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मालेगाँव पार्ट-4: पुरोहित की चिट्ठी, धमाके में इंद्रेश का भी हाथ

चुनाव में उतरने के बाद अपने विवादित बयानों से साध्वी प्रज्ञा सिंह एक बार फिर ख़बरों में हैं। वे मालेगाँव धमाका मामले में मुख्य अभियुक्त हैं, अदालत ने उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने को कहा है। प्रज्ञा फ़िलहाल ज़मानत पर हैं। सत्य हिन्दी ने मालेगाँव कांड पर एक शृंखला शुरू की है। इसकी पहली, दूसरी और तीसरी कड़ी पहले प्रकाशित की जा चुकी है। अब पेश है इसकी चौथी कड़ी।
नीरेंद्र नागर

मालेगाँव धमाकों में हाथ होने के लिए गिरफ़्तार होने के बाद से ले. कर्नल पुरोहित यही कह रहे हैं कि वह सेना के जासूस के तौर पर काम कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मालेगाँव धमाकों में 'जिन लोगों का हाथ' था, उनके बारे में मैंने सेना के तीन लोगों को जानकारी दे दी थी। आइए, आज हम जानते हैं कि ले. कर्नल पुरोहित ने इस मामले में किससे क्या कहा था और कब।

ले. कर्नल पुरोहित ने अपने बचाव में दो बातों का ज़िक्र किया है। एक यह कि उन्होंने 13/14 अक्टूबर 2008 को कर्नल विनय पँचपोरे और मेजर प्रवीण खानज़ोडे को फ़ोन पर ‘उन लोगों के बारे में जानकारी दी थी जो इस तरह की कार्रवाइयों में शामिल हैं।’ कर्नल पँचपोरे सदर्न कमांड की लायज़न यूनिट के कमांडिंग ऑफ़िसर थे और प्रवीण खानज़ोडे उसी की देवलाली यूनिट में इंटेलिजेंस अधिकारी थे। इसके अलावा उन्होंने उस ख़त का भी हवाला दिया जो उन्होंने 15 अक्टूबर 2008 को इंटेलिजेंस अधिकारी मेजर भागीरथ दे को लिखा था।

मालेगाँव पार्ट-1, 2 और 3

आइए, जानते हैं कि ले. कर्नल पुरोहित ने कर्नल पँचपोरे और मेजर प्रवीण ख़ानज़ोडे को क्या बताया था। इस कॉल की कोई रिकॉर्डिंग तो है नहीं इसलिए कर्नल पँचपोरे ने आर्मी की कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी (सीओआई) को जो बताया, उसी के आधार पर हम कोई निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

पँचपोरे ने सीओआई को अपने स्टेटमेंट में बताया, ‘मालेगाँव धमाके के बाद 14 अक्टूबर 2008 को दो कॉल किए गए और पुरोहित ने बताया कि इसमें साध्वी प्रज्ञा का हाथ है। मैंने उन्हें देवलाली यूनिट को कॉल करने को कहा।’

पुरोहित ने मेजर भागीरथ दे को जो चिट्ठी लिखी, उसमें भी इस मामले में प्रज्ञा का हाथ होने का दावा किया। इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में हिंदुवादियों के कार्यकलापों की भी जानकारी दी।

अपने पत्र में पुरोहित ने आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार का भी ज़िक्र किया और बताया कि कैसे उन्होंने एबीवीपी के मौजूदा और पूर्व कार्यकर्ताओं पर अपना पर्याप्त प्रभाव जमा लिया है और कैसे वे अपने दो सहायकों के ज़रिये मध्य प्रदेश में ऑपरेट करते हैं। पुरोहित ने जुलाई में हुए गुजरात धमाके का भी ज़िक्र किया और कहा कि इनके पीछे भी इंद्रेश कुमार का ही हाथ है।

उन्होंने लिखा, ‘गुजरात और मालेगाँव में धमाके एक ही दिन हुए और दोनों में एक ही टेकनिक इस्तेमाल की गई थी। मुझे पता चला है कि इसके पीछे आरएसएस के इंद्रेश कुमार का हाथ है जो जाने-अनजाने आईएसआई के हाथों में खेल रहे हैं।’

प्रज्ञा के बारे में क्या लिखा?

प्रज्ञा के बारे में पुरोहित ने लिखा कि ‘आपके कार्यक्षेत्र में ऑपरेट करने वाली एक महिला भी है जिसका नाम है प्रज्ञा सिंह जो मूल रूप से मुरैना या भिंड की रहने वाली है। वह इंदौर, जबलपुर और गुजरात के बीच आना-जाना करती है। मालेगाँव धमाके में जो वाहन इस्तेमाल किया गया, वह तीन अलग-अलग गाड़ियों से मिलाकर बनाया गया था जिनमें से एक थी बजाज फ़्रीडम और वह ऊपर बताई गई महिला के नाम से रजिस्टर्ड है। मरने से पहले प्रचारक (सुनील) जोशी इस वाहन का इस्तेमाल कर रहा था और इस गाड़ी का रजिस्ट्रेशन सूरत में करवाया गया था।’

पुरोहित द्वारा पँचपोरे को किए गए कॉल और भागीरथ दे को लिए गए इस पत्र से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। एक, कि वे वाक़ई आर्मी के जासूस थे और सेना को इनके बारे में सूचनाएँ दे रहे थे। दूसरा, वे अपनी खाल बचाने के लिए ऐसा कर रहे थे।

धमाकों से पहले नहीं दी कोई सूचना 

आइए, दोनों संभावनाओं की पड़ताल करते हैं। यदि वे वाक़ई जासूस का काम कर रहे थे तो पहला सवाल यह उठता है कि वे कब से ऐसा कर रहे थे और क्या उन्होंने इन धमाकों से पहले भी अपने किसी सीनियर को प्रज्ञा, इंद्रेश कुमार या किसी भी ऐसे हिंदूवादी नेता के बारे में कोई जानकारी दी थी। इसका जवाब है - नहीं। अदालतों और आर्मी की सीओआई में ख़ुद पुरोहित ने या किसी और ने भी ऐसा कोई डॉक्युमेंट पेश नहीं किया जिससे पता चलता हो कि पुरोहित ने ‘धमाके से पहले’ प्रज्ञा या और किसी भी हिंदूवादी नेता या कार्यकर्ता के बारे में कोई सूचना आर्मी को दी हो। एनआईए ने भी सेना के सीनियर अधिकारियों से बात की और उन्होंने भी बताया कि पुरोहित हिंदूवादी संगठनों में घुसपैठ करके ख़ुफ़िया सूचनाएँ लाने के अभियान में लगे हैं, ऐसी कोई जानकारी उनके पास नहीं थी।

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पुरोहित ने क्यों लिखी थी चिट्ठी?

इससे ज़ाहिर होता है कि जब पुरोहित को लगा कि मालेगाँव धमाके में इस्तेमाल की गई बाइक की मालिक यानी प्रज्ञा का पता चल गया है और पुलिस प्रज्ञा से पूछताछ कर रही है और हो सकता है कि वह उनका नाम भी बता दे तो उन्होंने अपने बचाव में कर्नल पँचपोरे और मेजर ख़ानज़ोडे को फ़ोन किया। इसके बाद उन्होंने मेजर भागीरथ दे को भी पत्र लिखा और उसमें प्रज्ञा का हाथ होने का ज़िक्र किया ताकि उनके पक्ष में एक दस्तावेज़ रहे। ध्यान दें कि धमाका 29 सितंबर को हुआ था और पुरोहित के कॉल और पत्र उसके 15 दिन बाद के हैं।

ध्यान दें कि धमाके के एक हफ़्ते में ही एटीएस को पता चल गया था कि बाइक की मालिक कौन है और उसने प्रज्ञा से संपर्क किया था। 8 अक्टूबर को प्रज्ञा और रामजी कलसांगरे के बीच बातचीत भी हुई जिसमें प्रज्ञा ने कहा कि कल मुझे पुलिस वाले ले जाएँगे। ख़ूब संभव है कि प्रज्ञा या दूसरे लोगों से यह बात पुरोहित को पता चली और तब पुरोहित ने अपने बचाव में प्रज्ञा को दोषी ठहराते हुए आर्मी के साथी अफ़सरों से संपर्क किया था।

पुरोहित की चिट्ठी पर कोई कार्रवाई नहीं

एक प्रश्न यह भी उठता है कि जब पुरोहित ने पँचपोरे और भागीरथ दे को बताया कि इस धमाके में प्रज्ञा और इंद्रेश कुमार का हाथ है तो उन्होंने क्या किया? क्या उनका फ़र्ज़ नहीं बनता था कि वे एटीएस को इसकी सूचना देते? लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। जब कर्नल श्रीवास्तव ने 24 अक्टूबर को पँचमढ़ी पहुँचते ही भागीरथ दे को फ़ोन करके पूछा कि आपने उस पत्र का क्या किया तो उन्होंने कहा कि मैंने उसे रख लिया। क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि उनको नहीं लगा कि इस पत्र में जो जानकारी दी गई है, वह ‘विश्वसनीय’ है?

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भागीरथ दे ने सीओआई को दिए गए अपने बयान में भी ऐसा ही कुछ कहा है कि इस चिट्ठी में ऐसी कोई ख़ास जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा, ‘14 जुलाई 2008 से 4 अक्टूबर 2008 के बीच मैं पँचमढ़ी के आर्मी एजुकेशनल कोर ट्रेनिंग कॉलेज में स्पेशल चाइनीज़ रिफ़्रेशल कोर्स कर रहा था। उसी दौरान मेरी ले. कर्नल पुरोहित से मुलाक़ात हुई।’ बयान के मुताबिक़, 'अक्टूबर 2008 के दूसरे सप्ताह में ले. कर्नल पुरोहित ने मुझे कॉल किया। उनके पास कोई सूचना थी जो उन्होंने कहा कि वे फ़ोन पर नहीं बता सकते। 15 अक्टूबर 2008 को मैंने ले. कर्नल पुरोहित के पास एक हवलदार को भेजा जो एक चिट्ठी लेकर आया। चिट्ठी में एक आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार और एक महिला प्रज्ञा सिंह के बारे में कुछ अस्पष्ट-सी जानकारी थी।’

कहने का अर्थ यह कि पुरोहित ने पँचपोरे और भागीरथ दे को जो जानकारियाँ दी थीं, वे इतनी अस्पष्ट थीं कि उन अधिकारियों ने उनका संज्ञान ही नहीं लिया। क्या पुरोहित के पास इन नेताओं के बारे में इतनी ही जानकारी थी, वह भी तब जबकि वे 2006 से इन हिंदूवादी नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे जिनमें स्वामी असीमानंद भी शामिल थे? उन्होंने उस ‘अभिनव भारत’ नाम की संस्था के सदस्यों के बारे में क्यों नहीं कुछ बताया जिनकी बैठकों में वे शामिल रहे थे और जिसमें केवल मुसलिम इलाक़ों में धमाके करने की ही नहीं, बल्कि आरएसएस चीफ़ भागवत और इंद्रेश कुमार की हत्या की भी योजना बना रहे थे? आख़िर क्या कर रहे थे पुरोहित पिछले दो सालों से, इसके बारे में हम जानेंगे अगली कड़ी में।

नीरेंद्र नागर
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