बीजेपी एक तरफ तो एससी-एसटी से आरक्षण खत्म न करने का वादा बार-बार कर रही है। लेकिन दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने आरक्षण विरोधी नेताओं से मुलाकात की है। आरक्षण हटाओ आंदोलन आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग कर रहा है। क्या है राजनीतिः
केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा ने गुरुवार को दिल्ली में ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। यह बैठक 21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए उस प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद हुई, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण और सरकारी सहायता देने की मांग की थी।
नड्डा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बैठक की जानकारी देते हुए कहा कि जंतर-मंतर के 21 अगस्त के आंदोलन के बाद हर्ष दुबे, रण बहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक समेत आंदोलन से जुड़े सदस्यों के साथ पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत सौहार्दपूर्ण चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि इस सिलसिले में जल्द ही दोबारा बैठक होगी।
दो दिन चली बातचीत
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से जुड़े हर्ष दुबे के मुताबिक, नड्डा के साथ बातचीत बुधवार और गुरुवार, दोनों दिन हुई। उन्होंने बताया कि 7 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आंदोलन की आगे की रणनीति और निर्णय की घोषणा की जाएगी। सेवानिवृत्त सेना अधिकारी और उत्तर प्रदेश के कन्नौज निवासी रण बहादुर सिंह चौहान ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने नड्डा के सामने मांग रखी कि आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होना चाहिए। उनके मुताबिक, मंत्री ने आश्वासन दिया कि सरकार उनकी मांगों पर विचार करेगी।चौहान ने बताया कि गुरुवार को नड्डा के साथ करीब दो घंटे और बुधवार को करीब तीन घंटे चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारी सरकार से सकारात्मक कदम की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर मांगें पूरी नहीं हुईं तो जंतर-मंतर पर दोबारा प्रदर्शन होगा और इस बार भीड़ पहले से बड़ी हो सकती है।
आंदोलनकारियों का क्या कहना है?
आंदोलन से जुड़े नेताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अधिकारों को छीनना नहीं है। उनका दावा है कि वे सभी समुदायों के लिए समान अवसर और आर्थिक स्थिति के आधार पर व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।आंदोलन से जुड़े चौहान ने कहा कि SC, ST और OBC समुदाय उनके “भाई” हैं। उनके मुताबिक, आरक्षण में आर्थिक आधार को महत्व दिया जाना चाहिए और क्रीमी लेयर को समाप्त किया जाना चाहिए।
21 अगस्त को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया था। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। प्रदर्शन के दौरान इलाके में भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी।
पहले ब्रजेश पाठक से हुई थी मुलाकात
जेपी नड्डा से मुलाकात से पहले आंदोलन के प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से मुलाकात की थी। पाठक ने प्रतिनिधियों को भरोसा दिलाया था कि वे उनकी मांगों को बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाएंगे और केंद्रीय मंत्री से उनकी मुलाकात कराने की कोशिश करेंगे। इसके बाद नड्डा के साथ बैठक को आंदोलन के लिए केंद्र सरकार के साथ सीधे संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।बीजेपी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह आंदोलनः ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से नड्डा की मुलाकात को केवल एक सामाजिक आंदोलन के साथ बातचीत के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। बीजेपी के अंदर इसे पार्टी के पारंपरिक सवर्ण आधार को संभालने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी के भीतर इस बात की चिंता है कि पार्टी के पारंपरिक ऊंची जाति के मतदाताओं में हाल के समय में कुछ मुद्दों को लेकर असंतोष बढ़ा है। इनमें उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए UGC के इक्विटी रेगुलेशन भी शामिल हैं, जिन पर फिलहाल रोक लगी हुई है।
बीजेपी के नेताओं का मानना है कि इन नियमों के संभावित दुरुपयोग को लेकर सवर्ण समुदाय के एक हिस्से में नाराजगी पैदा हुई थी। इसके अलावा जातीय जनगणना को लेकर चल रही बहस ने भी इन समुदायों की बेचैनी बढ़ाई है।
2-3 फीसदी वोट भी बीजेपी के लिए बन सकते हैं चुनौती
- बीजेपी के एक नेता के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि पार्टी के लिए इस वर्ग को नजरअंदाज करना चुनावी रूप से नुकसानदेह हो सकता है। पार्टी के आकलन के अनुसार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण और क्षत्रिय समेत सवर्ण समुदाय राज्य के मतदाताओं में 20 फीसदी से अधिक हैं।
- बीजेपी के एक नेता ने कहा कि अगर अगले चुनाव में इस वर्ग का केवल 2-3 फीसदी हिस्सा भी मतदान से दूर रहता है, तो इसका असर उत्तर प्रदेश में पार्टी की संभावनाओं पर पड़ सकता है।
खास तौर पर पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर पार्टी चिंतित बताई जा रही है। बीजेपी के आंतरिक आकलन के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल से चुने गए 163 विधायकों में 52 विधायक सवर्ण समुदायों से थे। इनमें ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ और वैश्य समुदाय शामिल हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में 257 सीटें जीती थीं। ऐसे में सवर्ण मतदाताओं के रुख में मामूली बदलाव भी बीजेपी के लिए कई सीटों पर महत्वपूर्ण हो सकता है।
1989 से बीजेपी का महत्वपूर्ण सामाजिक आधार
बीजेपी के लिए सवर्ण मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के भीतर इस वर्ग को 1989 से पार्टी का एक प्रमुख आधार माना जाता रहा है। इसीलिए बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि वह एक तरफ SC, ST और OBC आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपने पुराने आश्वासनों पर कायम रहे और दूसरी तरफ आरक्षण को लेकर नाराज सवर्ण वर्ग को भी संतुष्ट रखे। बीजेपी के शीर्ष नेता पहले कई बार कह चुके हैं कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव नहीं किया जाएगा।सिर्फ बैठक से नहीं मानेगा आंदोलनः बीजेपी के एक नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि केवल बैठक कर लेने से इस समूह को लंबे समय तक संतुष्ट नहीं किया जा सकता। आंदोलन से जुड़े लोग आरक्षण नीति और उसके प्रभाव से जुड़े आंकड़ों और तथ्यात्मक जानकारी की मांग कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि सरकार के सामने सिर्फ राजनीतिक संवाद कायम रखने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट करना होगा कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर उसकी वास्तविक नीति क्या है।
AAP और CJP ने भी उठाए सवाल
नड्डा की बैठक के बाद आम आदमी पार्टी और Cockroach Janta Party (CJP) की ओर से भी सवाल उठाए गए। CJP के संयोजक अभिजीत डिपके ने पूछा कि नड्डा ने 21 अगस्त के जंतर-मंतर आंदोलन का नाम स्पष्ट रूप से क्यों नहीं लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस आंदोलन पर क्या रुख है।AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने भी नड्डा से सरकार की आरक्षण नीति पर स्पष्टता मांगी और पूछा कि बीजेपी से जुड़े इस सवर्ण आंदोलन की आरक्षण पर मुख्य मांग के बारे में सरकार का क्या रुख है।
आगे क्या होगा?
इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों के साथ बातचीत का रास्ता खोला है, लेकिन आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था में किसी बदलाव की घोषणा नहीं की है।आंदोलनकारी 7 सितंबर को अपनी अगली रणनीति घोषित करने की बात कह रहे हैं। दूसरी ओर नड्डा ने भी दोबारा बातचीत का संकेत दिया है। इसलिए आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह संवाद केवल सवर्ण मतदाताओं को राजनीतिक रूप से आश्वस्त करने की कोशिश है या सरकार आरक्षण व्यवस्था में किसी वास्तविक नीति बदलाव पर विचार करने जा रही है।