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भारत में लोकतंत्र हुआ कमज़ोर, डेमोक्रेसी इंडेक्स में 10 स्थान फिसला

भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हुआ है! इसका सबूत यह है कि लोकतंत्र के पैमाने पर विश्व के 167 देशों की रैंकिंग में भारत 10 स्थान फिसल गया है। इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने यह रिपोर्ट जारी की है। लोकतंत्र के कमज़ोर होने का साफ़-साफ़ मतलब यह है कि लोगों की आज़ादी और राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी कम हुई है। 

इसका एक मतलब तो यह भी है कि लोगों के ख़िलाफ़ सत्ता की ताक़त बढ़ी है। यह सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से भी ज़ाहिर होता है जिसमें असहमति के ख़िलाफ़ सरकार की कार्रवाई पर इसने कहा है कि असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टी वॉल्व है। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि अगर आप इस सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा। अभी दो दिन पहले ही तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी टिप्पणी की कि क्या राज्य अपने अधीन आने वाली ताक़त का इस्तेमाल कर इस तरह असहमति को कुचलना चाहती है? इसे नागरिकता क़ानून, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी और एनपीआर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वालों पर सरकार की कार्रवाई से भी समझा जा सकता है। इसका ज़िक्र भी रिपोर्ट में किया गया है। 

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देश में ऐसे ही हालात के बीच विश्व प्रतिष्ठित इकनॉमिस्ट समूह के इकनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की यह रिपोर्ट आई है। लोकतंत्र की मज़बूती कितनी है, इसको मापने के लिए यह डेमोक्रेसी इंडेक्स यानी लोकतंत्र सूचकांक तैयार करती है। इसमें कहा गया है कि भारत पिछले साल यानी 2018 में 41वें स्थान से 10 स्थान फिसलकर 51वें स्थान पर पहुँच गया है। इससे पहले 2017 में भारत 42वें स्थान पर था। 0 से लेकर 10 अंक के पैमाने पर भारत को साल 2019 के लिए 6.90 अंक दिए गए, जबकि 2018 में इसे 7.23 अंक मिले थे। यानी हाल के वर्षों में लोकतंत्र के मामले में भारत लगातार फिसलता जा रहा है।

रैंकिंग में एशिया और ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र में मलेशिया और ताइवान से भी पीछे भारत रहा। लोकतंत्र की मज़बूती के मामले में नॉर्वे पहले स्थान पर रहा और उत्तर कोरिया सबसे नीचे। चीन में भी स्थिति ख़राब हुई और यह 153वें स्थान पर रहा। बता दें कि यह रिपोर्ट चुनावी प्रक्रिया और बहुलवाद, सरकार के कामकाज, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता के आधार पर तैयार होती है।
भारत में लोकतंत्र के कमज़ोर होने का कारण जो बताया गया है उसमें जम्मू-कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 370 में फेरबदल और उसके बाद की स्थिति, असम में लागू की गई एनआरसी, नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन पर सरकार का रवैया है।

'इकनॉमिस्ट' की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार ने दो संवैधानिक प्रावधानों को रद्द कर जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति को ख़त्म कर दिया जो इसको स्वायतत्ता देते थे। बता दें कि सरकार ने पिछले साल पाँच अगस्त को अनुच्छेद 35ए को ख़त्म कर दिया है और अनुच्छेद 370 में आमूल-चूल बदलाव किए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसने राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बदल दिया है। 

रिपोर्ट में कहा गया है, 'इस फ़ैसले से पहले सरकार ने बड़ी तादाद में जम्मू कश्मीर में जवानों को तैनात किया, दूसरे सुरक्षा के उपायों को थोप दिया और स्थानीय नेताओं को नज़रबंद कर दिया। इनमें वे भी शामिल हैं जो भारत समर्थित छवि रखते हैं। सरकार ने इंटरनेट पर भी पाबंदी लगा दी।'

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'इकॉनमिस्ट' की रिपोर्ट में कहा गया है कि नये नागरिकता क़ानून ने बड़ी तादाद में मुसलिम आबादी को नाराज़ कर दिया है, इसने सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने का काम किया है और इस कारण बड़े शहरों में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हो रहे हैं। बता दें कि नागरिकता क़ानून के आने के बाद देश भर में ज़बरदस्त हिंसा हुई है। दो दर्जन से ज़्यादा लोगों की जानें गईं। अभी भी देश भर में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शाहीन बाग़ तो दुनिया भर में ख़बर बन रही है। 

इस नागरिकता क़ानून के अनुसार 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बाँग्लादेश से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। इसमें मुसलिमों को शामिल नहीं किया गया है। विपक्षी राजनीतिक दलों का कहना है कि यह क़ानून संविधान के मूल ढांचे के ख़िलाफ़ है। इन दलों का कहना है कि यह क़ानून संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है और धार्मिक भेदभाव के आधार पर तैयार किया गया है। इसी को लेकर देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं।

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'इकॉनमिस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से 19 लाख लोग बाहर रह गए। इसमें बड़ी संख्या मुसलिमों की है। रिपोर्ट के अनुसार, 'सत्ताधारी बीजेपी का कहना है कि सूची से बाहर रह गए अधिकतर लोग बांग्लादेश के आप्रवासी हैं जिसे बांग्लादेश सरकार खारिज करती रही है।' इसमें आलोचकों के हवाले से यह भी कहा गया है कि यह प्रक्रिया धार्मिक आधार पर मुसलिमों को निशाना बनाती है। 

इस रिपोर्ट को ग़ौर से देखें तो ऐसा लगता है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में लोकतंत्र के सूचकांक में भारत की स्थिति लगातार ख़राब हुई है। ख़ासकर पिछले एक साल में स्थिति काफ़ी बदतर हुई है। इसके पीछे क्या कारण हैं, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। लेकिन दिक्कत तो यह है कि इसकी ज़िम्मेदारी कोई लेने को तैयार होगा या नहीं?

अमित कुमार सिंह
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