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संबंधों को मजबूती देंगे भारत-अमेरिका, बीईसीए पर करेंगे दस्तख़त

चीन के साथ चल रहे तनाव के बीच भारत अमेरिका के साथ संंबंध मजबूत करने में जुटा हुआ है। अमेरिकी सरकार के दो बड़े मंत्री भारत के दौरे पर हैं और दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम जारी है। भारत और अमेरिका ने सोमवार को कहा है कि वे मंगलवार को होने वाली ‘टू प्लस टू’ बैठक में बेसिक एक्सचेंज एंड को-ऑपरेशन एग्रीमेंट (बीईसीए) सैन्य समझौते पर दस्तख़त करेंगे। 

इस बात की घोषणा भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अमेरिकी समकक्ष मार्क एस्पर से मुलाक़ात के बाद की। एस्पर के साथ अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो भी भारत के दौरे पर हैं। पोम्पियो ने भारतीय समकक्ष एस. जयशंकर से मुलाक़ात की। 

बीईसीए सैन्य समझौते पर दस्तख़त हैदराबाद हाउस में होंगे। इस समझौते से भारत की मिसाइल क्षमता बेहतर होगी। 

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अमेरिकी के आला मंत्रियों का यह दौरा हिंदुस्तान के लिए कितना अहम है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि सोमवार को दोनों देशों के बीच हुई बैठक में भारत की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा सीडीएस जनरल बिपिन रावत, तीनों सेनाओं के और डीआरडीओ प्रमुख भी मौजूद रहे। अमेरिका की ओर से भी मार्क एस्पर के अलावा चारों सुरक्षा बलों के अधिकारी और भारत में अमेरिका के राजदूत केनेथ जस्टर मौजूद रहे। 

राजनाथ-एस्पर की मुलाक़ात के बाद भारतीय रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि दोनों देशों के मंत्रियों ने बीईसीए पर दस्तख़त होने को लेकर संतोष व्यक्त किया। मार्क एस्पर ने मालाबार 2020 में आस्ट्रेलिया के भी शामिल होने का स्वागत किया। 

क्या भारत को चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका की जरूरत है?, देखिए, वीडियो- 

चीन को बड़ा संदेश 

ड्रैगन के साथ 5 मई से चल रही सैन्य तनातनी के बीच भारत ने मालाबार नौसैनिक अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया को भी चौथे साझेदार के तौर पर शामिल कर चीन को साफ कर दिया है कि राजनयिक स्तर पर 4 देशों का जो साझा राजनयिक मंच 'क्वाड' के नाम से बन चुका है, उसका अब सैन्य मंच भी होगा।

हाल के सालों में भारत चीन से रिश्तों की संवेदनशीलता के कारण ऑस्ट्रेलिया को आमंत्रित करने में हिचक रहा था। क्वाड और मालाबार के चारों साझीदार देशों के चीन के साथ कटु रिश्ते चल रहे हैं। चारों देश पिछले कुछ सालों से चीन से कहते आ रहे हैं कि वह अंतरराष्ट्रीय सागरीय इलाक़े में इससे जुड़े क़ानूनों का पालन करे, लेकिन चीन लगातार इस विश्व व्यवस्था का अनादर ही करता रहा है। 

इससे पहले कि दक्षिण और पूर्वी चीन सागर के इलाक़ों पर चीन अपनी सैन्य ताक़त के बल पर पूरा दबदबा स्थापित कर ले, चारों देशों के लिये ज़रूरी हो गया था कि वे एक साझा मंच बनाकर अपने सामरिक और आर्थिक हितों की रक्षा करें।

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अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों की बुनियाद को और मजबूत करने के लिए माइक पोम्पियो और मार्क एस्पर को भारत भेजा है। यह बात भारत के लिए काफी अहम है लेकिन सवाल यह उठता है कि अमेरिका के साथ भारत की दोस्ती किन क्षेत्रों में आगे बढ़ेगी और किन क्षेत्रों में अमेरिका के साथ दोस्ती की कीमत चुकानी होगी। 

जहां तक भारत का सवाल है- ट्रंप की आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर और हिंद प्रशांत की नीतियों की वजह से भारत को काफी राहत मिली है और अमेरिका से भारत की बढ़ती नजदीकियों की यही बड़ी वजह भी है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान और ईरान को लेकर उसकी नीतियों से भारत की क्षेत्रीय समरनीति को भारी धक्का लगा है। 

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका अपनी फौज़ हटा लेगा तो वहां न केवल तालिबान सत्ता पर काबिज होगा बल्कि चीन को भी तालिबान के सबसे बड़े मददगार के तौर पर पेश होने का मौका मिलेगा। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान, पाकिस्तान और चीन का गठजोड़ भारत के लिए विनाशकारी साबित होगा।

मध्य एशिया नीति को धक्का

उसी तरह ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी नीतियों ने भारत की ईरान से दोस्ती और मध्य एशिया नीति को भारी धक्का पहुंचाया है। भारत की मध्य एशिया नीति में अफ़ग़ानिस्तान और ईरान का अहम स्थान माना जाता है लेकिन ईरान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों पर जब चीन का दबदबा होगा तो दोनों देश भारत की मध्य एशिया समर नीति में बाधक ही बनेंगे।

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