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मोदी राज में एक-एक कर सभी पड़ोसी क्यों छोड़ रहे हैं भारत का साथ?

यह भारतीय कूटनीति और विदेश नीति की विंडबना ही कही जाएगी कि एक-एक कर सभी देशों से भारत के रिश्ते मोदी शासन काल में बिगड़े है। यह भी अजीब स्थिति है कि इन देशों के साथ कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है, ऐसा मतभेद नहीं है जिसे बात कर सुलझाया नहीं जा सकता है। 
प्रमोद मल्लिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए पड़ोसी देशों से रिश्तों पर जो कुछ कहा, उससे कुछ सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि पड़ोसी वही नहीं हैं, जिनसे सीमाएं मिलती हैं, वे भी हैं जिनसे दिल मिलते हैं। उन्होंने ‘ग्रेटर नेवरहुड’ की बात कही। प्रधानमंत्री ने ‘आसियान’ की बात कही है और कहा कि उनके साथ सदियों पुराना रिश्ता रहा है। मोदी का कहना था कि पड़ोसियों के साथ पारस्परिक सम्मान का भाव है और उनसे हमारे बेहतर रिश्ते हैं।
पड़ोसियों के साथ मौजूदा रिश्ते पर एक नज़र डालने से यह साफ़ हो जाता है कि इन देशों से भारत के इतने ख़राब रिश्ते कभी नहीं थे। यह भारतीय कूटनीति और विदेश नीति की विंडबना ही कही जाएगी कि एक-एक कर सभी देशों से भारत के रिश्ते पिछले कुछ सालों में बिगड़े है। यह भी अजीब स्थिति है कि इन देशों के साथ कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है, ऐसे मतभेद नहीं है जिन्हें सुलझाया नहीं जा सकता है।
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नेपाल

भारत का सबसे पारंपिक मित्र देश नेपाल है, जिसके साथ इसकी दो हज़ार किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा है। दोनों देशों के बीच इतने अच्छे रिश्ते रहे हैं कि इतनी लंबी सीमा खुली हुई है, यानी दोनों देशों के नागरिक इस सीमा को बग़ैर वीज़ा-पासपोर्ट के पैदल चल कर पार कर सकते है। सीमाई इलाक़ों में रोजी-रोटी और रोटी-बेटी का रिश्ता है। 
इतने अच्छे और ऐतिहासिक रिश्ते में कड़वाहट घुल चुकी है। जिसके साथ खुली सीमा है, उस नेपाल के साथ अब सीमा विवाद भी है। उत्तराखंड में नेपाली सीमा से कुछ दूसरी पर चीनी सेना तैनात है, ज़ाहिर है, नेपाल की इसमें रज़ामंदी होगी।

नेपाल से सीमा विवाद?

नेपाल का कहना है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा उसके इलाक़े हैं। नेपाली संसद ने संशोधन विधेयक पारित कर इन इलाक़ों को नेपाल में दिखाने वाला नक्शा पास कर दिया है, नेपाल सरकार ने उसे संयुक्त राष्ट्र को भेजने की बात भी कही है। इस मुद्दे पर रखा गया प्रस्ताव आम सहमति से पास हुआ, सरकार ने प्रस्ताव रखा तो विपक्ष दलों ने इसका स्वागत किया। 

इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत ने कैलाश- मान सरोवर रास्ता बनाने की कोशिश की। नेपाल ने लिपुलेख पर दावा करते हुए भारत से निर्माण कार्य रोकने को कहा।

आज़ादी के पहले से जिन इलाक़ों पर कोई विवाद नहीं हुआ, नेपाल ने कभी मुद्दा नहीं उठाया, उस पर तीखा विवाद है। नेपाल में नए किस्म का उग्र राष्ट्रवाद ज़ोरों पर है और वहाँ का युवा समाज भारत-विरोधी रवैया अपनाए हुए है।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि नेपाल में भारत-विरोधी भावना की शुरुआत 2014 में तब हुई, जब भारत ने तराई इलाक़े की राजनीति में हस्तक्षेप किया, मधेशियों के मुद्दे पर काठमान्डू पर दबाव बनाने की कोशिश की और नहीं मानने पर आर्थिक नाकेबंदी कर दी, जो लगभग तीन महीने चली।
नेपाल में आर्थिक स्थिति तो चरमराई ही, तेल और खाने पीने की चीजों की किल्लत हो गई।

चीन के साथ नेपाल?

पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसके बाद ही नेपाल ने भारत पर निर्भरता ख़त्म या सीमित करने के लिए चीन के बॉर्डर रोड इनीशिएटिव यानी बीआरआई के प्रस्ताव को मान लिया।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसके बाद ही नेपाल ने भारत पर निर्भरता ख़त्म या सीमित करने के लिए चीन के बॉर्डर रोड इनीशिएटिव यानी बीआरआई के प्रस्ताव को मान लिया। नेपाल इस पर राजी हो गया कि चीन तिब्बत से लेकर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे नेपाली इलाक़े तक रेल लाइन बिछा देगा। इसी तरह सड़क भी बनेगी।  
नेपाल इस पर राजी हो गया कि चीन तिब्बत से लेकर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे नेपाली इलाक़े तक रेल लाइन बिछा देगा। इसी तरह सड़क भी बनेगी। ज़ाहिर है, युद्ध के समय इसका सामरिक इस्तेमाल भी हो सकता है।

बांग्लादेश

नेपाल की तरह ही पारंपरिक व ऐतिहासिक संबंध वाला देश है बांग्लादेश। जिस बांग्लादेश को भारत ने आज़ाद करवाया और जिसके लिए भारतीय सैनिकों ने ख़ून बहाया, जिस बांग्लादेश से इस युद्ध की वजह से एक करोड़ से अधिक शरणार्थी भारत आए और उनमें से ज़्यादातर लौट कर नहीं गए, उसके साथ भारत का 36 का रिश्ता है।
और रिश्तों में यह कड़वाहट उस आवामी लीग के शासनकाल में है, उस शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहते हुए है, जिनके पिता शेख मुजीब-उर-रहमान ने भारतीय शहर कोलकाता में रह कर मुक्ति संग्राम का सपना देखा था।  

एनआसी-सीएए

इसकी तात्कालिक और सबसे बड़ी वजहें हैं नैशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) और समान नागरिकता क़ानून यानी सीएए। भारत के गृह मंत्री ने असम में चुनाव प्रचार के दौरान खुले आम बांग्लादेशियों को ‘दीमक’ क़रार दिया और एलान किया कि उन्हें चुन-चुन कर बाहर निकाला जाएगा। यह कोरी धमकी नहीं थी, एनआरसी लाया गया, और लगभग 19 gलाख लोग चिन्हित हुए जो भारतीय नहीं बांग्लादेशी हैं।
इसी तरह बांग्लादेश में ग़ैर-मुसलमानों के साथ भेदभाव और अत्याचार की बात कही गई, उनके लिए भारत में नागरिकता की बात कही गई और सीएए लाया गया। इन दोनों वजहों से बांग्लादेश बुरी तरह ख़फ़ा है। दोनों देशों के बीच रिश्ते न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुके हैं।
इसके बाद ही बांग्लादेश ने भी चीनी परियोजना बीआरआई में दिलचस्पी लेनी शुरू की। किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए यदि म्यांमार से गुजरने वाली बीआरआई परियोजना की एक शाखा बांग्लादेश होते हुए बंगाल की खाड़ी तक पहुँच जाए।

ईरान

ईरान ने बीते दिनों चीनी परियोजना बीआरआई में शामिल होने की औपचारिक घोषणा कर दी और 400 अरब डॉलर के समझौते का एलान कर सबको चौंका दिया। लेकिन, इसके दो हफ़्ते पहले ही ईरान ने भारत की मदद से बनने वाले  130 अरब डॉलर रेल परियोजना रद्द कर दी थी।
ईरान के साथ भारत के रिश्तों में तल्ख़ी आनी उसी समय शुरू हो गई जब भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। ईरान की अर्थव्यवस्था इससे चरमरा गई।
ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इसलामिक कोऑपरेशन और संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर समेत तमाम मुद्दों पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत का साथ देने वाले तेहरान को यह नागवार गुजरा कि वह संकट में आया तो भारत ने पल्ला झाड़ लिया। 

दिल्ली दंगों से दुखी अयातुल्ला?

इसके बाद यह हुआ कि सीएए, एनआरसी और दिल्ली दंगों पर ईरान ने खुल कर भारत का विरोध किया। ईरान के 'सुप्रीम लीडर' यानी 'सर्वोच्च नेता' और शिया मुसलमानों के दुनिया के सबसे बड़े धर्मगुरु अयातुल्ला खामेनेई ने दिल्ली दंगों पर गहरी चिंता जताते हुए भारत की तीखी आलोचना की।
अयातुल्ला खामेनेई ने हैशटैग #IndianMuslimsInDanger का इस्तेमाल करते हुए ट्वीट किया, 'भारत में मुसलमानों के क़त्लेआम पर पूरी दुनिया के मुसलमानों का हृदय व्यथित है।' 
उन्होंने इसी ट्वीट में भारत को पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ जाने की चेतावनी भी दे डाली। उन्होंने लिखा :

'भारत सरकार को उग्रवादी हिन्दुओं और पार्टियों का मुक़ाबला करना चाहिए और मुसलमानों का क़त्लेआम रोकना चाहिए ताकि वह पूरी इसलामी दुनिया में एकदम अलग-थलग न पड़ जाए।'


अयातुल्ला खामेनेई, ईरान के सुप्रीम लीडर

इसके भी पहले ईरान ने सीएए पर गंभीर आपत्ति जताई थी, कश्मीर मुद्दे पर भारत की आलोचना की थी और कहा था कि कश्मीरियों के राजनीतिक अधिकार तुरन्त बहाल किए जाएं। 

भूटान भी!

इसे भारतीय विदेश नीति की असफलता ही कहा जायेगा कि भारत पर काफ़ी हद तक निर्भर रहने वाला भूटान भी अब नई दिल्ली को आँखें दिखा रहा है। ताज़ा घटनाक्रम में भूटान ने उस नहर को बंद कर दिया है जिससे बहता हुआ पानी असम पहुँचता है और वहाँ के किसान धान की खेती में सिंचाई के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं।
असम और भूटान के बीच धोंग नामक मानव-निर्मित नहर है, जिसका इस्तेमाल दोनों देशों के किसान 1953 से ही कर रहे हैं। भारत के लगभग 25 गाँवों के किसान धान की खेती के लिए इस नहर से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं।
भूटान ने कहा कि कोरोना रोकथाम के उपायों के तहत ही उसने विदेशियों के भूटान की सीमा में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है। असम के ये किसान विदेशी हैं, लिहाज़ा वे भूटान नहीं जा सकते।
इस घटना पर विवाद होते ही दोनों पक्ष सफ़ाई देने में जुट गए। भूटान ने कहा कि उसने कभी पानी बंद नहीं किया था, बल्कि साफ़-सफ़ाई कर रहा था। भारत ने भी उसकी पुष्टि करते हुए कहा कि दरअसल थिम्पू ने कभी पानी बंद किया ही नहीं था। पर सच यह है कि पानी बंद किया गया था और इसकी वजहें थीं। 

श्रीलंका

चीन ने अपनी ‘गोल्डन नेकलेस’ नीति के तहत श्रीलंका के हम्बनटोटा में बंदरगाह बनवाया, जिस पर 8 अरब रुपए डॉलर खर्च हो गए। अब कोलंबो का कहना है कि उसके पास इतने पैसै नहीं हैं, लिहाज़ा उसने वह बंदरगाह चीन को 99 साल की लीज पर दे दिया। 
यह वही श्रीलंका है, जहाँ भारत ने एक जमाने में भारतीय शांति रक्षक सेना के नाम पर लगभग 10 हज़ार सैनिक भेजे थे ताकि वे तमिल विद्रोहियों को निरस्त्र कर सकें।
श्रीलंका के हम्बनटोटा में चीनी नियंत्रण में बंदरगाह भारतीय तट से कुछ नॉटिकल माइल्स की दूरी पर है। वहां खड़ा कोई चीनी विमानवाहक पोत या फ्रिगेट भारतीय नौसेना के लिए कितना बड़ा संकट बन सकता है, इसे समझा सकता है।
श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे अपनी चीन-परस्त नीतियों के लिए जाने जाते हैं। 

सेशल्स

हिंद महासागर का छोटा देश सेशल्स कई मामलों में भारत पर निर्भर रहा है, भारत वहां पर्यटन से लेकर शिक्षा, मत्स्य पालन, ढाँचागत सुविधाओं वगैरह में निवेश कर चुका है। उस सेशल्स ने भारत का मुफ़्त में दिया हुआ लड़ाकू हेलॉकॉप्टर वापस कर दिया। समझा जाता है कि उसने ऐसा चीन के प्रभाव में किया।

अफ़ग़ानिस्तान

जिस अफ़ग़ानिस्तान में भारत ने अरबों डॉलर का निवेश किया और संसद भवन बनाने से लेकर सड़क निर्माण ही नहीं क्रिकेट टीम तक खड़ी कर दी, वहां भारत को कोई पूछने वाला नहीं है। तालिबान- अमेरिका बातचीत में किसी ने भारत को ख़बर तक नही की, राय-मशविरा तक नही किया गया। वहां भी चीन का दबदबा बढ़ रहा है। 
चीन और पाकिस्तान से रिश्तों के बारे में क्या कहा जाए? जगजाहिर है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?  अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग कारण हैं, पर मोटे तौर पर यह भारत सरकार की नाकाम विदेश नीति और कूटनीति है।

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प्रमोद मल्लिक
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