पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने SIR को लेकर CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग पर चुनावी कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि एसआईआर की अपील लंबित रहने के बावजूद गैरकानूनी ढंग से चुनाव कराये। फॉर्म 6 को अवैध ढंग से बदला।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी आरके सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग (ECI) पर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) के दौरान चुनावी कानूनों के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया। सिंह ने दावा किया कि SIR की प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। सिंह ने जनता के नाम जारी एक खुले पत्र में SIR की कानूनी वैधता, मतदाता नामों को हटाने की प्रक्रिया, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव, अपीलों के लंबित रहने के दौरान नई मतदाता सूची के इस्तेमाल और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए।
पूरे देश में SIR कराने के फैसले पर सवाल
आरके सिंह ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 का हवाला देते हुए कहा कि एसआईआर किसी खास निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में विशेष परिस्थितियों में कराया जा सकता है और इसके लिए कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना होता है। सिंह के मुताबिक, पूरे देश में एक साथ गहन पुनरीक्षण का आदेश इस प्रावधान की भावना के विपरीत है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देशव्यापी SIR कराने का फैसला पूरी चुनाव आयोग की बैठक में लिया गया था या फिर यह फैसला केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने लिया। उनका तर्क था कि किसी विशेष परिस्थिति के लिए बनाए गए अपवाद को सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता।अपील लंबित होने के बावजूद नई मतदाता सूची पर चुनाव क्यों?
सिंह ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ लंबित अपीलों का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि जिस समय SIR की अधिसूचना जारी हुई थी, उस समय लागू मतदाता सूची का इस्तेमाल तब तक जारी रहना चाहिए था, जब तक पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया और उससे जुड़ी अपीलें समाप्त नहीं हो जातीं। उनका सवाल है कि अगर किसी मतदाता ने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की है और उस पर फैसला अभी बाकी है, तो ऐसी स्थिति में संशोधित मतदाता सूची को चुनाव में इस्तेमाल करने का आधार क्या है?सुनवाई का मौका दिए बिना नाम हटाने का आरोप
आरके सिंह ने आरोप लगाया कि कई मतदाताओं के नाम हटाने से पहले कानून के मुताबिक आवश्यक जांच और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की जिम्मेदारी Electoral Registration Officer (ERO) की है और इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। सिंह ने सवाल उठाया कि क्या नाम हटाने की प्रक्रिया में प्रत्येक मामले की स्वतंत्र जांच की गई और संबंधित मतदाता को पर्याप्त अवसर दिया गया। फॉर्म-6 में बदलाव पर सवाल
SIR के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर भी सिंह ने गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त परिशिष्ट जोड़ा गया, जिसमें आवेदकों से 2003 की मतदाता सूची में दर्ज उनके माता-पिता के नाम से जुड़ी जानकारी मांगी गई। सिंह ने सवाल उठाया कि नए मतदाताओं, खासकर युवाओं, के लिए 2003 की पुरानी मतदाता सूचियों तक पहुंचना कितना संभव है। उनके अनुसार ऐसी अतिरिक्त शर्तें नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को मुश्किल बना सकती हैं।‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर भी आपत्ति
चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल किए गए “logical discrepancies” यानी तार्किक विसंगतियों के आधार पर भी सिंह ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि माता-पिता और बच्चों की उम्र के रिकॉर्ड में अंतर होना अपने आप में गलत या फर्जी होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उनका तर्क था कि देश के गरीब और वंचित तबकों के बहुत से लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र या अन्य आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में उम्र से जुड़ी छोटी-मोटी विसंगतियां दस्तावेजी कमियों का परिणाम हो सकती हैं।गरीब, प्रवासी मजदूरों पर ज्यादा असर का आरोपः सिंह ने दावा किया कि SIR की प्रक्रिया का असर गरीब, हाशिये के समुदायों और प्रवासी मजदूरों पर अधिक पड़ सकता है।
उनके अनुसार, दूसरे राज्यों या शहरों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए अपने मूल निर्वाचन क्षेत्र में वापस जाकर पंजीकरण अथवा दस्तावेज संबंधी प्रक्रिया पूरी करना आसान नहीं है। सिंह का कहना है कि ऐसी परिस्थितियां उन लोगों के लिए अतिरिक्त बाधाएं पैदा कर सकती हैं जो पहले से ही प्रशासनिक और दस्तावेजी कठिनाइयों का सामना करते हैं।
बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल करने का मुद्दा
आरके सिंह ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने के खिलाफ कथित तौर पर बड़ी संख्या में दाखिल की गई आपत्तियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि ऐसी आपत्तियां किस आधार पर स्वीकार की गईं और चुनाव आयोग तथा स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों ने उनका सत्यापन किस प्रक्रिया के तहत किया।
- सिंह ने पश्चिम बंगाल से जुड़े एक मामले का भी उल्लेख किया। उनका दावा है कि करीब 16 लाख मतदाताओं के पंजीकरण को Electoral Registration Officers ने मंजूरी दी थी, लेकिन अपील लंबित रहने के कारण उनके नाम पंजीकृत नहीं किए गए।
- उन्होंने सवाल किया कि इन मामलों में अपील किस आधार पर दायर की गई और क्या ऐसी अपीलों के लिए चुनाव आयोग की अनुमति या कोई निर्धारित प्रक्रिया मौजूद थी।
13 करोड़ नाम हटाने का दावा
आरके सिंह ने अपने पत्र में दावा किया कि SIR की प्रक्रिया के दौरान लगभग 13 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नामों का हटाया जाना मतदान और चुनावी भागीदारी पर गंभीर असर डाल सकता है। सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता डेटाबेस पर अत्यधिक केंद्रीकृत नियंत्रण होने से स्थानीय चुनाव अधिकारियों की किसी पात्र मतदाता का नाम सुधारने या हटाया गया नाम वापस जोड़ने की क्षमता सीमित हो सकती है।CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग
आरके सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि संसद में विपक्ष के पास महाभियोग के लिए आवश्यक संख्या नहीं होने के कारण केवल महाभियोग के रास्ते से CEC को हटाने की कोशिश प्रभावी नहीं होगी। सिंह ने विपक्षी दलों से एकजुट होने और तब तक चुनाव में हिस्सा नहीं लेने की अपील की, जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं दे देते और नियुक्ति की नई व्यवस्था नहीं बनती। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसी व्यवस्था की वकालत की जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश की भूमिका हो।SIR के बीच हुए चुनाव दोबारा कराने की मांग
सिंह ने उन राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की भी मांग की जहां मतदाता नाम हटाए जाने के खिलाफ अपीलें लंबित रहने के दौरान चुनाव कराए गए।
इसके अलावा उन्होंने EVM की जगह बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग भी की। ये सभी मांगें आरके सिंह द्वारा अपने खुले पत्र में उठाई गई हैं।कौन हैं आरके सिंह?
आरके सिंह रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। वे 2019 से 2024 तक नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। इससे पहले वे 2011 से 2013 तक मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय गृह सचिव रहे थे। सिंह ने नवंबर 2025 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से इस्तीफा दिया था। इससे पहले पार्टी ने उन्हें कथित तौर पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित किया था।