अदालतों में करोड़ों केस पेंडिंग होने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस नागरत्ना ने शनिवार को जो कहा वह सरकार के लिए बड़ा झटका से कम नहीं है। पढ़िए आख़िर उन्होंने सरकार को लेकर क्या क्या कहा।
सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना अदालतों में लंबित मुक़दमों के ढेर के लिए सरकार पर जमकर बरसीं। उन्होंने साफ़ तौर पर ज्यूडिशियल बैकलॉग यानी केसों के ढेर के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि सरकार का पूरा रवैया विरोधाभासी है। उन्होंने कहा कि सरकार एक तरफ तो कोर्ट में केसों के लंबित रहने की चिंता जताती है, लेकिन दूसरी तरफ खुद सबसे ज़्यादा केस दाखिल करके और अपील करके इस समस्या को बढ़ाती है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने साफ़ तौर पर सरकार के मुक़दमे लड़ने के तौर-तरीक़ों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जस्टिस नागरत्ना सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली नेशनल कॉन्फ्रेंस 2026 में बोल रही थीं। इस कॉन्फ्रेंस का विषय था 'रीइमेजिनिंग ज्यूडिशियल गवर्नेंस: स्ट्रेंग्थनिंग इंस्टीट्यूशंस फॉर डेमोक्रेटिक जस्टिस'। जस्टिस नागरत्ना ने कहा,
यह पैटर्न एक विरोधाभास पैदा करता है। सरकार सार्वजनिक रूप से ज्यूडिशियल बैकलॉग की चिंता जताती है, लेकिन लगातार मुकदमेबाजी करके उसी बैकलॉग को बढ़ाती है। सरकार दोनों भूमिकाओं में है। शिकायतकर्ता भी और समस्या का कारण भी। जस्टिस बीवी नागरत्ना
सुप्रीम कोर्ट जज
जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि सरकार को संयम से मुक़दमा लड़ना चाहिए और मुक़दमा लड़ने वाले के तौर पर मॉडल यानी मिसाल पेश करना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। सरकार हर स्तर पर मुकदमा लड़ती रहती है। केंद्र और राज्य सरकारें देश में सबसे बड़ी लिटिगेटर यानी मुकदमा करने वाली हैं।
अफ़सर बढ़ाते हैं मामले
उन्होंने मुक़दमों को कम करने के लिए प्रोत्साहन की कमी की ओर भी इशारा किया। लाइल लॉ की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारी अक्सर सावधानी के तौर पर या खुद को बचाने के लिए अपील दायर करना ही बेहतर समझते हैं। क्योंकि यदि वे विवादों को निपटाते हैं तो ऑडिट आपत्ति, विजिलेंस जांच या राजनीतिक जांच का डर रहता है। इसलिए अपील करना आम बात हो गई हैं, जबकि ये दुर्लभ होनी चाहिए। केस निचली अदालतों में खत्म होने चाहिए, लेकिन वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। इससे न्यायिक सिस्टम पर बोझ पड़ता है।जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर सही प्रशासनिक ट्रेनिंग दी जाए और प्रशासनिक कानून के सिद्धांतों का पालन हो तो कोर्ट तक पहुंचने वाले विवाद कम हो सकते हैं।
'सरकार कोर्ट पर पैसे भी खर्च नहीं करती'
जस्टिस नागरत्ना ने न्यायिक ढाँचे में पैसे लगाए जाने की कमी पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कोर्टरूम, स्टाफ और टेक्नोलॉजी में लगातार सरकारी निवेश नहीं होता। राजनीतिक दलों को हाईवे या कल्याण योजनाओं में निवेश दिखाना ज़्यादा फायदेमंद लगता है, इसलिए ज्यूडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर को कम फंड मिलता है। जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियां और नियम बढ़ने से विवाद बढ़ते हैं, लेकिन कोर्ट की क्षमता धीरे धीरे बढ़ती है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इसलिए पेंडेंसी सिर्फ कोर्ट की आंतरिक समस्या नहीं है, बल्कि सरकारी फैसलों का नतीजा भी है। सरकार सिर्फ लिटिगेंट नहीं, बल्कि सिस्टम में देरी का मुख्य कारण भी है।
तो समाधान क्या है?
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सिस्टम में देरी इसलिए होती है क्योंकि सभी पक्ष अपने फायदे के लिए काम करते हैं। वकील बार-बार स्थगन मांगते हैं क्योंकि पैसे प्रति सुनवाई मिलते हैं। सरकार हार मानने से बचती है। ट्रायल जज अपील में पलटने के डर से सावधानी बरतते हैं। जजों को ज्यादा घंटे काम करने, वकीलों को स्थगन न मांगने या सरकार को कम मुक़दमा करने की सलाह देने से संरचनात्मक समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए संस्थागत बदलाव चाहिए, जैसे ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स कमीशन बनाना और सभी संस्थाओं के बीच बातचीत बढ़ाना।
जस्टिस नागरत्ना ने पेंडेंसी मापने के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि खराब फाइलिंग को भी नंबर दे दिया जाता है और आँकड़ों में जोड़ा जाता है, भले ही वे जज के सामने न आएँ। उनका सुझाव है कि केस को पेंडिंग तब गिनना चाहिए जब नोटिस जारी हो, खारिज हो या सुनवाई शुरू हो।
उन्होंने प्रक्रियाओं में देरी के कारण भी बताए। नोटिस सर्व करने में देरी। लिखित बयान और काउंटर एफिडेविट में देरी। इवेक्शन सूट में जानबूझकर स्थगन। उन्होंने कहा कि पारंपरिक पोस्ट या अखबार में विज्ञापन के बजाय व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक तरीके अपनाए जा सकते हैं।
जजों के बारे में उन्होंने कहा कि वे दिन भर सुनवाई करते हैं और शाम, वीकेंड या छुट्टियों में जजमेंट लिखते हैं। वे छुट्टियों में मजा नहीं करते, बल्कि काम करते हैं। अपील और स्टे में भी देरी होती है। अक्सर ब्लैंकेट स्टे मिल जाता है और फिर स्टे हटाने या मुख्य मामले की सुनवाई में साल लग जाते हैं।
उन्होंने सुधार के कई सुझाव दिए- ज्यूडिशियल केस मैनेजमेंट, स्थगन कम करना, कोर्ट टाइम का सही इस्तेमाल, छोटे और साफ़ जजमेंट, टेक्नोलॉजी अपनाना, केस को प्राथमिकता देना, वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा, नैतिक मुकदमेबाजी, अपील का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना। इसके साथ ही जजों की समय पर नियुक्ति और कोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पर्याप्त फंडिंग।
जस्टिस बीवी नागरत्ना का यह भाषण न्यायिक सुधारों की ज़रूरत पर जोर देता है और दिखाता है कि पेंडेंसी की समस्या सिर्फ़ कोर्ट की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है।