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चुनाव आयुक्त अशोक लवासा एडीबी के उपाध्यक्ष चुने गए; इलेक्शन कमीशन छोड़ेंगे?

लोकसभा चुनाव में आचार संहिता भंग करने के मामले में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को क्लीनचिट पर आपत्ति जताने वाले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा को एडीबी यानी एशियाई डेवलपमेंट बैंक का वाइस प्रेसिडेंट चुना गया है। यानी उनका चुनाव आयोग को छोड़कर फ़िलीपिंस आधारित इस बैंक को ज्वाइन करना तय है। चुनाव आयोग में लवासा का कार्यकाल अभी क़रीब दो साल बाक़ी है और वह मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के बाद दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं। इस हिसाब से वह मुख्य चुनाव आयुक्त बनकर सेवानिवृत्त होते। लवासा ने एडीबी में जाने का फ़ैसला क्यों किया, इस बारे में उन्होंने अभी तक कुछ नहीं कहा है। हालाँकि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से लवासा का परिवार मुश्किलों के दौर से गुज़रा है। उनके परिवार के कई सदस्यों को आयकर विभाग की ओर से नोटिस जारी किया गया था।

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अब यदि लवासा चुनाव आयोग से इस्तीफ़ा देते हैं तो वे अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव आयोग से हटने वाले केवल दूसरे चुनाव आयुक्त होंगे। आख़िरी बार किसी चुनाव आयुक्त ने ऐसा 1973 में तब किया था जब मुख्य चुनाव आयुक्त नागेंद्र सिंह को हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया था।

यदि लवासा बने रहे तो मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी के रूप में वह उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा सहति कई अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव कराते। 

मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि एडीबी में उनकी नियुक्ति को केंद्र सरकार की सहमति के साथ अंतिम रूप दिया गया। हालाँकि अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं की गई है कि उन्होंने चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफ़ा दे दिया है या नहीं।

लवासा उपाध्यक्ष दिवाकर गुप्ता, जो बैंक में निजी क्षेत्र के संचालन और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के प्रभारी हैं, का स्थान लेंगे। गुप्ता 31 अगस्त को अपना कार्यकाल पूरा करेंगे।
एडीबी उपाध्यक्ष को तीन साल के कार्यकाल के लिए नियुक्त करता है, जिसे अगले दो वर्षों तक बढ़ाया जा सकता है। एडीबी अध्यक्ष एक प्रबंधन टीम का अध्यक्ष होता है जिसमें छह उपाध्यक्ष होते हैं।

वैसे, चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का परिवार पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से काफ़ी मुश्किलों में रहा। लवासा ने लोकसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता भंग करने के मामले में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को क्लीनचिट देने के मामले में आपत्ति की थी। चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों पर विचार करने के लिए अंतिम बैठक पिछले साल 3 मई को हुई थी, जिसमें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगे आरोपों की जाँच की गई थी। दोनों को ‘क्लीन चिट’ दी गई थी।

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इस मामले में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को चिट्ठी लिख कर इस बात पर असंतोष जताया था कि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों पर विचार करने वाली बैठकों में उनकी असहमतियों को दर्ज नहीं किया जाता है। लवासा ने कहा था कि ‘अल्पसंख्यक विचार’ या ‘असहमित’ को दर्ज नहीं किए जाने की वजह से वह इन बैठकों से ख़ुद को दूर रखने पर मजबूर हैं।

इस मामले के आने के बाद चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की मुश्किलें बढ़ गई थीं। पिछले साल सितंबर महीने में अंग्रेजी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ख़बर दी थी कि चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की पत्नी नोवेल सिंघल लवासा कर चोरी के आरोपों में आयकर विभाग के रडार पर हैं और उन्हें विभाग की ओर से 10 कंपनियों में निदेशक होने के संबंध में दिये आयकर रिटर्न को लेकर नोटिस जारी किया गया है। बाद में जानकारी आई थी कि लवासा की बहन शकुंतला लवासा को विभाग की ओर से नोटिस जारी किया गया। शकुंतला लवासा बाल चिकित्सक हैं। 

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