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लंपी के देसी टीके पर कौन कुंडली मारकर बैठा है

लंपी बीमारी से अभी तक 67000 गायों की मौत अभी तक हो चुकी है लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है।  भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद  (आईसीएआर) हिसार और आईवीआरआई इज्जतनगर (बरेली) ने मिलकर इस वायरस के खिलाफ एक टीका बनाया लेकिन सरकार उसे मंजूरी देने में हीलाहवाली कर रही है। आरोप है कि गुजरात की एक प्राइवेट कंपनी का टीका बिकवाने के लिए सरकारी टीके को अनुमति नहीं मिल रही है। इस बीमारी ने दूध उत्पादक राज्य हरियाणा, यूपी, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू और कश्मीर (यूटी) और आंध्र प्रदेश आदि को बुरी तरह अपनी चपेट में ले रखा है।

हाल ही में राजस्थान, हरियाणा और यूपी से गायों के लंपी वायरस से मरने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। जिनमें मरी हुई हजारों गायों को विभिन्न वाहनों से ले जाता दिखाया गया है। पीटीआई की एक खबर में कहा गया है कि अभी तक 67000 गायों की मौत लंपी वायरस से हो चुकी है। देश में दूध उत्पादन कम हो गया है। 
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आरएलडी का आरोपआरएलडी चीफ जयंत चौधरी ने गुरुवार 22 सितंबर को इस मुद्दे पर ट्वीट करके आरोप लगाया कि गुजरात की एक निजी कंपनी भेड़-बकरी पर आधारित टीका बनाती है (जो गाय को सिर्फ़ 60-70% अनुमानित सुरक्षा देती है)। सरकारी ICAR द्वारा विकसित टीके को अनुमति नहीं मिल रही। और इस बीच भेड़-बकरी वाले टीके को बड़े पैमाने पर ख़रीद इस लंपी आपदा में प्रयोग किया जा रहा है। घोटाला?जयंत ने यूपी के पशुधन मंत्री पर भी हमला बोला। 
उन्होंने मंत्री के बयान को हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश पशुधन मंत्री के बयान पर गौर कीजिए - 1) बीमारी तेज़ी से पूरे देश में फैली है। जिस राज्य में शहर, सड़क, खेत पर मवेशी छुट्टे घूमते हों, मंत्री कह रहे हैं रोग कुछ ज़िलों तक सीमित रहेगा। 2) ऐसा लगता है मंत्री जी के लिए पश्चिम (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) की सारी गाय मर भी जाएँ, कोई दिक़्क़त नहीं!
बता दें कि यूपी के पशुधन मंत्री ने कहा था कि पश्चिमी यूपी के 25 जिलों में लंपी वायरस ज्यादा खतरनाक ढंग से फैला हुआ है। हम कोशिश कर रहे हैं कि वहां से ये आगे न फैले। इस तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में गायों को बचा लिया जाएगा। आरएलडी चीफ जयंत चौधरी का यही एतराज है कि मंत्री ने अगर सोचा भी तो सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश के बारे में। जबकि पश्चिमी यूपी में सबसे बड़ा दूध उत्पादक इलाका है।

सरकारी लालफीताशाही

जयंत चौधरी के इस आरोप में दम है कि सरकार देश में निर्मित टीके को मंजूरी नहीं दे रही है। प्रतिष्ठित डाउन टु अर्थ मैगजीन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि एक महीने पहले शुरू किया गया एक स्वदेशी टीका अभी भी आपातकालीन उपयोग के लिए अनुमोदन की प्रतीक्षा कर रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 10 अगस्त, 2022 को आईसीएआर द्वारा विकसित टीके की शुरुआत की। वैक्सीन को पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) से इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए अनुमति की जरूरत है। मंजूरी में देरी मुख्य रूप से टीके के प्रभावी होने पर भ्रम और इसके उत्पादन के लिए कौन जिम्मेदार होगा, जैसे सवालों के कारण है।
Lumpi-ProVacInd वैक्सीन के लिए इमरजेंसी मंजूरी प्रदान करने को लेकर, हाल ही में 5 सितंबर को, आईसीएआर और पशुपालन विभाग के अधिकारियों के बीच कई बैठकें हुई हैं। लेकिन मंजूरी को लेकर मामला फंसा रहा। हद यह है कि इसमें शामिल सभी विभाग केंद्र सरकार के अधीन हैं।
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भारत में फिलहाल लंपी वायरस को रोकने के लिए जिस टीके का इस्तेमाल हो रहा है, उसे दरअसल, बकरी, भेड़ आदि में चेचक रोकने के लिए बनाया गया था।  लेकिन वो टीका गायों के लंपी वायरस में ज्यादा कारगर नहीं है। इसके मुकाबले आईसीएआर और आईवीआरआई ने जो टीका बनाया है वो ज्यादा कारगर हो सकता है। वो दूध उत्पादकों को सस्ता भी पड़ेगा। कहा जा रहा है कि एक खुराक टीके की कीमत करीब दो रुपये बैठेगी। डाउन टु अर्थ के मुताबिक  कई वैज्ञानिकों को विश्वास है कि स्वदेशी टीका सुरक्षित है और एलएसडी वायरस के खिलाफ बकरी के टीके की तुलना में बेहतर सुरक्षा प्रदान करेगा। 

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