भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते (India-US Trade Agreement) के विरोध में 'दिल्ली चलो' मार्च निकालने निकले किसानों ने मंगलवार को शंभू बॉर्डर पर भारी हंगामे और गतिरोध के बाद अपना विरोध प्रदर्शन फिलहाल टाल दिया है। हरियाणा सरकार द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ 8 से 10 दिनों के भीतर बैठक कराने के लिखित/आधिकारिक आश्वासन के बाद किसानों ने शंभू बॉर्डर खाली कर दिया और वापस लौट गए।

किसान मार्च का घटनाक्रम

किसान भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित कृषि व्यापार समझौते का विरोध कर रहे हैं। किसान नेताओं का कहना है कि अमेरिका में खेती अत्यधिक मशीनीकृत और अत्यधिक सब्सिडी वाली है। यदि यह समझौता लागू होता है, तो भारत के बाजारों में सस्ता अमेरिकी कृषि उत्पाद भर जाएगा, जिससे भारतीय किसानों को भारी नुकसान होगा।

  • मंगलवार को शुरू हुआ गतिरोध: मंगलवार सुबह करीब 8 बजे पंजाब से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली के किसान घाट पर महापंचायत में शामिल होने के लिए रवाना हुए थे। हरियाणा पुलिस ने घग्गर नदी के पुल पर कंक्रीट के ब्लॉक और बैरिकेड्स लगाकर राष्ट्रीय राजमार्ग को पूरी तरह से सील कर दिया, जिससे राजमार्गों पर भीषण जाम लग गया।

  • किसान नेताओं की हिरासत और रिहाई: अंबाला और कुरुक्षेत्र में दिल्ली की ओर बढ़ रहे कई किसानों और प्रमुख नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। इनमें बीकेयू (चढूनी) के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी और प्रवक्ता राकेश बैंस भी शामिल थे। शाम को मंत्री से बातचीत के बाद पुलिस ने सभी हिरासत में लिए गए नेताओं को रिहा कर दिया।

प्रशासन और किसान नेताओं के बीच समझौता

इसके बाद हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा और अंबाला के उपायुक्त (DC) अजय सिंह तोमर ने शंभू बॉर्डर पहुंचकर किसान नेता सरवन सिंह पंधेर और तेजवीर सिंह समेत प्रतिनिधियों से वार्ता की।

  • मांग पत्र सौंपा गया: किसान संगठनों ने हरियाणा के कृषि मंत्री को अपना मांग पत्र सौंपा।
  • मुलाकात का आश्वासन: मंत्री ने आश्वासन दिया कि वे मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से बात करेंगे और 8-10 दिनों के अंदर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ किसान प्रतिनिधियों की बैठक तय कराएंगे।
  • मार्ग हुआ बहाल: अंबाला एसपी अजीत सिंह शेखावत के अनुसार, आश्वासन मिलने के बाद किसानों ने अपना मार्च वापस ले लिया और बॉर्डर खाली कर दिया, जिसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात सामान्य हो गया है।
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आगे की रणनीति

किसान मजदूर संघर्ष समिति के नेता सरवन सिंह पंधेर और बीकेयू (शहीद भगत सिंह) के प्रवक्ता तेजवीर सिंह ने स्पष्ट किया कि किसानों का इरादा अनिश्चितकालीन धरने का नहीं था। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के साथ होने वाली बैठक के रुख को देखने के बाद ही किसान संगठन अपने अगले कदम का ऐलान करेंगे।
'देश बचाओ मोर्चा' के बैनर तले दिल्ली के किसान घाट पर एक दिवसीय 'किसान महापंचायत' का आह्वान किया गया है। किसान संगठनों का आरोप है कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से देश के कृषि और डेयरी क्षेत्र को बड़ा नुकसान पहुंचेगा तथा भारतीय किसानों के हित प्रभावित होंगे।

किसान क्यों कर रहे हैं भारत-अमेरिका ट्रेड डील का विरोध

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौते / अंतरिम व्यापार सौदे) को लेकर भारतीय किसान संगठनों में गहरा असंतोष है। किसान नेताओं का मानना है कि इस समझौते से देश के कृषि क्षेत्र और छोटे किसानों को भारी नुकसान पहुंचेगा।
असमान प्रतिस्पर्धा (Unequal Competition)
अमेरिका में बड़ी जोत और भारी सब्सिडी: अमेरिका में खेती बहुत बड़े पैमाने (हजारों एकड़) पर होती है और वहां की सरकार अपने किसानों को भारी वित्तीय सब्सिडी और बीमा सुरक्षा देती है।
भारत में छोटे किसान: भारत में अधिकांश (80% से अधिक) किसानों के पास छोटे खेत (खंडित भूमि) हैं। किसान नेताओं का तर्क है कि अमेरिका के अत्यधिक रियायती और सस्ते कृषि उत्पादों के आगे भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाएंगे।

सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पादों की डंपिंग की आशंका

किसान संगठनों को डर है कि आयात शुल्क (Tariff) कम होने से भारतीय बाजारों में अमेरिकी कृषि उत्पाद भर जाएंगे
प्रभावित होने वाली फसलें: सोयाबीन, मक्का, दालें, कपास, मेवे (बादाम, अखरोट) और फल (जैसे सेब)। यदि ये उत्पाद सस्ते दामों पर भारत में बिकेंगे, तो स्थानीय भारतीय फसलों के दाम गिर जाएंगे, जिससे घरेलू किसानों की आय बुरी तरह प्रभावित होगी।

डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर पर खतरा

अमेरिका लंबे समय से भारत के विशाल डेयरी (दूध, मक्खन, पनीर) और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) बाजार में पहुंच बनाने की मांग करता रहा है। भारत के करोड़ों छोटे किसान और ग्रामीण परिवार डेयरी से अपनी आजीविका चलाते हैं। किसानों को डर है कि अमेरिका से सस्ते डेयरी उत्पादों के आने पर उनका व्यवसाय चौपट हो जाएगा।
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MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और सरकारी खरीद पर असर

किसान नेताओं का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के नियमों के कारण सरकार पर घरेलू सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी मूल्य-सहायता योजनाओं को सीमित करने का वैश्विक दबाव बन सकता है। किसान यूनियनों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने इस इतने बड़े व्यापार समझौते का मसौदा (Text/Draft) सार्वजनिक नहीं किया है और न ही किसान प्रतिनिधियों के साथ कोई पूर्व परामर्श किया है।

सरकार का पक्ष

हालांकि, केंद्रीय वाणिज्य और कृषि मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि भारत के संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों (जैसे गेहूं, चावल, मक्का, दूध, पोल्ट्री आदि) को इस समझौते में विशेष सुरक्षा दी गई है या उन्हें शुल्क छूट से बाहर रखा गया है। फिर भी, किसान संगठन समझौते का पूरा आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक करने और ठोस सुरक्षा गारंटी की मांग पर अड़े हुए हैं।