राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चैप्टर को लेकर विवाद खत्म नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घटनाक्रम पर गहरी नाराजगी जताई है और जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पीएम मोदी पर पलटवार किया है और इसे डैमेज कंट्रोल का प्रयास बताते हुए जांच की मांग की है। हालांकि मोदी की नाराज़गी की खबर सूत्रों के हवाले से मीडिया ने काफी प्रमुखता से जारी किया है।
एनसीईआरटी की नई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" चैप्टर शामिल किया गया था। जिसमें न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार, बैकलॉग और अन्य मुद्दों का जिक्र था। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) ने एनसीईआरटी को कड़ी फटकार लगाते हुए इसे "आपत्तिजनक" बताया। कोर्ट ने किताब पर हर तरह से पूरी रोक लगा दी। साथ ही, स्कूल शिक्षा मंत्रालय के सचिव और एनसीईआरटी के निदेशक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस घटनाक्रम से बेहद नाखुश हैं और उन्होंने कैबिनेट बैठक में इस पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, "कक्षा 8 के छात्रों को क्या पढ़ाया जा रहा है? इसे कौन मॉनिटर कर रहा है? जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।" पीएम ने इस एपिसोड पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि इसमें शामिल लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पीएम मोदी के इस रुख के सामने आने के बाद कांग्रेस ने शुक्रवार 27 फरवरी को ज़ोरदार हमला बोला।

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मिसटर मोदी पाखंड कर रहे हैंः जयराम रमेश

कांग्रेस सांसद और संचार प्रमुख जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा: "इसराइल में असली नैतिक कायरता दिखाने के बाद, प्रधानमंत्री एनसीईआरटी किताबों के मुद्दे पर नकली गुस्सा जता रहे हैं। यह एक स्पष्ट डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज़ है। मोदी ने एनसीईआरटी कि किताब में न्यायपालिका की आलोचना के संदर्भों पर अपनी बहुत नाखुशी जताई है। पिछले दशक में, उन्होंने (मोदी ने) शैक्षणिक-धोखेबाजों के एक नेटवर्क की अध्यक्षता की है। जिन्होंने पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखकर गंभीर नुकसान पहुंचाया है। ये आकस्मिक चूक नहीं हैं, बल्कि एक व्यवस्थित अभियान का हिस्सा हैं। मिस्टर मोदी ने खुद नागपुर कम्युनल इकोसिस्टम को निर्देशित और खड़ा किया है, जो पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन के लिए असली एनसीईआरटी है। सुप्रीम कोर्ट को उकसाने वाली पाठ्यपुस्तकों से खुद को दूर करने का उनका प्रयास सरासर पाखंड है।

जयराम रमेश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के लिए अगला तार्किक कदम यह है कि पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन की पूर्ण जांच शुरू की जाए और वे कैसे ध्रुवीकरण और राजनीतिक स्कोर सेटलिंग के साधन बन गए हैं।" रमेश ने कहा- पिछले एक दशक में एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों का पुनर्लेखन आरएसएस-प्रेरित अभ्यास रहा है, जो शरारत और द्वेष से भरा है। उन्होंने इस रैकेट की जांच की मांग की।

यह विवाद तूल पकड़ रहा है। पीएम की नाराजगी, सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से मामला आगे बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा पाठ्यक्रम में वैचारिक प्रभाव और शिक्षा की निष्पक्षता पर बहस को जन्म दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच की संभावना से एनसीईआरटी और शिक्षा मंत्रालय पर दबाव बढ़ गया है।

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एनसीईआरटी ने किताब को अपनी वेबसाइट से हटा लिया है और नई संस्करण तैयार करने की बात कही है।

बहरहाल, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी कहा कि चैप्टर तैयार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालांकि चैप्टर तैयार करने वाले लोग आरएसएस से जुड़े बताए जाते हैं। आरोप है कि एनसीईआरटी की ऐसी कमेटी में आरएसएस के लोग भरे हुए हैं जो चुन-चुन कर किताबों में बदलाव तय करते हैं। विपक्ष का आरोप है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चैप्टर उन्हीं लोगों का आइडिया है। सरकार अब विवादास्पद हिस्सों को हटाने की बात कह कर अपना पीछा छुड़ा रही है।