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रंजन गोगोई ने ली शपथ, राज्यसभा में लगे शर्म करो के नारे

संसद सदस्य की शपथ लेने वाले व्यक्ति को आमतौर पर साथी सदस्यों की ओर से बधाई दी जाती है। लेकिन शायद ही कभी आपने ऐसा देखा होगा कि भारतीय संसद में कोई व्यक्ति शपथ ले रहा हो और कुछ सदस्यों की ओर से शर्म करो के नारे लगाये जाएं। गुरुवार को ऐसा ही हुआ जब पूर्व चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (सीजेआई) रंजन गोगोई के शपथ लेते वक्त कांग्रेस सांसदों ने शर्म करो-शर्म करो के नारे लगाये। कांग्रेस ने गोगोई को राज्यसभा के लिये मनोनीत करने की कड़ी निंदा की है। गोगोई को राज्यसभा के लिये मनोनीत किये जाने के बाद से ही अदालती महकमे और सियासी गलियारों में माहौल बेहद गर्म है। 

राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 है, जिनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। गोगोई से पहले पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा सांसद बने थे। एक और पूर्व सीजेआई पी. शतशिवम भी केरल के राज्यपाल बने थे। जस्टिस गोगोई पिछले साल नवंबर में रिटायर हुए थे।

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रंजन गोगोई ने कहा है कि वह इस घटना को लेकर टिप्पणी नहीं करना चाहते। सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर ने गोगोई को राज्यसभा के लिये मनोनीत किये जाने के राष्ट्रपति के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। कोर्ट में दायर याचिका में किश्वर ने कहा है कि यह फ़ैसला न्यायपालिका की आज़ादी और विश्वसनीयता के साथ समझौता करता है। 

किश्वर ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि अदालत इस फ़ैसले पर रोक लगाने का निर्देश दे। किश्वर ने कहा है कि गोगोई को राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा सदस्य मनोनीत करना एक राजनीतिक नियुक्ति है और इसलिये इससे उनके सीजेआई रहते हुए दिये गये फ़ैसलों पर शक पैदा होता है। किश्वर ने कहा है कि न्यायपालिका की आज़ादी संविधान के बुनियादी ढांचे का अहम अंग है। 

राज्यसभा में मनोनयन को लेकर उठ रहे विवादों के बीच जस्टिस गोगोई ने कहा था कि उन्होंने इस पद को इसलिये स्वीकार किया है कि क्योंकि ऐसा उनका विश्वास है कि देश के निर्माण में विधायिका और न्यायपालिका को साथ मिलकर काम करना चाहिए।
कांग्रेस ने कहा है कि जस्टिस गोगोई का मनोनयन संविधान के बुनियादी ढांचे पर गंभीर, अभूतपूर्व और अक्षम्य हमला है। गोगोई के मनोनयन पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ने कहा है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश की ओर से राज्यसभा का मनोनयन स्वीकार करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर आम जनता का भरोसा हिल गया है। जबकि पूर्व जस्टिस लोकुर ने इसे लेकर कहा है कि क्या आख़िरी क़िला भी ढह गया है?

कई अहम फ़ैसले सुनाये थे

गोगोई ने अपने कार्यकाल में कई अहम फ़ैसले सुनाये। गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने वर्षों से चले आ रहे राम मंदिर-बाबरी मसजिद विवाद मामले में फ़ैसला सुनाया था। इसके अलावा लोकसभा चुनाव 2019 में सरकार और विपक्ष के बीच चुनाव का मुद्दा बने रफ़ाल लड़ाकू विमान के सौदे में कथित गड़बड़ी के मामले में भी रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने फ़ैसला सुनाया था। 
गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने सीजेआई दफ़्तर को आरटीआई यानी सूचना का अधिकार क़ानून के दायरे में लाये जाने का फ़ैसला भी सुनाया था। कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सीजेआई दफ़्तर पब्लिक अथॉरिटी है। इस बेंच में रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एन. वी. रमन्ना, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना भी थे। 
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