अमेरिका और कनाडा के बाद अब यूके में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अपने हिंदुत्व की छवि चमकाने पहुँचे! विदेशों में 'सर्वधर्म समभाव' वाली छवि बनाने की कोशिश के तौर पर आलोचना झेल रहे मोहन भागवत ने लंदन में विविधता पर भाषण दिया है। उन्होंने लंदन में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि 'हिंदू राष्ट्र' का मतलब किसी एक धर्म, पूजा-पद्धति या जीवनशैली पर आधारित राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह विविधता को स्वीकार करने वाली सोच है। उन्होंने कहा कि एकता के लिए सभी लोगों का एक जैसा होना जरूरी नहीं है।

भागवत का यह बयान तब आया है जब अमेरिका और ब्रिटेन में उनके कार्यक्रमों को लेकर कुछ संगठनों ने विरोध भी जताया है और आरएसएस की विचारधारा पर सवाल उठाए हैं। यह कार्यक्रम आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर चल रहे अंतरराष्ट्रीय संपर्क अभियान का हिस्सा है। इससे पहले मोहन भागवत न्यूयॉर्क और टोरंटो में भी भारतीय समुदाय को संबोधित कर चुके हैं।
भले ही भारत में आरएसएस और इससे जुड़े संगठनों और लोगों की गतिविधियों पर विविधता को दबाने और सिर्फ़ हिंदुत्व को उभारने में लगे रहने का आरोप लगता रहा है, लेकिन लंदन में भागवत का बयान बिल्कुल इसके उलट रहा। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि 'हिंदू' शब्द को केवल किसी धर्म, पूजा-पद्धति या जीवनशैली के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनके अनुसार, हिंदू होने का अर्थ है सभी प्रकार की विविधताओं का सम्मान करना और उन्हें स्वीकार करना।

भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा हमेशा से अलग-अलग विचारों को स्वीकार करने की रही है। यहाँ तक कि नास्तिक विचार भी भारत की धरती से ही निकले। उन्होंने कहा कि भारत की सोच यह रही है कि हर व्यक्ति का रास्ता सही हो सकता है और सभी अंततः एक ही लक्ष्य तक पहुँचते हैं।

आरएसएस की राजनीतिक शाखा बीजेपी की सरकारें एक के बाद एक राज्यों में एंटी कंवर्जन क़ानून लाती जा रही हैं और इसे मुसलमानों और ईसाइयों पर हमले के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन लंदन में भागवत ने भाषण दिया, 'हमें एक-दूसरे को बदलने या धर्म परिवर्तन कराने की ज़रूरत नहीं है। यह कहना कि केवल हमारा रास्ता ही सही है, हिंदू दृष्टिकोण नहीं है। हिंदू सोच कहती है कि हम भी सही हैं और आप भी सही हो सकते हैं।'

विविधता में भी हिंदू राष्ट्र की ही बात 

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने हिंदू राष्ट्र के अपने प्रोजेक्ट को दुनिया के सामने बड़े ही मोहक अंदाज़ में पेश किया। इसके लिए उन्होंने 'नेशन' और 'राष्ट्र' के बीच अंतर भी समझाया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में 'नेशन' आमतौर पर भाषा, धर्म, संस्कृति या शासन व्यवस्था जैसी समानताओं के आधार पर बनता है। वहाँ राज्य समान नियम लागू करके लोगों को जोड़ता है। इसके विपरीत, उन्होंने कहा कि 'राष्ट्र' का आधार समान उद्देश्य होता है। उनके अनुसार भारत का 'हिंदू राष्ट्र' इसी विचार पर आधारित है कि विविधता स्वाभाविक है और एकता ही अंतिम सत्य है।

भागवत ने कहा कि भारत पर कई बार विदेशी आक्रमण हुए और देश लंबे समय तक गुलाम भी रहा, लेकिन इसके बावजूद भारत का 'राष्ट्र' भाव समाप्त नहीं हुआ क्योंकि लोगों का साझा उद्देश्य बना रहा।

'हिंदू राष्ट्र दुनिया को विविधता का संदेश देता है'

देश भर में हिंदुत्व के नाम पर हिंसा की आ रही ख़बरों के बीच भागवत ने 'हिंदू राष्ट्र' को आदर्श रूप में पेश किया। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य दुनिया को यह संदेश देना है कि विविधता प्रकृति का नियम है और एकता सबसे बड़ा सत्य है। उन्होंने कहा कि यदि भारत इसी दिशा में आगे बढ़ेगा तो भविष्य में न तो तानाशाही पैदा होगी और न ही युद्ध जैसी स्थितियां बनेंगी।

हाल में देश में सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे जेन ज़ी और जेन अल्फा को लुभाने में जुटे मोहन भागवत ने कहा कि उन्हें नई पीढ़ी पर पूरा भरोसा है। उनके अनुसार आज के युवा दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं और छोटी-छोटी बातों में उलझने के बजाय बड़े उद्देश्य के लिए काम करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं को केवल लक्ष्य बताया जाना चाहिए, उन पर काम करने का तरीका नहीं थोपा जाना चाहिए।

ब्रिटेन के हिंदुओं को ऐसी सलाह!

कार्यक्रम के दौरान एक सवाल यह भी पूछा गया कि अगर कभी ब्रिटेन और भारत के हितों में टकराव हो जाए तो ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को किसका साथ देना चाहिए। इस पर मोहन भागवत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में हिंदू है तो ऐसी स्थिति शायद पैदा ही नहीं होगी।

लेकिन भागवत ने यह भी कहा कि अगर कभी ऐसा हो भी जाए तो ब्रिटेन के नागरिक होने के नाते वहां रहने वाले हिंदू स्वाभाविक रूप से ब्रिटेन का साथ देंगे। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व कभी भी अपनी कर्मभूमि के साथ विश्वासघात करना नहीं सिखाता।

हिंदू एकता पर क्या बोले भागवत?

हिंदू एकता के सवाल पर भागवत ने कहा कि समाज को उन बातों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए जो लोगों को जोड़ती हैं, न कि उन बातों पर जो उन्हें अलग करती हैं। उन्होंने कहा कि एकता का रास्ता समानता से नहीं, बल्कि विविधताओं का सम्मान करते हुए साझा मूल्यों पर आगे बढ़ने से निकलता है।

भागवत के विदेश दौरे पर विवाद क्यों?

न्यूयॉर्क के बाद लंदन में भी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम का विरोध हो रहा है। ब्रिटेन के 20 नागरिक समाज संगठनों ने लंदन के मेयर सादिक खान और ब्रिटेन के विदेश कार्यालय को पत्र लिखकर आरएसएस से जुड़े कार्यक्रमों का बहिष्कार करने की मांग की है। इन संगठनों का कहना है कि आरएसएस एक ऐसा संगठन है जिसकी विचारधारा समाज में विभाजन पैदा करती है। उन्होंने मांग की है कि लंदन प्रशासन आरएसएस द्वारा आयोजित किसी भी कार्यक्रम के लिए सरकारी सहयोग या स्थान उपलब्ध न कराए।

पत्र में आरएसएस को 'तानाशाही और सैन्यवादी सोच वाला संगठन' बताते हुए आरोप लगाया गया कि उसकी विचारधारा यूरोप के फासीवादी आंदोलनों से प्रेरित रही है। संगठनों ने कहा कि ब्रिटेन की बहुसांस्कृतिक और विविधतापूर्ण सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करना जरूरी है और ऐसे आयोजनों को सरकारी समर्थन नहीं मिलना चाहिए।
पिछले सप्ताह न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित उनके कार्यक्रम 'यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशन' का भी कुछ संगठनों ने विरोध किया था। इससे पहले अमेरिका के न्यूयॉर्क में मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित मोहन भागवत के कार्यक्रम के बाद भी विवाद खड़ा हुआ था। वहां कुछ ईसाई, मुस्लिम और अन्य धार्मिक नेताओं ने दावा किया था कि उन्हें कार्यक्रम की प्रकृति और आरएसएस की भूमिका के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। बाद में कुछ धर्मगुरुओं ने सार्वजनिक रूप से कार्यक्रम में शामिल होने पर खेद भी जताया था।

इन विवादों के बीच लंदन में दिए गए अपने संबोधन में भागवत ने एक बार फिर विविधता, सह-अस्तित्व और सभी विचारों के सम्मान को हिंदू राष्ट्र की मूल भावना बताया।