कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि बच्चों के अलावा महिला स्वास्थ्य के आँकड़े बताते हैं कि 14-49 आयु वर्ग की 57 प्रतिशत ख़ून की कमी का शिकार हैं। Kharge attacks govt on NFHS data saying 1 in 5 women are undernourished.
भारत में हर पांच बच्चों में एक बच्चे कुपोषण का शिकार
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के हालिया आंकड़ों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। खड़गे ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार स्वास्थ्य सेवा और पोषण के मोर्चे पर देश की महिलाओं और बच्चों के साथ विश्वासघात कर रही है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट के जरिए सरकार को घेरते हुए कहा कि NFHS-6 के आंकड़ों ने भाजपा की "पूरी अक्षमता" (absolute incompetence) को बेनकाब कर दिया है।
खड़गे ने सरकार पर अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए महत्वपूर्ण डेटा को जानबूझकर छिपाने का भी आरोप लगाया। खड़गे ने एक्स पर कहा- "मोदी सरकार न केवल सेहत और पोषण के मामले में भारत की महिलाओं और बच्चों के साथ विश्वासघात कर रही है, बल्कि वह जानबूझकर महत्वपूर्ण आंकड़ों को भी छिपा रही है जो उसकी विफलताओं को उजागर करते हैं!"
बच्चों के कुपोषण और महिलाओं के स्वास्थ्य पर आंकड़े क्या कहते हैं
कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने देश में कुपोषण और स्वास्थ्य की स्थिति को बताने के लिए सर्वे के निम्नलिखित प्रमुख आंकड़े साझा किए:
- बच्चों में कुपोषण: देश का हर 5 में से 1 बच्चा (20%) गंभीर कुपोषण (acute malnutrition) का शिकार है।
- कम वजन वाले बच्चे: भारत के एक-तिहाई (लगभग 33%) बच्चे सामान्य से कम वजन (underweight) के हैं।
- शिशु पोषण की कमी: 6 से 23 महीने की उम्र के 84% से अधिक बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा है।
- महिलाओं में एनीमिया (रक्तअल्पता): NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की 57% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।
- अल्पपोषित महिलाएं: देश की हर 5 में से 1 महिला अल्पपोषण (undernourished) का शिकार है।
खड़गे ने बताया- आंकड़े छिपाने का सरकार का 5 सूत्री फॉर्मूला
मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार अपनी कमियों और 'पापों' को छिपाने के लिए एक विशेष 5 स्टेप रणनीति (5-step formula) अपनाती है:
- चुनिंदा डेटा को दफनाना (दबा देना): सरकार उन आंकड़ों को छिपा देती है जो उसकी विफलताओं को उजागर करते हैं।
- कमजोर वर्गों को बेसहारा छोड़ना: समाज के सबसे संवेदनशील और गरीब तबके की अनदेखी करना।
- 'सबका साथ' और 'अमृत काल' का झूठा प्रचार: जमीनी हकीकत छिपाने के लिए बड़े-बड़े विज्ञापनों और नारों का सहारा लेना।
- नैरेटिव (विमर्श) को तोड़ना-मरोड़ना: जनसंचार और चर्चाओं को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास करना।
- पीएम मोदी की पीआर (PR) की हर कीमत पर रक्षा करना: प्रधानमंत्री की छवि को बेदाग बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाना।
भारतीय बच्चों के पोषण के चिन्ताजनक आंकड़े
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों से भारत में बच्चों के पोषण को लेकर एक बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सर्वेक्षणों की तुलना में थोड़े सुधार के बावजूद, 6 से 23 महीने की आयु वर्ग के केवल 15.3% बच्चों को ही पर्याप्त और संतुलित आहार (Adequate Diet) मिल पा रहा है। हालाँकि, यह आंकड़ा पिछले सर्वेक्षण (NFHS-5) के मुकाबले बेहतर है, जहाँ यह संख्या मात्र 11% थी। इन्हीं आंकड़ों पर विपक्ष शक जता रहा है। उसका कहना है कि स्थिति बहुत भयावह और सरकार आंकड़ों की बाजीगरी कर रही है।बच्चों के पोषण पर सरकारी आंकड़े और एक्सपर्ट की सलाह
'ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया' (BPNI) के मुख्य समन्वयक और प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण गुप्ता के अनुसार, ये निष्कर्ष दिखाते हैं कि भारत को माताओं को सफलतापूर्वक स्तनपान कराने और सही पोषण देने में सक्षम बनाने वाली प्रणालियों को फिर से मजबूत करने की फौरन ज़रूरत है। उन्होंने कहा, "विभिन्न पैमानों पर प्रगति तो हो रही है, लेकिन यह बेहद सीमित है।" उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि 6 महीने की उम्र के बाद केवल मां का दूध बच्चे के विकास के लिए पर्याप्त नहीं होता। इस उम्र के बाद बच्चों को स्तनपान जारी रखने के साथ-साथ सुरक्षित, पौष्टिक और विविधता से भरपूर पूरक आहार (Complementary Foods) दिया जाना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत वर्तमान में कुपोषण के 'दोहरे बोझ' (Double Burden) से जूझ रहा है। जहाँ एक तरफ एक बड़ी आबादी अभी भी सही पोषण और आवश्यक डाइट से वंचित है, वहीं दूसरी तरफ जीवनशैली और खान-पान में बदलाव के चलते बच्चों और वयस्कों में मोटापा व अन्य बीमारियां भी बढ़ रही हैं।
NFHS-6 के आंकड़े और सरकार का पक्ष
यह विवाद केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (2023-24) के निष्कर्षों के बाद शुरू हुआ है। विपक्ष का कहना है कि सरकार डेटा छिपा रही है या उसे तोड़ मरोड़कर पेश करना चाहती है।
- सर्वेक्षण का दायरा: यह सर्वेक्षण स्वास्थ्य मंत्रालय की देखरेख में मुंबई स्थित 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेज' (IIPS) द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में आयोजित किया गया था। इसमें देश के 715 जिलों के लगभग 6.79 लाख घरों को कवर किया गया।
- सरकार का पक्ष: स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि ये आंकड़े मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण और वित्तीय सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की "तेज प्रगति" को दर्शाते हैं। सरकारी रिलीज के अनुसार, देश के 95.6% बच्चों को सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से अधिकांश टीके लगाए गए हैं और प्रमुख योजनाओं के चलते स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार दर्ज किया गया है।
विपक्ष का कहना है कि चमकीली तस्वीरों के पीछे देश में बच्चों और महिलाओं के पोषण की वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है और सरकार इन कमियों को सुधारने के बजाय आंकड़ों की बाजीगरी कर रही है।