चुनावी नतीजों ने विपक्षी गठबंधन INDIA की स्थिति को झकझोर कर रख दिया है। एक ओर कांग्रेस ने केरल में जीत दर्ज कर कुछ राहत महसूस की, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में उसे और उसके सहयोगियों को करारी हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस ने सोमवार शाम होने वाली अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी रद्द कर दी। पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के जरिए केरल की जनता का आभार जताया, लेकिन अन्य राज्यों के नतीजों पर निराशा भी व्यक्त की।
कांग्रेस की केरल में वापसी को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, लेकिन यह जीत वामपंथी नेता पिनराई विजयन सरकार की हार की कीमत पर आई है। इस हार के साथ ही 1977 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब देश में वामपंथ का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं बचा है।

बंगाल और तमिलनाडु में बड़ा झटका

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन जैसे विपक्ष के बड़े चेहरे सत्ता से बाहर हो गए। बंगाल में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत करते हुए राज्य पर कब्जा जमाया, जबकि तमिलनाडु में विजय की पार्टी टीवीके ने बड़ा उलटफेर किया। इन दोनों राज्यों में हार के साथ ही विपक्ष की लोकसभा की 81 में से 69 सीटों पर अपनी पकड़ भी गंवा दी है, जो केंद्र की राजनीति में उसकी ताकत को कमजोर करता है। यानी इन 69 सीटों पर विपक्ष हारा और अगर इसे लोकसभा के नज़रिए से देखें तो 81 सीटों पर असर पड़ा है।
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भाजपा का बढ़ता वर्चस्व

भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा और बिहार के बाद अब बंगाल में भी जीत दर्ज की है। पार्टी अब देश में 17 मुख्यमंत्रियों के साथ मजबूत स्थिति में है और उत्तर, पश्चिम तथा पूर्व भारत में उसका व्यापक प्रभाव दिख रहा है।

इसके मुकाबले गैर-भाजपा दल अब सिर्फ छह राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश (जम्मू-कश्मीर) तक सीमित रह गए हैं। उत्तर भारत में विपक्ष के पास झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य हैं, जिनकी लोकसभा में कुल हिस्सेदारी मात्र 7% के आसपास है।

कमजोर पड़ते क्षेत्रीय चेहरे

ममता बनर्जी और स्टालिन की हार ने विपक्ष की आवाज को और कमजोर कर दिया है। हाल के वर्षों में शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं को भी लगातार चुनावी झटके लगे हैं। ऐसे में विपक्ष के पास अब ऐसे प्रभावी चेहरे कम रह गए हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व कर सकें।

नीतीश कुमार पहले ही एनडीए के साथ जा चुके हैं, जबकि नवीन पटनायक ने भी अब तक तटस्थ रुख ही अपनाया है।

मुद्दों पर भी संघर्ष

विपक्ष जिन मुद्दों को उठा रहा था- जैसे चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी, संघीय ढांचे पर खतरा, या केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप। वे जमीनी स्तर पर असरदार नहीं दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव में संविधान को लेकर राहुल गांधी ने जो नैरेटिव बनाया था, वैसी प्रभावी रणनीति विपक्ष अब तक नहीं बना पाया है।

आंतरिक खींचतान बढ़ने के संकेत

चुनावी नतीजों के बाद विपक्षी गठबंधन के भीतर दरारें और गहरी होने की आशंका है। कांग्रेस नेतृत्व के तमिलनाडु में विजय की पार्टी के प्रति झुकाव से डीएमके के साथ उसके रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। राहुल गांधी ने अपने संदेश में विजय को बधाई दी, लेकिन स्टालिन का जिक्र नहीं किया। वहीं उन्होंने ममता बनर्जी के साथ एकजुटता दिखाते हुए बंगाल और असम के नतीजों पर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए।
हालांकि, चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और टीएमसी के बीच तीखी बयानबाजी भी हुई थी, जिससे भविष्य में सहयोग आसान नहीं माना जा रहा।
अगले साल पंजाब और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं, जहां विपक्ष पहले से ही कमजोर स्थिति में है। पंजाब में आम आदमी पार्टी को हाल ही में बड़ा झटका लगा है, जब उसके सात राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पहले से भाजपा की सरकार है, जिससे विपक्ष के लिए राह और कठिन हो जाती है।
बहरहाल, केरल की जीत ने कांग्रेस को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन कुल मिलाकर चुनावी नतीजों ने विपक्ष की रणनीति, नेतृत्व और एकजुटता- तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। INDIA गठबंधन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती है खुद को फिर से संगठित करना और एक प्रभावी राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करना।