सुप्रीम कोर्ट ने अब जंतर मंतर प्रोटेस्ट पर पुलिस की सख़्ती को लेकर बड़ी नसीहत देते हुए कहा है कि पुलिस ताकतवर सरकार के नाम पर आक्रामकता न दिखाए। अदालत ने कहा कि जेन ज़ी हैं तो उनको सुनना चाहिए कि आख़िर उनमें ग़ुस्सा क्यों है?

जंतर-मंतर छात्र आंदोलन से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को यह सलाह दी। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में छात्र आंदोलनों से निपटते समय पुलिस और प्रशासन को संयम बरतना चाहिए। कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि ताकतवर सरकार के नाम पर आक्रामक रवैया अपनाने से स्थिति और बिगड़ सकती है तथा इससे आगे और हिंसा भड़क सकती है। इससे बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि युवाओं के विरोध को केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि उनकी बात सुनकर और समझकर संभालना चाहिए।
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प्रोटेस्ट के आयोजकों पर कार्रवाई की मांग

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान एक नई याचिका भी दाखिल की गई, जिसमें प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यदि प्रदर्शन के दौरान हुई कथित हिंसा और अभद्र व्यवहार पर कार्रवाई नहीं की गई तो यह भविष्य के लिए ग़लत उदाहरण बनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस नई याचिका को पहले से लंबित अन्य मामलों के साथ जोड़ते हुए कहा कि इन सभी पर 18 अगस्त को एक साथ सुनवाई होगी। लेकिन इसके साथ ही अदालत ने बड़ी अहम टिप्पणियाँ कीं।

'लोकतंत्र में पुलिस को संयम रखना चाहिए'

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के समय पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। अदालत ने कहा कि कई बार शांतिपूर्ण आंदोलन किसी घटना के कारण हिंसक हो सकते हैं। ऐसे समय पुलिस की जिम्मेदारी होती है कि वह हालात को और खराब होने से रोके। कोर्ट ने कहा, 'लोकतंत्र में ऐसे शांतिपूर्ण मार्च के दौरान सुरक्षा बलों को भी संयम रखना चाहिए।'

'युवाओं को समझाइए, उनकी बात सुनिए'

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि कुछ युवा प्रदर्शनकारी गलती करते हैं या भड़क जाते हैं तब भी सबसे बेहतर तरीका उनसे बातचीत करना है। उन्होंने कहा, 'सबसे ताक़तवर तरीक़ा है कि उनकी बात सुनी जाए। यह समझा जाए कि वे क्या कह रहे हैं और किस वजह से आंदोलन कर रहे हैं।' 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि युवाओं को सलाह, मार्गदर्शन और काउंसलिंग की ज़रूरत होती है, न कि केवल कठोर कार्रवाई की।

'हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता'

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान पथराव जैसी घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कुछ लोग पथराव जैसी घटनाओं में शामिल भी हों तब भी प्रशासन का पहला प्रयास स्थिति को शांत करना होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'हिंसक प्रतिक्रिया केवल हालात को और बिगाड़ेगी।' उन्होंने कहा कि सरकार और पुलिस के पास ऐसे मामलों से निपटने का अनुभव होता है इसलिए उन्हें संतुलित तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने सबसे कहा कि राज्य की ओर से अत्यधिक शक्ति प्रदर्शन या आक्रामक रवैया हालात को और गंभीर बना सकता है।

याचिका में क्या मांग की गई?

सेवानिवृत्त वायुसेना अधिकारी मनीष कुमार सोलंकी की ओर से दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के आयोजकों के ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत से कहा कि प्रदर्शन के आयोजकों की जवाबदेही तय की जाए। प्रदर्शन के दौरान कथित अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले युवाओं से सात दिन की सामुदायिक सेवा कराई जाए। यदि कार्रवाई नहीं हुई तो यह भविष्य में गलत संदेश देगा।

वकील ने यह भी कहा कि अगर ऐसे मामलों में सख्ती नहीं हुई तो आगे चलकर दूसरे आंदोलन भी हिंसक हो सकते हैं। इन दलीलों के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि युवाओं के साथ संवाद सबसे प्रभावी तरीका है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि युवाओं को शांत करना, समझाना और सलाह देना ही बेहतर विकल्प है। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यह काम अत्यधिक बल प्रयोग के बजाय समझदारी से होना चाहिए।
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20 जुलाई को जंतर मंतर पर हुई थी हिंसा

20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में बड़ी खामियों के विरोध में छात्रों ने प्रदर्शन किया था। यह आंदोलन बाद में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई थी, जिसमें कई लोग घायल हुए थे। इसके बाद पुलिस कार्रवाई, कथित बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं।

इसी घटनाक्रम से जुड़ी एक अलग याचिका में अब आयोजकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की गई है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित मामलों के साथ सुनवाई करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी लंबित याचिकाओं को एक साथ सुनने का निर्णय लिया है। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी, जिसमें छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, आयोजकों की भूमिका और अन्य संबंधित मुद्दों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।