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अमेरिका में अश्वेत की हत्या पर भारत की चुप्पी

अश्वेत नागरिक जाॅर्ज फ्लायड की हत्या के विरोध में अमेरिका में कितने ज़बरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। वहाँ में ऐसी उथल-पुथल उसके गृह-युद्ध के समय ही मची थी। लेकिन इस बार तो कनाडा से लेकर जापान के दर्जनों देशों में रंगभेद के खिलाफ आवाज़ें गूंज रही हैं।

ब्रिटेन और यूरोपीय देश, जो कि मूलतः गोरों के देश हैं, वहाँ इतने बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं, जितने कि अमेरिका में भी नहीं हो रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों के राष्ट्रपतियों की सभाओं में जहाँ दो-चार हज़ार आदमी जुटाना मुश्किल होता है, वहाँ 20-30 हज़ार लोग इन रंगभेदी प्रदर्शनों में स्वतः शामिल हो रहे हैं। इन देशों में भी भारत की तरह तालाबंदी है और कोरोना का संकट कहीं ज्यादा है, फिर भी पुलिस और फ़ौज़ भी लोगों को रोक नहीं पा रही है।
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क्या हम पत्थरदिल हैं? 

लेकिन भारत, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, यहाँ तो उस अश्वेत की नृशंस हत्या पर जूँ भी नहीं रेंग रही है। हम लोग क्या इतने स्वार्थी और पत्थरदिल हैं?
वर्तमान सरकार हमारी जनता के इन कुंभकर्णी खर्राटों से खुश होगी, वरना कोरोना के इन बिगड़ते दिनों में एक नया पत्थर उसके गले में लटक जाता। भारत की जनता के दिल में भी दर्द ज़रूर है, लेकिन कोरोना ने उसके दिल में मौत का डर इतना गहरा जमा दिया है कि वह हतप्रभ हो गई है।
अमेरिका के लोग माँग कर रहे हैं कि वहाँ के पुलिसवालों पर राज्य सरकारें पैसा खर्च करना बंद करें, क्योंकि गोरे पुलिसवाले काले लोगों पर जानवरों की तरह टूट पड़ते हैं।
यदि पुलिस के अत्याचारों के ख़िलाफ़ कोई भी आवाज़ उठाता है तो पुलिस यूनियनें उस पर टूट पड़ती हैं।

ट्रंप की धमकी

डोनल्ड ट्रंप भी बार-बार पुलिस और फ़ौज़ के इस्तेमाल की धमकी दे रहे हैं। उनका रक्षा मंत्रालय भी उनके साथ नहीं है। उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता और कार्यकर्त्ता उनके विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं। लेकिन नवंबर में होनेवाले राष्ट्रपति के चुनाव में ट्रंप की कोशिश है कि इस मुद्दे पर अमेरिका के बहुसंख्यक गोरों के वोट वे अपने पक्ष में पटा लें।
कोरोना के मामले में उनका बड़बोलापन तो उन्हें भारी पड़ ही रहा है, देखें यह रंगभेद क्या रंग दिखाता है? अमेरिका की आंतरिक राजनीति में भारत न उलझे, लेकिन रंगभेद पर उसकी चुप्पी आश्चर्यजनक है। 

(www.drvaidik.in से साभार)
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क़मर वहीद नक़वी
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