केंद्र सरकार ने अपनी मंशा बता दी है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल को सार्वजनिक-निजी भागीदारी मोड (पीपीपी) में विकसित किया जाएगा। इसे गलाथिया खाड़ी के हिस्से में बनाया जाएगा। इस सूचना के सामने आने के बाद प्रोजेक्ट को लेकर पहले से ही जारी विवाद बढ़ गया है। पीपीपी का जिक्र आते ही सारी नज़रें अडानी समूह पर गई हैं। अडानी समूह के पास पहले से ही इस देश के तमाम पोर्ट प्रोजेक्ट हैं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल (2019) में इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव किया गया। उसी समय से पर्यावरणविद यहां के आदिवासियों को उजाड़ने, लाखों पेड़ काटने की आशंका जता रहे थे। तब तक अडानी का नाम नहीं आया था। लेकिन अब शिपिंग मिनिस्ट्री ने जिस तरह से इस प्रोजेक्ट को पीपीपी के ज़रिए बनाने की बात कही, उसने सारी आशंकाओं की पुष्टि कर दी है।


अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकसित किए जा रहे इस प्रोजेक्ट में गलाथिया बे में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT), अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, पावर प्लांट और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। पोर्ट की लागत लगभग 40,000 करोड़ रुपये है, और यह भारत के पूर्वी तट, बांग्लादेश और म्यांमार से ट्रांसशिपमेंट ट्रैफिक को संभालने के लिए डिजाइन किया गया है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, यह प्रोजेक्ट भारत के 75% ट्रांसशिप्ड कार्गो को विदेशी बंदरगाहों से वापस लाकर सालाना 200-220 मिलियन डॉलर की बचत कर सकता है। हाल ही में, पोर्ट्स, शिपिंग और वाटरवेज मंत्रालय ने फाइनेंस मंत्रालय के PPP अप्रेजल कमिटी को प्रस्ताव सौंपा है।

10 लाख पेड़ों के कटने की आशंका

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर मुख्य विवाद पर्यावरणीय नुकसान और आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर है। पर्यावरण विशेषज्ञों, सिविल सोसाइटी समूहों और वैज्ञानिकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण से द्वीप के नाजुक इकोसिस्टम को कभी न पूरा होने वाला नुकसान पहुंचेगा। द्वीप पर वर्षा वन, दुर्लभ प्रजातियां (जैसे निकोबार मेगापोड पक्षी और लेदरबैक कछुए) हैं। यहां पर भूकंपीय फॉल्टलाइन हैं, जिससे भूकंप और सुनामी का खतरा रहता है। निर्माण की स्थिति में बड़ा नुकसान हो सकता है। प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए 10 लाख पेड़ कटने का अनुमान है, और यह शॉम्पेन जनजाति के लिए "जनसंहार" का खतरा पैदा कर सकता है।

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हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल फैसला क्यों नहीं दे रहा

कलकत्ता हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें पर्यावरणीय और अन्य कानूनों के उल्लंघन का आरोप है। लेकिन हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल उस पर कोई निर्णय या सुनवाई नहीं कर रहे हैं। सरकार पर आरोप है कि उसने कोरल रीफ्स के मैप्स में हेरफेर किया ताकि प्रोजेक्ट को क्लियरेंस मिल सके। 2021 में प्रोजेक्ट की घोषणा से पहले, सरकारी मैप्स में कोरल रीफ्स को द्वीप के तट से हटाकर समुद्र के बीच में दिखाया गया।

जनजातियों के उजड़ने का खतरा

निकोबार की जनजातीय परिषद के सदस्यों ने कहा कि वे अपनी पैतृक भूमि पर अपना दावा नहीं छोड़ेंगे क्योंकि इससे उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। दरअसल, इन जनजातियों से अपनी ज़मीन पर दावा छोड़ने को कहा गया है।

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने निकोबार प्रोजेक्ट से जुड़ी आलोचनाओं को खारिज किया है, कहा कि सभी वैधानिक क्लियरेंस प्राप्त हैं और प्रोजेक्ट राष्ट्रीय विकास और सुरक्षा के लिए जरूरी है। कुछ अधिकारियों ने आलोचनाओं को "अंतरराष्ट्रीय साजिश" तक बताया है।

अडानी समूह का प्रोजेक्ट से सीधा संबंध किस तरह

विपक्ष और जनसंगठनों का आरोप है कि प्रोजेक्ट का अडानी ग्रुप से सीधा संबंध है। प्रोजेक्ट का PPP मॉडल अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है। अन्य कंपनियां लॉगिंग कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए बोली लगा रही हैं, जो वर्षावन की लकड़ी से करोड़पति बन सकती हैं। आधिकारिक तौर पर अडानी पोर्ट्स ने प्रोजेक्ट में रुचि दिखाई है, और यह उन 10 कंपनियों में शामिल है जिन्होंने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जमा किया है। अडानी पहले से भारत में 13 पोर्ट और टर्मिनल ऑपरेट करता है, और विपक्ष का आरोप है कि अडानी समूह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संरक्षण हासिल है।

मोदी सरकार क्या अडानी समूह की मदद कर रही है

मोदी सरकार प्रोजेक्ट को जोरदार तरीके से आगे बढ़ा रही है, और आलोचनाओं के बावजूद क्लियरेंस दिए जा रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने शुक्रवार को आरोप लगाया है कि सरकार प्राइवेट प्लेयर्स को शामिल करने की कोशिश कर रही है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर सूचनाएं छिपा रही है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि "किस प्राइवेट कॉंग्लोमेरेट" को ध्यान में रखा गया है। उनका इशारा अडानी की तरफ है। भारत में पोर्ट और एयरपोर्ट पर अडानी समूह की कंपनियों का लगभग कब्जा है। कई एयरपोर्ट ऐसे भी हैं जिन्हें सरकार ने तैयार किया लेकिन बाद में प्राइवेट सेक्टर को संचालित करने के लिए देने के नाम पर अडानी समूह को दे दिया। विपक्ष का आरोप है कि कई मामलों में नियम तक बदल दिए गए। उदाहरण के तौरा पर गुजरात के रण ऑफ कच्छ में बॉर्डर नियमों में बदलाव किया गया।


कांग्रेस ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की निष्पक्ष समीक्षा की मांग की

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस पार्टी प्रोजेक्ट को "पर्यावरणीय आपदा" बताया है। पार्टी ने सभी क्लियरेंस सस्पेंड करने और संसदीय समिति से निष्पक्ष समीक्षा की मांग की है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में इसे आदिवासियों के लिए "अस्तित्व का खतरा" बताया और सरकार पर कानूनी प्रक्रियाओं का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने मैप मैनिपुलेशन, हाई-पावर्ड कमिटी की विश्वसनीयता और बहुत सारी तकनीकी आपत्तियों का हवाला दिया है।

कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के सबसे मुखर आलोचक हैं। वो सरकार को लगातार आगाह कर रहे हैं। उन्होंने 30 जनवरी 2026 को एक्स पर लिखा- मोदी सरकार ग्रेट निकोबार परियोजना को जबरदस्ती आगे बढ़ा रही है, जबकि इस बात के पुख्ता सबूत मौजूद हैं कि इसके पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेंगे। इस परियोजना को लेकर व्यापक चिंताएं हैं और इसे आगे बढ़ाने के लिए पर्यावरण और अन्य कानूनों की अनदेखी के खिलाफ याचिकाएं कलकत्ता हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में लंबित हैं।


उन्होंने कहा- मोदी सरकार की ज़िद और दृढ़ता का एक प्रमुख कारण अब स्पष्ट हो गया है। केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने हाल ही में प्रस्ताव दिया है कि ग्रेट निकोबार परियोजना का एक अनिवार्य हिस्सा, गलाथिया बे अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीएचडी) के तहत विकसित किया जाए। यह स्पष्ट है कि मंत्रालय इस सिफारिश को करते समय किस निजी समूह को ध्यान में रख रहा है। यह समूह पहले से ही देश में 13 बंदरगाहों और टर्मिनलों का मालिक है और उनका संचालन करता है, साथ ही कॉर्पोरेट जगत में सबसे प्रभावशाली कंपनी भी है। और यह सब प्रधानमंत्री के आशीर्वाद से हो रहा है। बता दें कि जयराम रमेश ने अडानी का नाम नहीं लेते हुए, उस तरफ इशारा किया है।


कांग्रेस नेता ने कहा- मोदी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए आम जनता से प्रोजेक्ट की महत्वपूर्ण जानकारियों का खुलासा करने से इनकार कर रही है, लेकिन अब वह इस परियोजना में निजी कंपनियों को शामिल करने का प्रयास कर रही है। इससे साफ है कि सार्वजनिक पारदर्शिता की कमी मोदी सरकार के लिए राजनीतिक लाभ का मामला है।
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बहरहाल, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों ने विवादास्पद बना दिया है। अडानी का इसमें शामिल होने की कोशिश ने राजनीतिक आरोपों को बढ़ा दिया है। कांग्रेस और अन्य आलोचक इसे "इकोसाइड" (ecocide) बता रहे हैं। लेकिन सरकार पारदर्शिता और समीक्षा से दूर भाग रही है। यह प्रोजेक्ट भारत की पर्यावरण नीति और कॉर्पोरेट प्रभाव पर बहस का केंद्र बना हुआ है।