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'द कश्मीर फाइल्स' में फासीवादी विशेषताएँ: नादव लापिड

इजरायली फिल्म निर्माता नादव लापिड ने कहा है कि वह 'द कश्मीर फाइल्स' पर दिए अपने बयान पर अडिग हैं। बल्कि उन्होंने अपने पिछले बयान से एक क़दम आगे बढ़ते हुए कहा है कि 'किसी को तो बोलना पड़ेगा'। उन्होंने तो अब यहाँ तक कह दिया है कि उस फिल्म में 'फासीवादी विशेषताएँ' हैं।

लापिड की यह तीखी प्रतिक्रिया तब आई है जब सोमवार को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल यानी आईएफएफआई में उनके बयान पर बवाल मचा है। यहाँ तक कि लापिड के देश इजरायल के दूत ने माफी मांगने जैसी टिप्पणी कर दी। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि उस टिप्पणी के लिए लापिड को शर्मिंदा होना चाहिए। सोशल मीडिया पर भी कई लोग लापिड की आलोचना कर रहे हैं।

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दरअसल, अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल यानी आईएफएफआई के मंच से ही आईएफएफआई के जूरी प्रमुख लापिड ने द कश्मीर फाइल्स को 'प्रोपेगेंडा और भद्दी' फिल्म क़रार दे दिया था। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि यह फिल्म फेस्टिवल की स्पर्धा में शामिल भी किए जाने लायक नहीं थी। वह जब यह बोल रहे थे तब केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर भी मौजूद थे।

विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित उस फिल्म को लेकर लापिड ने उस मंच से ही कहा था, '...द कश्मीर फाइल्स से हम सभी परेशान और हैरान थे। यह एक प्रोपेगेंडा, भद्दी फिल्म की तरह लगी, जो इस तरह के प्रतिष्ठित फिल्म समारोह के कलात्मक प्रतिस्पर्धी वर्ग के लिए अनुपयुक्त है। इस मंच पर आपके साथ इन भावनाओं को खुले तौर पर साझा करने में मुझे पूरी तरह से सहज महसूस हो रहा है।' 

इस पर कई लोगों ने लापिड पर कश्मीरी पंडितों की पीड़ा के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया। बता दें कि फिल्म 1990 के दौर के उस भयावह समय पर केन्द्रित है, जब आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों की हत्याएं कीं और उन्हें कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया गया। हजारों कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने पर मजबूर हो गए। अनुमान है कि 90 हजार से लेकर 1 लाख तक कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ने के लिए मजबूर हुए। कुछ रिपोर्टों में इनकी संख्या क़रीब डेढ़ लाख भी बताई जाती है। 
पलायन से पहले और पलायन के दौरान सैकड़ों कश्मीरी पंडित मारे गए। जम्मू-कश्मीर सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 1989 से 2004 के बीच इस समुदाय के 219 लोग मारे गए थे। हालाँकि, कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का दावा रहा है कि 650 कश्मीरी पंडित मारे गए थे।

इस बीच लापिड की टिप्पणी को लेकर बहुत से लोगों ने कहा कि हॉलोकास्ट की भयावहता का सामना करने वाले समुदाय का कोई व्यक्ति इस तरह की टिप्पणी कैसे कर सकता है।

अब नादव लापिड का बयान आया है। एक रिपोर्ट के अनुसार इज़राइली समाचार वेबसाइट वाईनेट से बात करते हुए लापिड ने कहा, 'बेहद अजीबोगरीब है। यहाँ क्या हो रहा है। यह एक सरकारी फेस्टिवल है और यह भारत में सबसे बड़ा है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे भारत सरकार ने, भले ही उसने वास्तव में नहीं बनाई हो, कम से कम इसे असामान्य तरीके से आगे बढ़ाया। यह मूल रूप से कश्मीर में भारतीय नीति को सही साबित करती है, और इसमें फासीवादी विशेषताएँ हैं।' इसके साथ ही लापिड ने यह संभावना भी जताई कि 'अगले डेढ़ या दो साल में इस तरह की कोई इज़राइली फिल्म आए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।'

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द इंडियन एक्सप्रेस ने वाईनेट की रिपोर्ट के हवाले से ख़बर दी है कि यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें अपनी टिप्पणी पर गंभीर प्रतिक्रिया का अनुमान था, उन्होंने कहा कि वह 'आशंकित' थे। यह पूछे जाने पर कि राजनीतिक बयान देने से पहले उनके दिमाग में क्या चल रहा था और क्या उन्हें पता था कि उनकी बातों से बवाल मच जाएगा, उन्होंने कहा, 'मुझे पता था कि यह एक ऐसी घटना है जो देश से पूरी तरह जुड़ी हुई है, और वहाँ खड़ा हर कोई सरकार की प्रशंसा करता है। यह कोई आसान स्थिति नहीं है, क्योंकि आप एक अतिथि हैं, मैं यहां जूरी का अध्यक्ष हूँ, आपके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया जाता है। और तब आप आकर फेस्टिवल पर आक्रमण करते हो। एक आशंका थी, और एक बेचैनी थी। मुझे नहीं पता था कि कितना बड़ा असर होगा, इसलिए मैंने इसे कुछ आशंका के साथ किया। हां, मैं दिन भर आशंकित रहा।'

बता दें कि 'द कश्मीर फाइल्स' पर रिलीज के समय से ही विवाद होता रहा है। फिल्म जब रिलीज हुई तो बीजेपी शासित तमाम राज्य उसे अपने-अपने ढंग से प्रमोट करने में जुट गए थे। लेकिन अधिकतर फ़िल्म समीक्षकों और विपक्षी दलों के नेताओं ने इसपर प्रोपेगेंडा फ़िल्म होने का आरोप लगाया। इन आरोपों-प्रत्यारोपों पर एक समय ख़ूब हंगामा हुआ था। विवेक अग्निहोत्री की टीम ने दावा किया है कि उन्होंने द कश्मीर फाइल्स में कश्मीरी पंडितों के उसी दर्द और सचाई को बयां किया है। 

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बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक इस फ़िल्म की तारीफ़ कर चुके हैं और विरोध को साज़िश तक बता चुके हैं। आलोचकों पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था, 'वे गुस्से में हैं क्योंकि हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म उस सच्चाई को सामने ला रही है जिसे जानबूझकर छिपाया गया था। पूरी जमात जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा फहराया था, 5-6 दिनों से उग्र है। तथ्यों और कला के आधार पर फिल्म की समीक्षा करने के बजाय, इसे बदनाम करने की साज़िश की जा रही है।'

बीजेपी शासित सरकारों ने तो इस फ़िल्म को टैक्स फ्री भी किया था। एमपी में पुलिस वालों को 1 दिन की छुट्टी दी गई थी। हालाँकि, विरोधी विवेक अग्निहोत्री द्वारा लिखित और निर्देशित इस फ़िल्म को नफ़रत फैलाने वाला क़रार देते रहे हैं।

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