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अख़लाक़ से तबरेज़ तक: लिंचिंग में हत्यारों को क्यों बचा रही हैं सरकारें?

लिंचिंग यानी पीट-पीट कर मार डालने की अजीब दास्ताँ है। सरेआम पीट-पीट कर मार दिए गये। लिन्चिंग के वीडियो बने। कुछ मामलों में मृतकों ने मौत से पहले पीटने वालों के नाम तक बताए। प्रत्यक्षदर्शी थे। फिर भी सज़ा नहीं। है न ताज्जुब की बात? ताज्जुब तो यह है कि मोदी सरकार कहती है कि लिंचिंग के दोषी बख्शे नहीं जाएँगे। प्रधानमंत्री मोदी तक चेतावनी दे चुके हैं। ऐसे में क्या यह संभव है कि लिंचिंग के दोषियों को सज़ा नहीं मिले? मोदी सरकार के बयान, बीजेपी नेताओं के व्यवहार और वास्तविक कार्रवाई में समानता क्यों नहीं है? ऐसे अभियुक्तों को जेल से छूटने पर मंत्री तक ज़ोरदार स्वागत क्यों करते हैं? झारखंड में तबरेज़ अंसारी के मामले में जो रिपोर्ट आयी है वह क्या यही दास्ताँ बयाँ नहीं करती है? 

22 साल के तबरेज़ को जून महीने में बाइक चोरी के शक में भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था और उससे ‘जय श्री राम’ और ‘जय हनुमान’ के नारे भी लगवाए थे। अब तबरेज़ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट कहती है कि तबरेज़ की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थी न कि भीड़ के द्वारा की गई पिटाई से। पुलिस ने इस मामले में 11 अभियुक्तों पर से हत्या की धारा को भी हटा दिया है। यानी हो गई निष्पक्ष जाँच! मिल गया न्याय! वैसा ही न्याय जैसा पहलू ख़ान, जुनैद, अख़लाक़ जैसे मामले में मिला। ऐसी सज़ा के ख़ौफ़ से अब कहीं लिंचिंग होगी ही नहीं?

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यह बिल्कुल वैसा ही मामला है जैसा पहलू ख़ान के मामले में हुआ। सभी 6 आरोपी बरी हो गए। वह भी तब जब पहलू ख़ान को सरेआम पीट-पीट कर मार दिया गया था। लिन्चिंग का वीडियो बनाया गया। इसकी साफ़-साफ़ तसवीरें थीं। पहलू ने मौत से पहले ‘डाइंग स्टेटमेंट’ दिया था और पीटने वालों के नाम बताए थे। पहलू के दो बेटे प्रत्यक्षदर्शी थे। एनडीटीवी एक एक स्टिंग ऑपरेशन भी था। फिर भी सभी अभियुक्त बरी हो गए। उनके परिजनों और वकील ने आरोप लगाया कि इस केस को हर स्तर पर कमज़ोर किया गया। जब काफ़ी किरकिरी हुई तो राजस्थान सरकार ने कहा है कि वह पहलू ख़ान मामले की फिर जाँच कराएगी और इसके लिए एक विशेष टीम का गठन किया जाएगा।

पूरी जाँच प्रक्रिया वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली पूर्व की बीजेपी सरकार के दौरान चली। इस मामले में हर बार तत्कालीन गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया गो तस्करी पर ही ज़ोर देते रहे। हालाँकि, गलहोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान भी पहलू ख़ान के बेटों के ख़िलाफ़ गो तस्करी का मामला दर्ज किया गया। अभियुक्तों के वकील ने भी माना था कि पहलू ख़ान के बेटों पर गो तस्करी का केस दर्ज होने से उनकी दलील को मज़बूती मिली।

पहलू ख़ान केस कैसे कमज़ोर हुआ?

  1. वीडियो और तसवीरें रिकॉर्ड में नहीं ली गईं
  2. वीडियो की जाँच नहीं कराई गई
  3. डाइंग डेक्लेरेशन पर विचार नहीं किया गया
  4. उल्टे पहलू के परिजनों पर गो तस्करी का केस दर्ज
  5. कोर्ट ने भी कहा- पुलिस ने लापरवाही बरती
  6. एफ़आईआर में हत्या का केस नहीं

अख़लाक़ हत्याकांड

ऐसी ही कमियाँ दादरी में अख़लाक़ हत्याकांड मामले में भी दिखीं। बिसाहड़ा गाँव में 2015 के सितंबर महीने में हुई इस घटना में भीड़ ने कथित तौर पर गो मांस रखने के चलते 52 वर्षीय अख़लाक़ की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। घटना के बाद तनाव के चलते अख़लाक़ के परिवार को गाँव छोड़कर जाना पड़ा था। इस मामले के सभी आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं। वे बीजेपी नेताओं के क़रीबी भी हैं। 

अप्रैल महीने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब दादरी में रैली को संबोधित कर रहे थे, तब ताली बजाने और नारे लगाने वालों में अख़लाक़ की हत्या के आरोपी सबसे आगे थे। इसमें मुख्य आरोपी विशाल राणा भी शामिल था। ये आरोपी ज़मानत पर हैं।

अखलाक मामले में जाँच पर संदेह

इस मामले की जाँच पर सवाल उठते रहे हैं। जब गो मांस रखने का आरोप लगा था तो उसकी दो रिपोर्टें आई थीं। एक रिपोर्ट दादरी की सरकारी वेटेरिनरी और दूसरी फ़ोरेंसिक लैब की। दादरी वेटेरिनरी की रिपोर्ट में कहा गया था कि वह मांस गाय का नहीं, बल्कि बकरे का है। फ़ोरेंसिक लैब की रिपोर्ट में था कि वह मांस गाय का था। अखलाक के परिवार वालों का आरोप है कि पहले पुलिस ने जो सैंपल लिए थे वह दो किलो ही थे और इसमें दो पैर, छाती की चमड़ी और सर शामिल थे, लेकिन बाद में वह सैंपल 4-5 किलो कैसे हो गए? उन्होंने दो पैर और चमड़ी ग़ायब होने का भी आरोप लगाया था। दो रिपोर्ट होने से ज़ाहिर तौर पर जाँच प्रभावित होनी ही थी। यह भी तथ्य है कि जो मांस सैंपल के रूप में पुलिस ने लिए थे वह अख़लाक़ के घर के फ़्रीज में नहीं थे, बल्कि उनके घर से कुछ दूर बाहर से लिये गये थे। इससे सवाल उठता है कि इस मामले की जाँच में क्या कोई बाहरी दबाव था?

बीजेपी नेता किसके समर्थन में?

केंद्र में बीजेपी की सरकार थी तो अख़लाक़ के इस मामले में ठोस कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन हुआ इसके उलट। तब केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने इस पर दुख नहीं जताया था, बल्कि कहा था कि ‘ग़लतफहमी’ के कारण यह घटना हो गई। एक और बीजेपी नेता और मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के आरोपी संगीत सोम ने बिसहड़ा गाँव का दौरा किया था। वह अख़लाक़ के परिजनों से नहीं मिले, बल्कि लिंचिंग करने में संदिग्ध रहे लोगों से मिले थे। उन्होंने कहा था कि किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह गो वध करे या इसका मांस खाए। उसी तनाव के दौरान एक ऐसी भी रिपोर्ट आई थी कि स्थानीय बीजेपी ईकाई ने धूम मणिकपुर गाँव में बैठक कर इस माँग का प्रस्ताव पारित किया था कि गो हत्या करने वाले को गिरफ़्तार किया जाए और लिंचिंग के छह अभियुक्तों को रिहा किया जाए। इन आरोपियों में से एक विशाल राणा भी था जो बीजेपी के ज़िला समिति के सदस्य संजय राणा का बेटा है। 

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जयंत सिन्हा ने आरोपियों का किया था स्वागत

लिंचिंग का एक ऐसा ही मामला झारखंड में हुआ था। रामगढ़ में जून 2017 में अलीमुद्दीन अंसारी को पीट-पीट कर मार दिया गया था। इस मामले में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने आठ लोगों को दोषी ठहराया था। लेकिन हाई कोर्ट ने जुलाई 2018 में ज़मानत दे दी। 2018 में तत्कालीन नागरिक उड्यन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने लिंचिंग के मामले में जेल से ज़मानत पर छूटे आठ लोगों को माला पहनाकर स्वागत किया था। उन्होंने तो इसकी तसवीरें भी सोशल मीडिया पर शेयर की थीं और कहा था कि न्याय की प्रक्रिया के अनुसार ही उन्होंने ऐसा किया है। हालाँकि काफ़ी ज़्यादा आलोचना होने पर बाद में उन्होंने इस पर दुख जताया था। 

जुनैद मामले में भी केस हल्का किया गया!

जुनैद ख़ान के मामले में भी ऐसा ही हुआ था। जुनैद अपने भाई के साथ दिल्ली से ईद की ख़रीदारी कर ट्रेन से हरियाणा जा रहे थे। उसके बैग में गो मांस होने के शक में भीड़ ने पीटा था। बल्लभगढ़ के पास कथित रूप से चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में तीन महीने के अंदर छह में से चार आरोपियों को ज़मानत मिल गई थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हरियाणा रेलवे पुलिस ने चार्जशीट में दर्ज दंगा करने, अवैध रूप से एकत्रित होने जैसे कई आरोपों को वापस ले लिया था।

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लिंचिंग पर बीजेपी के दो चेहरे

लिंचिंग के इन मामलों में बीजेपी के अलग-अलग दो चेहरे दिखते रहे हैं। एक तरफ़ कई नेता लिंचिंग के समर्थन में खड़े होते हुए दिखते हैं और उनके पक्ष में बयान देते दिखते हैं तो प्रधानमंत्री एक-दो मौक़ों पर कार्रवाई की बात कह चुके हैं। अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गो रक्षकों की ग़लत गतिविधियों को लेकर पहली बार सार्वजनिक तौर पर बोला था। उन्होंने कहा था कि 80 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो गो रक्षा की दुकान खोलकर बैठ गए हैं। उन्होंने कहा था कि ऐसे लोगों पर मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है। राज्य सरकारों से उन्होंने ऐसे लोगों का डोजियर तैयार कर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा था। बता दें कि हाल में कई राज्यों में इस संबंध में क़ानून बनाने की पहल हुई है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में सख़्त क़ानून बनाने की बात की जा रही है वहीं उत्तर प्रदेश में लॉ कमीशन ने इसी साल जुलाई में मॉब लिंचिंग करने वालों को आजीवन कारावास की सज़ा देने की सिफ़ारिश की है। लेकिन सवाल फिर वही है कि जब आरोपियों के ख़िलाफ़ केस को ही कमज़ोर किया जाएगा और उन्हें ताक़तवर नेताओं का समर्थन मिलता रहेगा तो लिंचिंग के मामलों का हाल तबरेज़ हत्याकांड केस जैसा ही होगा।

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