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जीनोम सीक्वेंसिंग टीम से वायरोलॉजिस्ट जमील का इस्तीफ़ा, सरकार की आलोचना बनी वजह?

मशहूर वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील ने जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए बने विशेषज्ञों की समिति से इस्तीफ़ा दे दिया है। वे कोरोना से लड़ने के तौर-तरीकों और इसके वैज्ञानिक पहलुओं पर सरकार की आलोचना कई बार कर चुके हैं। 

जमील इंडियन सार्स कोव-2 जीनोम सीक्वेंसिंग कंसोर्शिया (इन्साकॉग) से शुरू से ही जुड़ हुए थे। 

उन्होंने कुछ दिन पहले ही मशहूर अंतरराष्ट्रीय अख़बार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में एक लेख लिख कर कम कोरोना जाँच कराने और साक्ष्यों के आधार पर नीति नहीं बनाने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की थी। 

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'न्यूयॉर्क टाइम्स' का लेख बना विवाद का कारण?

शाहिद जमील ने  'न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपे लेख में कहा था कि साक्ष्यों पर आधारित कोरोना नीति बनाने में काफी दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है, इसका ज़ोरदार विरोध किया जा रहा है। लगभग 800 शीर्ष वैज्ञानिकों ने 30 अप्रैल को केंद्र सरकार को एक चिट्ठी लिख कर कहा था कि कोरोना से जुड़े आँकड़े साझा किए जाएं ताकि कोरोना से लड़ने के मुद्दे पर अध्ययन किया जा सके, भविष्य के बारे में अनुमान लगाया जा सके और कोरोना को रोका जा सके। 

वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील ने कहा है कि आँकड़ों के आधार पर फ़ैसले नहीं लिए जा रहे हैं, जिस वजह से महामारी बेकाबू हो गई और इसका स्थायी प्रभाव दिख सकता है।

क्या कहा था जमील ने?

जमील ने कहा कि नीतियाँ बनाते समय विज्ञान सम्मत फ़ैसले नहीं लिए गए, उसके आधार पर नीतियाँ होनी चाहिए थीं, लेकिन इसके उलट पहले फ़ैसले लिए गए और उसके बाद उसके हिसाब से आँकड़े जुटाए गए। 

उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों की अपनी सीमा है, वे सरकार को सलाह दे सकते हैं, पर नीतियाँ बनाना सरकार का ही काम है। 

यह महत्वपूर्ण है कि इंडियन सार्स कोव-2 जीनोम सीक्वेंसिंग कंसोर्शिया ने सरकार से पहले ही कड़े प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार उसके उलट चुनाव कराने में लग गई, जिसके तहत बड़ी-बड़ी राजनीतिक सभाएं की गईं। 
इसी तरह केंद्र सरकार ने उत्तराखंड सरकार के कुंभ मेले के आयोजन का समर्थन किया था, जिसमें लाखों लोगों ने भाग लिया। कंसोर्शिया के लोग इससे भी नाराज़ हैं। 
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