कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 विकास और कल्याण कार्य करने वाले NGO और अल्पसंख्यक संस्थानों का गला घोंटने के लिए लाए गए हैं। उन्होंने नये नियम को तुरंत वापस लेने की मांग की है।
नरेंद्र मोदी और केसी वेणुगोपाल
कांग्रेस ने विदेशी चंदा नियमन यानी एफसीआरए के नियमों में हाल में किए गए बदलावों को सिविल सोसायटी पर सुनियोजित हमला क़रार दिया है। इसने कहा है कि यह एनजीओ और अल्पसंख्यक संस्थानों का गला घोंटने की कोशिश है। पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि नए एफ़सीआरए नियम को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार इन नियमों के ज़रिए गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ और सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को सीमित करना चाहती है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि इन बदलावों का मक़सद विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।
क्या हैं नए FCRA नियम?
गृह मंत्रालय ने हाल ही में FCRA नियमों में संशोधन किया है। नए नियमों के तहत विदेशी फंड पाने वाले संगठनों को अपने काम के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र को सरकार द्वारा तय की गई सूची में से चुनना होगा। इसके अलावा किसी संस्था के प्रमुख पदों पर यदि भारतीय मूल के अलावा अन्य विदेशी नागरिक हैं तो सामान्य परिस्थितियों में उसे न तो विदेशी फंड पाने की अनुमति दी जाएगी और न ही पंजीकरण होने दिया जाएगा। सरकार ने कुछ धार्मिक और आस्था आधारित गतिविधियों को अनुमति दी है, लेकिन धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को कई श्रेणियों से बाहर रखा गया है।कांग्रेस ने क्या आपत्ति जताई?
प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में वेणुगोपाल ने कहा कि ये नियम किसी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए नहीं बल्कि सामाजिक संगठनों को नियंत्रित और कमजोर करने के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने लिखा कि सरकार एनजीओ को एक तयशुदा सूची से काम या गतिविधियाँ चुनने और सीमित क्षेत्रों में काम करने के लिए मजबूर कर रही है। इससे संस्थाओं का वह लचीलापन खत्म हो जाएगा, जिसके ज़रिए वे आपदा, सामाजिक संकट या स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार काम करती हैं।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अलग-अलग राज्यों या अतिरिक्त गतिविधियों के लिए अलग शुल्क लगाना सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाओं पर 'प्रशासनिक टैक्स' थोपने जैसा है।छोटे संगठनों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
वेणुगोपाल का कहना है कि नए नियमों में छोटी प्रशासनिक गलतियों पर भी भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में जुर्माना फंड की 30 प्रतिशत राशि या न्यूनतम एक लाख रुपये तक हो सकता है। इससे छोटे और जमीनी स्तर पर काम करने वाले संगठन आर्थिक रूप से बुरी तरह प्रभावित होंगे।
कांग्रेस का दावा है कि बड़ी संस्थाओं के पास कानूनी और प्रशासनिक संसाधन होते हैं, लेकिन गांवों और दूरदराज क्षेत्रों में काम करने वाले छोटे संगठन ऐसे नियमों का सामना नहीं कर पाएंगे।
सोशल मीडिया की जानकारी क्यों मांगी?
कांग्रेस ने नियमों में सोशल मीडिया अकाउंट, वेबसाइट और प्रकाशित सामग्री की जानकारी अनिवार्य रूप से देने के प्रावधान पर भी आपत्ति जताई है। वेणुगोपाल ने इसे 'निगरानी की मानसिकता' बताया और कहा कि इससे नागरिक संगठनों की गतिविधियों पर अनावश्यक नियंत्रण बढ़ेगा। उनका आरोप है कि सरकार सामाजिक संगठनों की निगरानी करने और उन्हें दबाव में रखने की कोशिश कर रही है।
अल्पसंख्यक संस्थाओं को लेकर भी चिंता
कांग्रेस ने कहा कि नए नियमों का असर विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित संस्थाओं पर पड़ सकता है। पार्टी का कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में काम करने वाली अनेक संस्थाएं पहले से ही FCRA जुड़े सख्त नियमों का सामना कर रही हैं और नए संशोधन उनके कामकाज को और मुश्किल बना देंगे।
पहले भी हजारों लाइसेंस रद्द हुए
पत्र में कांग्रेस नेता ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में FCRA का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया गया है और हजारों संगठनों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं। उनके अनुसार, इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सहायता से जुड़े कई कार्यक्रम प्रभावित हुए हैं, जिनका लाभ लाखों लोगों को मिलता था। उन्होंने कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र में स्वतंत्र और मजबूत सिविल सोसायटी की ज़रूरत होती है, न कि ऐसी संस्थाओं की जो सरकारी दबाव में काम करें।
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार पहले संसद में FCRA संशोधन लाने की कोशिश कर चुकी थी, लेकिन अब उन्हीं बदलावों को नियमों के माध्यम से लागू किया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि इससे संसद में व्यापक चर्चा और लोकतांत्रिक बहस की प्रक्रिया कमजोर होती है।
सरकार की मंशा पर सवाल
कांग्रेस का आरोप है कि नए नियमों का मक़सद सामाजिक संगठनों को आर्थिक और प्रशासनिक रूप से कमजोर करना है। पार्टी ने इन्हें कठोर और दमनकारी कदम बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की है।सरकार का पक्ष
हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि FCRA नियमों का मक़सद विदेशी फंडिंग को अधिक पारदर्शी बनाना, धन के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी सहायता निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही खर्च हो। सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ऐसे प्रावधान ज़रूरी हैं।
अब सवाल है कि सरकार इन आपत्तियों पर कोई पुनर्विचार करती है या नहीं। फिलहाल FCRA नियमों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।