराने के लिए ऐसा फॉर्म कैसे भरा जाए, जिसकी घोषणा उनकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती। यह याचिकाकर्ताओं की कानूनी दलील है। इसका अर्थ यह नहीं है कि फॉर्म-6 भरने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ खुद से आपराधिक कार्रवाई होगी। किसी मामले में दायित्व तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करेगा।

SIR के अतिरिक्त घोषणा-पत्र पर भी सवाल

याचिका में केवल फॉर्म-6 को लेकर ही आपत्ति नहीं की गई है। इसमें SIR के दिशानिर्देशों के तहत फॉर्म-6 और फॉर्म-8 के साथ मांगे जाने वाले अतिरिक्त घोषणा-पत्र की वैधता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह अतिरिक्त घोषणा-पत्र तय वैधानिक प्रक्रिया के तहत लागू नहीं किया गया। उनका तर्क है कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने की वैधानिक प्रक्रिया के साथ कोई अतिरिक्त अनिवार्य शर्त केवल प्रशासनिक निर्देश के जरिए नहीं जोड़ी जा सकती, विशेषकर तब जब इसका असर मतदाता के अधिकारों पर पड़ता हो। याचिका के अनुसार, चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि सामान्य अवधि में, जब SIR नहीं चल रहा हो, तब इस अतिरिक्त घोषणा-पत्र की आवश्यकता नहीं होगी। याचिकाकर्ताओं ने इस अंतर को भी सवालों के घेरे में रखा है।

'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के आधार पर नोटिस जारी करने पर भी सवाल

यह विवाद दिल्ली SIR से संबंधित पहले से लंबित याचिका से भी जुड़ा है। सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने चुनाव आयोग तथा दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की प्रक्रिया को चुनौती दी है। याचिका में मांग की गई है कि आयोग उन मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करे, जिन्हें नोटिस जारी किए गए हैं, और प्रत्येक मामले में नोटिस देने के विशिष्ट कारण बताए। 
याचिकाकर्ताओं ने 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' यानी तार्किक विसंगति की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानदंडों, परिभाषाओं, एल्गोरिदम संबंधी मापदंडों और प्रशासनिक दिशानिर्देशों का खुलासा करने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी दिल्ली SIR के दौरान मतदाताओं को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा था कि नोटिस लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं। अदालत ने यह स्पष्ट करने की जरूरत बताई थी कि तार्किक विसंगति निर्धारित करने का आधार क्या है।

अब 28 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर

दिल्ली SIR से जुड़े इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि हटाए गए मतदाताओं को अपना नाम बहाल कराने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनानी चाहिए और फॉर्म-6 तथा अतिरिक्त घोषणा-पत्र से संबंधित आपत्तियों पर क्या निर्देश दिए जाने चाहिए। इस विवाद का महत्व केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। यह इस सवाल से भी जुड़ा है कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं के नाम हटने के बाद उन्हें दोबारा सूची में शामिल कराने के लिए कितनी सरल, पारदर्शी और कानूनी रूप से उचित व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए। 28 अक्टूबर की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर है। अदालत ने समाधान देने वाला आदेश पारित करने का संकेत दिया है, लेकिन अंतिम राहत और उसके दायरे का पता सुनवाई के बाद ही चलेगा।